Tuesday, February 9, 2010

लो क सं घ र्ष !: सब ख़ता वालिद की है, बेटे को पैदा क्यों किया

ऑस्ट्रेलिया में नस्लवाद

युवा वेश तो विदेशी आचार-विचार स्टाइल फैशन का क्रेजी होता ही है, हमारे बुजुर्ग जो कभी अंग्रेजी माहौल में पले बढ़े थे अब भी उसी पाश्चात्य संस्कृति के दीवाने नजर आते है, लेकिन हम आखिर कब तक उस खोखली संस्कृति के गुन गाते रहेंगे, हमारे कुछ युवक बड़े अरमान से आस्ट्रेलिया गये थे, शिक्षित होने के लिए तथा अमीर बनने के लिये परन्तु दुखद है कि उन्हे गरीब बनने की घुट्टी पिलाई जा रही है।
भारतीय छात्रों पर वहां जो नस्ली हमले काफी समय से हो रहे है, उसमें लगता है कि वहाँ की सरकार, अधिकारी तथा वहाँ की जनता का एक वर्ग पूरे तौर पर शामिल है, अजब हास्यास्पद है यह समाचार कि विक्टोरिया प्रान्त के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी साइमन आवेरलैंड ने छात्रों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी से बचते हुए यह सलाह दे डाली दी उनको हमलों से बचने के लिये अत्यधिक गरीब दिखना चाहिये, इस से ज्यादा आश्चर्यजनक यह बात है कि विक्टोरिया के प्रीमियर जान ब्रम्बी ने इस सुझाव का सर्मथन किया है। इस मामले पर भारतीय उच्चायुक्त सुजाता सिंह ने प्रीमियर से मिल कर कड़ी आपत्ति जता दी है।
राष्ट्रीयता, अंतर्राष्ट्रीय, देशभक्ति, वतनपरस्ती पर देश-विदेश के चिंतको, लेखकों ने बड़ी-बड़ी बाते कही है, टैगोर, इकबाल, गोल्डस्मिथ सभी के विचार तथा प्राचीन भारतीय विचारो से भी हम अवगत है, भारत के विचारकों ने बसुधैव कुटम्बकम की बात कही थी, गोल्डस्थिम ने कहा था कि मैं सांसारिक नागरिक हॅू। (I am citizen of the world ) इकबाल ने संकुचित विचारधारा के मुकाबले के लिये अपने को ऐसी मछली के समान माना जो पूरे समुद्र में विचरण करती है और मक़ामी क़ैद की तबाही से छुटकारा चाहती है।

हो कै़दे मक़ामी तो नतीजा है तबाही
रह बह में आज़ोर वतन सूरते माही।

परन्तु दुखद यह है कि इस वैज्ञानिक दौर में जब कि हम लौकिक या भौतिक विकास की सीढ़ियो पर चढ़ते चले जा रहे है, मानवीय क्षेत्र में हम पतनोन्मुख है और एक मानव को दूसरा मानव बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है, नस्लवाद हो, भाषावाद हो या क्षेत्रवाद हो, इन सब बातों से हम मानव तो क्या बन पायेंगे हाँ दानव ज़रूर बनते जा रहे है। सरकारों का परम कर्तव्य अपने नागरिकों या विदेशियों के रूप में आये मेहमानो को सुरक्षा प्रदान करना है, उनकी जान माल तथा आबरू को बचाना है मगर यह कैसी सरकारें है जो अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाय तथा उल्टी सीधी सलाहे देने लगें, पुलिस अधिकारी चोर को पकड़े और जिसके यहाँ चोरी हो उस को इस अपराध में पकड़ कर बन्द कर दें कि वह रात को सोया क्यों जिसके कारण चोर उसके घर का माल लूट ले गये। अब एक किस्सा सुनिये और बात खत्म:-
एक बार चुनाव में एक बेटा अपने बाप के मुकाबले पर खड़ा हो गया, फिर दिलावर फ़िगार ने इसी ऑस्ट्रेलिया अधिकारी के समान अपनी बात इस प्रकार कही थीः-
बाप का बेटा एलेक्शन में मकाबिल गया
इसलिये हर शख्स ने इल्ज़ाम बेटे को दिया
मैं यह कहता हूँ कि बेटे की ख़ता कुछ भी नही
सब ख़ता वालिद की है, बेटे को पैदा क्यों किया


