कंचन को संदेश

रविवार, 17 सितंबर 2017


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मुख्यमंत्री ने किया जयसिंह रावत की पुस्तक का विमोचन

मुख्यमंत्री ने किया जयसिंह रावत की पुस्तक का विमोचन
देहरादून। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में पत्रकारिता से संबंधित उपलब्ध पुराने दस्तावेजों को डिजिटलाइजेशन कर इन्हें प्रदर्शित करने के लिए गैलरी बनाने, स्वतंत्रता सेनानी पत्रकारों या उनके वंशजों को सम्मानित करने और स्वाधीनता आंदोलन के दौर से प्रकाशित हो रहे अखबारों को विरासत के तौर पर संरक्षण देने की जरूरत पर बल देते हुए सूचना विभाग को इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिये हैं।
रविवार को बीजापुर गेस्ट हाउस में वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत की पुस्तकस्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखंड की पत्रकारितापुस्तक के विमोचन समारोह में मुख्यमंत्री ने ये आदेश दिये। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेज सरकार की तमाम दमनकारी नीतियों के बावजूद अत्यन्त विषम परिस्थितियों में अखबारों का प्रकाशन करने वाले पत्रकारों को नमन किया और कहा कि ऐसे लोग हमारे प्रेरणास्रोत हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। यदि ऐसे पत्रकार जीवित हैं तो उनका अन्यथा उनके परिवार के सदस्यों का सम्मान किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने पुराने दस्तावेजों और पत्रों को अमूल्य धरोहर बताया और कहा कि ऐसे उपलब्ध दस्तावेजों का आधुनिक तरीके से डिजिटलाइजेशन कर उनके लिए एक गैलरी बनाई जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने छोटे लेकिन स्वाधीनता संग्राम के दौर से प्रकाशित हो रहे समाचार पत्रों को संरक्षण और बड़े समाचार पत्रों की तरह मान्यता देने की जरूरत बताई। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद सूचना महानिदेशक को इस संबंध में आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिये।
पुस्तक के लेखक जयसिंह रावत ने कहा कि यह पुस्तक उनके चार दशक के पत्रकारिता के अनुभव पर आधारित है। जिसमें अनेक पुराने दस्तावेज संकलित किये गये हैं। श्री रावत ने कहा कि उत्तराखंड की पत्रकारिता को दिशा और दशा देने में अनेक महान पत्रकारों ने योगदान किया है, लेकिन उस पुस्तक में उन्होंने केवल उन्हीं पत्रकारों का उल्लेख किया है, जो पत्रकार होने के साथ ही स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने उम्मीद जताई उत्तराखंड के इतिहास में रुचि रखने वालों की ज्ञान पिपासा को
शांत करने पर उनकी पुस्तक कामयाब साबित होगी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के प्रकाशक विनसर पब्लिशिंग कंपनी के कीर्ति नवानी ने मुख्यमंत्री और अतिथियों का स्वागत किया।
इस मौके पर राज्य अभिलेखागार की ओर से पुराने समाचार पत्रों और दस्तावेजों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। मुख्यमंत्री के साथ ही कार्यक्रम में आये अन्य लोगों ने इस प्रदर्शनी में काफी रुचि ली और इस तरह के प्रयास की प्रशंसा की।