डा0 एस0एम0 हैदर
फोन- 05248-220866

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Monday, February 8, 2010

लो क सं घ र्ष !: उत्तर प्रदेश पुलिस सबसे तेज

एक चुटकुला है कि दुनिया के कई देशों के पुलिस प्रमुखों की मीटिंग हो रही थी जिसमें ये था कि कोई अपराध होने पर किसी पुलिस प्रमुख ने कहा की हम 24 घंटे के अन्दर अपराधी को पकड़ लेते हैं किसी पुलिस प्रमुख ने कहा कि हम 48 घंटे में अपराधी को पकड़ लेते हैं तो उस मीटिंग में भारत की तरफ से उत्तर प्रदेश पुलिस प्रमुख ने कहा कि हमारे वहां पुलिस घटना के हफ़्तों पहले अपराधी को गिरफ्तार कर लेती हैहमारी पुलिसिंग सबसे तेज है
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में नक्सलवाद, आतंकवाद साम्प्रदायिकता और क्षेत्रियता को देश के सामने मुख्य चुनौती बताई कि उत्तर प्रदेश पुलिस शनिवार को दस्तक मैगज़ीन की संपादक श्रीमती सीमा आजाद उनके पति विश्वविजय अन्य महिला मानवाधिकार कार्यकर्ती आशा को माओवादी बता कर गिरफ्तार कर लिया उनके ऊपर आरोप है कि यह लोग प्रतिबंधित संगठन माओवादी के सदस्य हैंश्रीमती सीमा आजाद पर आरोप है कि वह माओवादियों को संरक्षण देती हैंपुलिस एस.टी.एफ ने गिरफ्तार कर अपनी तेजी का सबूत दे दिया कि प्रधानमंत्री के मुंह से नक्सलवाद शब्द निकला नहीं की उत्तर प्रदेश पुलिस ने तेजी दिखाते हुए तीन नक्सालियों को गिरफ्तार कर लिया इनकी पीठ इलेक्ट्रोनिक प्रिंट मीडिया ने ठोकनी शुरू कर दीजबकि वास्तविकता यह है कि इलाहाबाद कौशाम्बी के कचारी इलाकों में बालू खनन मजदूरों पर पुलिस-बाहुबली गठजोड़ के खिलाफ यह लोग आन्दोलन चलते थे वस्तुस्तिथि यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री पूरे प्रदेश में बालू खनन व्यवसाय पर अपने बाहुबलियों के माध्यम से कब्ज़ा किये हुए हैं अब पुलिस का अगला कदम यह होगा कि इन लोगों के परिवार के लोगों का उत्पीडन करेंगे ताकि इन फर्जी मुकदमों में कोई भी आदमी इनकी मदद के लिए खड़ा होआये दिन पुलिस का आतंक सामान्य नागरिको को भुगतना पड़ता हैरविवार को ही इलाहबाद में कोरांव के ओसफारा गाँव में पुलिस ने एक आदमी के घर दबिश दी और दबिश में वृद्ध की पुलिस पिटाई से परिवारवालों के समक्ष ही मृत्यु हो गयी पुलिस लाश लेकर भागने लगी गाँव वालों के व्यापक प्रतिरोध के बाद पुलिस लाश नहीं ले जा पायी और गाँव वालों के दबाव में खानापूरी करने के लिए दो पुलिस वालों पर मुकदमा दर्ज कर लिया गयाउत्तर प्रदेश में आये दिन पुलिस की पिटाई से लोग मर रहे हैं मुक़दमे जनता के दबाव में मुक़दमे दर्ज हो भी जाते हैं तो उनकी विवेचना भी उन्ही के साथी पुलिस वाले कर रहे हैंपुलिस के दोनों चेहरे साफ़ हैं अगर आप पीड़ितों की शोषितों की मदद आगे आयेंगे तो आपको भी पुलिस उत्पीडन के तहत जेल जाने की नौबत जाएगी

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

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Sunday, February 7, 2010

यदि सरकार की नजर में कुत्ते हैं तो हम भौंक कर अपना विरोध दर्ज कराएं

अभी हाल ही में मैंने भड़ासियों की तरफ़ से हमारे लोकसंघर्ष के महायोद्धा वकील साहब श्री रणधीर सिंह सुमन जी से फोन पर बात करी ये जानने के लिये कि आखिर ये क्या चल रहा है। उन्होंने जो कुछ भी बताया वह अत्यंत क्षुब्ध कर देने वाला है। बहन सीमा और उनके पति विश्वविजय के साथ ही एक सहयोगी आशा बहन पर भी सरकार के विरोध में विधि-विरुद्ध गतिविधियों में सलग्न होने का मामला दर्ज करा कर जेल में ठूंस दिया है अभी तक जमानत नहीं हुई है। आप जानते हैं कि ये "सरकार के विरोध में विधि-विरुद्ध गतिविधियां" क्या कहलाती है? भाई सुमन जी ने कानून के जानकार होने के नाते बताया कि यदि आप ये कहते हैं या लिखते हैं कि मौजूदा सरकार भ्रष्ट है,मिलावटखोरों की सरकार है या ऐसे ही कुछ अपने दिल की पीड़ा को बयान कर देते हैं तो बस तैयार हो जाइये सजा भुगतने के लिये वो भी कितनी....??? आजीवन कारावास तक हो सकता है। अगर किसी की ये जान कर फटने लगी हो तो मेहरबानी करके भड़ास की तरफ का रुख न करे क्योंकि हम तो जनसामान्य का रोष और आक्रोश यहां शब्दों में दर्ज करते हैं इसके लिये एक जीवन नहीं जब तक दुनिया बनाने वाला इस दुनिया में भेजता रहेगा तब तक जेल में ही जन्म लेने को तैयार हैं, इसे पागलपन कहिये या देशप्रेम लेकिन ये भड़ास के दर्शन का आधार है कि यदि हमें कभी वैचारिक सर्जरी के आरोप में सजा हो तो बेहतरी के लिये हम भुगतने को हंसते हुए तैयार रहें। देश और देशवासियों के लिये ये करने का निमित्त यदि ईश्वर ने हमें चुना है तो ये सौभाग्य है। भाई सुमन जी ने बताए के हिसाब से देखें तो स्थिति तो ये है कि एक दिन ऐसा आ जाएगा कि आप गूंगे,बहरे और अंधे बन कर रहें तभी जी सकते हैं यदि जरा भी चूं-चां करी तो आपकी ऐसी ली जाएगी कि सारी क्रान्ति का इरादा पिछवाड़े घुस जाएगा।
हम यदि सरकार की नजर में कुत्ते हैं तो हम भौंक कर अपना विरोध दर्ज कराएं क्योंकि हम गैंडे जैसी खाल वाली सरकार को काटने के चक्कर में अपने दांत गंवा बैठेंगे इसलिये भौंकिये,कांव-कांव करके सत्ता के प्रमाद में आकर बहरी और बेसुध हो चुकी सरकारें बौखला जाएं, ज्यादा से ज्यादा जान जाएगी यार..... कोई बात नहीं वो तो जानी ही है कौन साला हमेशा रहना है इसी काम के निमित्त ही सही...।
महामहिम राष्ट्रपति को उनकी वेबसाइट पर जाकर इस घटना की निंदा कड़े से कड़े शब्दों में निडर होकर दर्ज कराएं ताकि पहले नागरिक को पता तो चले कि आखिरी नागरिक नाखुश है,आक्रोश में है,पीड़ित है,उत्पीड़ित है और वो कानून के दांवपेंच नहीं समझता इसलिये सड़कों पर आकर पत्थर चलाने लगता है ये न हो इससे पहले इस दर्द का उचित इलाज तलाश लिया जाए न कि कराहने वालों को मार ही डाला जाए और ये कानून बना दिया जाए कि अब से स्वतंत्र भारत में कराहना जुर्म है।
आवाज उठाओ यारों वरना इसी तरह लोकतंत्र की रक्षा के लिये बने कानूनों को तुम्हारे ही खिलाफ़ दमनकारी शस्त्र की तरह प्रयोग करा जाता रहेगा।
बहन सीमा,बहन आशा और भाई विश्वविजय हम नैतिक तौर पर आपके साथ हैं बस हिम्मत हारना.....
जय जय भड़ास