समारोह में गृह सचिव एवं सूचना महानिदेश विनोद शर्मा, हार्क के महेन्द्र कुंवर, कांग्रेस नेता ब्रिजेश नवानी, डीएवी के प्राचार्य देवेन्द्र भसीन, मैती आंदोलन के कल्याण सिंह मैती, उत्तराखंड पत्रकार परिषद दिल्ली के महासचिव अवतार नेगी, प्रेस क्लब देहरादून के अध्यक्ष योगेश भट्ट, मुख्यमंत्री के मीडिया प्रभारी सुरेन्द्र कुमार, स्वतंत्र पत्रकार प्रमोद भारती, लघु सिंचाई सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष राजेन्द्र शाह, किसान-खेत मजदूर कांग्रेस के संयोजक डॉ. आनन्द सुमन सिंह, दून नर्सिंग होम के डॉ. जयंत नवानी, पत्रकार दर्शन सिंह रावत, राजेश भारती, अरुण श्रीवास्तव, अर्जुन सिंह सहित प्रदेश भर और देश के अन्य हिस्सों से आये पत्रकार और गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।
पुस्तक के संबंध में
उत्तराखंड की पत्रकारिता के इतिहास को प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर लिपिबद्ध करने के साथ ही स्वाधीनता आन्दोलन में इस क्षेत्र के समाचारपत्रों तथा पत्रकारों के असाधारण योगदान को भी उजागर कर नयी पीढ़ी के लिये एक मार्गदर्शी दस्तावेज के रूप में पेश किया है। इस पुस्तक में दुर्लभ पुराने अखबारों का संकलन और तत्कालीन पत्रकारों और साहित्यकारों द्वारा आजादी के आन्दोलन को भड़काने वाले उस साहित्य को भी संकलित किया गया है जिसे अंग्रेजी हुकूमत द्वारा प्रतिबंधित कर जब्त कर दिया गया था। यह प्रतिबंधित साहित्य राष्ट्रीय अभिलेखागार दिल्ली की आलमारियों में बंद है। विन्सर पब्लिशिंग कंपनी द्वारा पांच अध्यायों में प्रकाशित इस 312 पृष्ठ की पुस्तक का प्राक्कथन श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्व विद्यालय के कुलपति प्रोफेसर यू.एस. रावत ने लिखा है।
इसके पहले अध्याय में कलकत्ता से प्रकाशित ऑगस्टर हिक्की के बंगाल गजट से लेकर उत्तराखंड में आजादी के बाद के अखबारों के उदय तक का प्रमाणिक विवरण दिया गया है। दूसरे अध्याय में उत्तराखंड के अखबारों के स्वाधीनता आन्दोलन में योगदान का उल्लेख किया गया है। इसी मुख्य अध्याय में उत्तराखंड में स्वाधीनता आन्दोलन और उसमें शामिल पत्रकारों का विवरण दिया गया है। इनमें से केवल परिपूर्णानंद पैन्यूली के सिवाय बाकी सभी पत्रकार दिवंगत हो चुके हैं। इसमें टिहरी रियासत और हरिद्वार की पत्रकारिता के योगदान का वर्णन अलग से करने के साथ ही उत्तराखंड की पत्रकारिता की जन्मभूमि मसूरी से निकलने वाले ऐतिहासिक अखबारों को अलग से विवरण दिया गया है। तीसरे अध्याय में सामाजिक चेतना में अखबारों की भूमिका और चौथे अध्याय में प्रेस से संबंधित कुछ कानूनों का उल्लेख किया गया है। पांचवां और अंतिम अध्याय एक तरह से उत्तराखंड की पत्रकारिता का अभिलेखागार जैसा ही है, जिसमें ऐतिहासिक अखबारों के आवरणों/मुखपृष्ठों के साथ ही आजादी के आन्दोलन में जनमत जगा कर आन्दोलन की ज्वाला भड़काने के लिये स्वाधीनता संग्रामी पत्रकारों द्वारा रचे गये उन गीतों का संग्रह है जिन्हें ब्रिटिश राज में प्रतिबंधित कर जब्त कर दिया गया था। ये समस्त दस्तावेज राष्ट्रीय एवं राज्य अभिलेखागारों के साथ ही दिल्ली स्थित नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आदि श्रोतों से संकलित किया गया है। इससे पूर्व पत्रकार जयसिंह रावत की तीन अन्य पुस्तकें बाजार में चुकी हैं। इनमें सबसे पहली पुस्तक ग्रामीण पत्रकारिता पर तथा दूसरी पुस्तक उत्तराखंड की जनजातियों पर है। उनकी तीसरी पुस्तक हिमालयी राज्यों पर है।