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लो क सं घ र्ष !: सरकार के इस कदम के विरोध में.......

लोकसंघर्ष, दस्तक मैगज़ीन की संपादक सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय तथा अन्य साथी आशा की फर्जी मुक़दमे में गिरफ्तारी के विरोध में आज कोई पोस्ट प्रकाशित नहीं करेगा। सरकार के इस कदम की लोकसंघर्ष परिवार कड़े शब्दों में निंदा करता है।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

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Saturday, February 6, 2010

मनोभिलाष

सवेरे का वक्त था,

आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला

हरित पत्तियों पर ठिठकी

नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें,

प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में

बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार

मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला

सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते

धुँधले नीले पहाड़,

तब भी सड़कों पर पसरा अंधेरा,

जैसे झुट्पुटे के वक्त,

मलिष्ठ सड़कें

जलाचित बिखरे गड्ढे

मकानों से निकलता यहाँ-वहाँ पड़ा

कूड़े-करकट का ढेर

और बिखरता धूम;

सामने दीवार फाड़ते

पीपल की निर्वसना शाख पर

पराबध्द कुछ कौवे

नीचे ओहत कुकुर की सड़ती लोथ

वहीं पीछे छूटती

अभावमंडित

एक नीची छत की इमारत

बहुत छोटी और कुरूप

कुछ वर्गफुटों की

नितांत अकथनीय ।

अकस्मात !!!

खुला उसका कवाट

निकली एक पीवरी सद्यस्नात

धरे सिर पर पल्ला

ग्रह की सरल परिधि को लाँघ

आभा-परिहित-दमक रहा आनन उसका

भरिभाल पर झूलते मूँज से बाल,

सवत्स; जा रही हो जैसे मन्दिर

भग्न-प्रतिमा-सी तल्लीन

था जिसमे सहज समर्पण

अहं-मुक्त-भावों में लीन ।

पहन पीत वर्ण की साड़ी कस के पकड़े

यथा खींच लगाम, करें नियंत्रित

कर्दम-निमग्न-निगुंफित-हरित-बिछावन

पर धर अलक लगाए नंगे पाँव,

पड़े जिसमे कलरव करते नुपूर-युग्म,

निराशा में ज्यों विवर्धित हो प्रकाश

तेज होता उत्तरोत्तर बिन्दुकलनिनाद ।

भर उफाल

कर गई पार

वह कुछ मोड़ों के कटान,

अभिमुख उसके एक बस स्टॉप,

वही था उसका मन्दिर, शुभ स्थान;

यातायात के उस अवज्ञात चिह्न पर लगा

तिलक अक्षत हुई वह नतमस्तक, कर प्रणाम

बैठ दंडवत, हो भावों में अभिरत करा विचार विगत का,

-"कल मिले थे यहीं कुछ ग्राहक, आज भी

करना वही क्रपा हे ईश तुम मुझ पर"-

भर आये उपात अवरूद्ध हुआ कंठ चूम ललन का ललाट बोली,"