 

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लो क सं घ र्ष !: काँग्रेस मठाधीश ने अपने प्यादोँ से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को घेरा

शनिवार, 16 सितंबर 2017





उत्तर प्रदेश मेँ निष्प्राण पडी काँग्रेस मेँ प्रत्यक्ष या परोक्ष कब्जेदारी को लेकर अभी भी घात प्रतिघात जारी हैँ और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष फिलहाल इन चालोँ मेँ फँसते दिखाई दे रहे हैँ ।
ऊपरी तौर पर अभी उत्तर प्रदेश काँग्रेस मेँ भले अभी सब ठीक ठाक दिखाई दे रहा हो लेकिन पर्दे के पीछे तलवारेँ भाँजे जाने की शुरूआत हो चुकी है , वजह है काँग्रेस हाईकमान की निगाह मेँ काफी दिनोँ से सँदिग्ध और अपनी सीट बचाने के लिए काँग्रेस की दर्जनोँ सीटेँ समाजवादी पार्टी के हाथ गिरवीँ रखने वाला एक चर्चित मठाधीश बाकी क्षत्रपोँ को प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को अपने प्यादोँ के जरिए अपनी घेरेबन्दी मेँ कामयाब होता दिखाई दे रहा है ।


दर असल वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश मेँ खुद से जुडे कार्यकर्ताओँ की सँख्या के लिहाज से निप्स अकेले हैँ । उनके साथ केवल एक कार्यकर्ता है जो कानपुर का युवा व्यवसाई और साधनसम्पन्न व्यक्ति है लेकिन राजनीतिक समझ और जमीनी पकड के लिहाज से शून्य है , चर्चा है कि राजबब्बर को सँसाधन वही उपलब्ध करवा रहा है और राजबब्बर की राजनीतिक हैसियत का उसी अनुपात मेँ लाभ उठा रहा है । उसकी यह कार्यशैली आमतौर पर प्रदेश काँग्रेस कमेटी मेँ बैठने वालोँ को अखर रही है लेकिन राजबब्बर की राहुल गाँधी पर मजबूत पकड के चलते ये पीसीसी ब्राँड काँग्रेसजन खुद को मजबूर पा रहे हैँ । इसका पूरा फायदा हाईकमान की निगाह मेँ सँदिग्ध उस शातिर मठाधीश ने उठाया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री के कार्यकाल मेँ पीसीसी मेँ घुसेडे गए अपने प्यादोँ के जरिए वर्तमान अध्यक्ष को पूरी तरह से अपने घेरे मेँ ले लिया ।

इस लिहाज से अगर यह कहा जाए कि वर्तमान अध्यक्ष दिखाने के अध्यक्ष तो खुद हैँ लेकिन पर्दे के पीछे से काँग्रेस की बागडोर उस मठाधीश ने थाम रखी है ।


अब स्थिति यह है कि उस मठाधीश की पकड से राजबब्बर को निकालने के लिए गोलबँदी का दौर शुरू हो चुका है और इस विपक्षी लाबी का कहना है कि राजबब्बर ने उस मठाधीश के प्यादोँ के घेरे से खुद को बाहर ना निकाला तो 2019 मेँ काँग्रेस भाजपा से नहीँ आपस मेँ ही लडती दिखाई देगी ।


इतने दिनोँ तक बाकी क्षत्रप तो चुप रहकर मौके का इँतजार कर रहे थे लेकिन विगत 13 सितँबर को इन्दिरा गाँधी जन्मशती समारोह मेँ राजबब्बर ने यह मौका खुद बाकी मठाधीशोँ को सौप दिया जब इस समारोह का मीडिया सँयोजन प्रदेश काँग्रेस के मीडिया प्रमुख व पूर्वमँत्री सत्यदेव त्रिपाठी की जगह उस मठाधीश की विधायक बेटी व एक अपने एक अन्य प्यादे के हाथ मेँ दिलवा दिया । तिहत्तर वर्षीय सँघर्षशील नेता सत्यदेव त्रिपाठी के लिए यह बडा आघात था और इससे आहत होकर उन्होने त्यागपत्र देने का मन बना लिया था । किन्तु यह बात फैलते ही बाकी क्षत्रप और अन्य उपेक्षित काँग्रेसी सत्यदेव त्रिपाठी के इर्दगिर्द इकट्ठा होने लगे और उन पर इस्तीफा ना देकर काँग्रेस के हित मेँ तन कर खडे होने का दबाव बनाया और वे इसमेँ कामयाब भी हुए ।


-भूपिंदर पाल सिंह

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नदी नालों में बहती उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था

गुरुवार, 7 सितंबर 2017


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गौरी की हत्या पर देहरादून के पत्रकार नेता खामोश क्यों ?

बुधवार, 6 सितंबर 2017

गौरी की हत्या पर देहरादून के पत्रकार नेता खामोश क्यों ?

हमारे उत्तराखण्ड के बारे में कहा जाता है कि जितने कंकर उतने शंकर। मतलब यह कि जितने पत्थर उठाओ उतने तरह के देवता मिल जायेंगे। लेकिन चूंकि मैं एक पत्रकार हूं इसलिये मैं इस धारणा को भी उसी चस्में से देख कर कह सकता हंूं कि इस राज्य में जितने पत्थर उतने पत्रकार और उतने ही पत्रकार संगठन भी निकल आयेंगे। एक छोटे से राज्य में हजारों की संख्या में पत्रकार और सेकड़ों की संख्या में पत्रकार संगठन हो गये हैं। लेकिन जब एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की बर्बरता से हत्या होती है तो किसी के मुंह से उफ तक नहीं निकलती है। कुछ पत्रकार हैं जो अपने स्तर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ नकारखाने की तूती की तरह बोल रहे हैं। लेकिन वे पत्रकार संगठन जो कि पत्रकारों के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं वे खामोश हैं। देहरादून और उत्तराखण्ड के पत्रकार संगठनों का असली चेहरा यही है। चूंकि मैं पत्रकारों की ट्रेड यूनियनों से सम्बन्धित रहा हॅंू और देशभर में उत्तराखण्ड के पत्रकारों की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये लड़ता रहा हूं। इसलिये मुझे देहरादून के पत्रकार नेताओं की इस उदासी पर दुख होता है। ये सत्य है कि गौरी लंकेश वामपंथी विचारों की पत्रकार थी और भाजपा और खासकर हिन्दूवादी संगठनों की आलोचना करती थीं। मैं यह भी मानता हूं कि हमारे राजनीतिक विचार हमारी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने चाहिये। लेकिन अगर वह एक विचारधारा विशेष के लिये समर्पित थीं भी तो क्या उसे इस तरह मारा जाना चाहिये था? अगर वह पत्रकार नहीं भी होती तो क्या किसी विरोधी विचारधारा वाले की जुबान इस तरह बंद की जानी चाहिये? मुझे बेहद खेद और शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारी देहरादून की पत्रकार विरादरी में गौरी की मौत पर कुछ लोगों के मन की खुशी छिपने से नहीं छिप पा रही है। देहरादून के पत्रकार संगठनों का गौरी की हत्या पर चुप रहना उनके मौन के उल्लास का ही परिचायक है। मैं मानता हूं कि अगर केरल में आरएसएस के लोगों का दमन हो रहा है तो वह भी निंदनीय है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उसके बदले में कोई गौरी लंकेश की मौत का जश्न मना ले। देहरादून के तथाकथित पत्रकार नेताओं का गौरी लंकेश की मौत पर खामोश हो जाना उनके असली चरित्र और मानसिक स्तर को उजागर करता है। मैं नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट का प्रदेश अध्यक्ष रहने के साथ ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य रहा हूं। मैं उस तथाकथित प्रगतिशील संगठन इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य होने के नाते उससे जुड़े एक प्रदेश स्तरीय संगठन का अध्यक्ष भी रहा हूं। सन् सत्तर के दशक से लेकर अब जबकि कि मैं एक तरह पत्रारिता के संगठनों की राजनीति से सन्यास ले चुका हूं, मैंने कई संगठनों में काम कर अपने साथियों के हितों के लिये काम किया और खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये देश विदेश में उठ रही आवाजों का साथ दिया। इसीलिये मुझे देहरादून के पत्रकार नेताओं के इस रवैये पर बेहद हैरानी हो रही है। ये लोग प्रेस क्लब की नेतागिरी और सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों के लिये तो मर मिट जायेंगे मगर एक पत्रकार की निर्मम हत्या पर जुबान नहीं खोलेंगे। अगर यही सिलसिला चलता रहा तो तो संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त हमारे मौलिक अधिकारों का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। उत्तराखण्ड राज्य बन चुका है और देहरादून राजधानी बन गया है मगर हम अभी भी कस्बाई पत्रकारिता की मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं। खेद है कि हम अभी भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, मैदानी, पहाड़ी, ठाकुर और ब्राह्मण की मानसिकता की पत्रकारिता से नहीं उबर पाये हैं।

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