अयाचित से कुछ अधिक ही पाया, तेरे प्रसाद को भी समझा निर्माल्य,

विलोक जब पुत्र के लिलार पर पड़ती मेरे कर्मों की प्रतिच्छाया

फूले थे हाथ-पाँव लगा भविष्य अंधियारा,तब विसर्जन का भी

एक बार उपजा विचार पर देख उस नवजात की

सहज-सलोनी-चितवन भूल बैठी मैं

समस्त जग के भावी चिंतन

हुए अंतर्हित वे गत विचार, फैल उठे आशाओं

के हर्म्यस्थलों के अंतहीन विस्तार;

यहाँ पुत्र ही मेरा संबल, जीवनाधार,है अब ध्येय

एकमात्र हो इसका श्रेष्ठ-उत्तम-विकास

समाज के मुक्त हस्तक्षेप के चलते जो नहीं पा सकी

मैं हतभागी, उससे भी लक्षाधिक देना हे ईश

पुत्र को मेरे, यही बस याचित मनोभिलाष ।

प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com


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मिथिला पुत्र लल्लन प्रसाद ठाकुर जयन्ती पर्व, जन्मदिन और माधव सेवा।

कल मिथिला पुत्र स्वलल्लन प्रसाद ठाकुर का जन्म दिवस था और इस तिथि समारोह में तब्दील कर सामाजिक सेवा के साथ सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन कर स्व. एल पी. ठाकुर स्मृति न्यास ने ठाकुर जी को सम्पूर्ण श्रधांजलि दी।

जैसा की न्यास की अध्यक्ष सुश्री कुसुम ठाकुर ने बताया कल सुबह सुबह कुष्ठ रोगियों के लिए कैम्प का आयोजन किया गया था जिसमें रोगियों के लिए दवाई, इलाज के साथ वस्त्र और भोजन की व्यवस्था की गयी थी।


सुश्री ठाकुर ने बताया कि न्यास कई दिनों पूर्व से ही इसकी तैयारी कर रहा था और इस कार्य में डाक्टर विनोद कुमार ठाकुर ने निस्वार्थ भाव से अपनी सम्पूर्ण सेवा दी, इस कैम्प के लिए वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह भी सार्थक सहयोगी थे।

लल्लन जी इंजिनियर थे मगर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, अपने पेशे के अतिरिक्त लेखन और सामाजिक कार्य में सदैव अग्रणी रहते थे, मैथिली भाषा के लिए व्यापक लडाई के अगुआ थे।

मैथिली में विभिन्न नाटकों कविताओ और एकांकी को लिखने वाले लल्लन जी जीवंत पर्यंत अपने सामाजिक कार्यों से जन चेतना का संचार करते रहे।

आज लल्लन जी नहीं हैं मगर उनके पीछे उनका भरा पूरा और समृद्ध परिवार मिथिला की शान है और एल. पी.  ठाकुर स्मृति न्यास के माध्यम से उनकी अर्धांग्नी सुश्री कुसुम ठाकुर जनजागृति और सामाजिक कार्यों को सदैवगति देतीं हैं।

कैम्प से वापस आने के बाद कुसुम जी ने अपनी व्यथा फेसबुक पर इस तरह लिखी है कि 
ऐसा देश जिसके मात्र एक शहर में, १० लाख की आबादी में कम से कम ६- ७ हज़ार कुष्ठ रोगी हों और सरकार या नेता मात्र चुनाव के समय में वोट मांगने जाएँ और कुछ खाद्य सामग्री दे उनसे वोट तो ले लें, पर जो सरकार की मुफ्त सेवायें हैं उसे भी मुहैया न कराये उस देश को कतिपय प्रगतिशील देश नहीं कह सकते" सरकार, प्रशासन और सम्बंधित विभाग की चिकित्सा के नाम पर ढोलक बजाने वाली भोंपू की हकीकत को उजागर करती है।

भड़ास स्व. लल्लन प्रसाद ठाकूर को श्रधांजलि अर्पित करता है।

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लो क सं घ र्ष !: खबरदार! बाजार उदार हो गया है।

सर्वत्र उदारीकरण-उदारीकरण की चिलपों मची हुई है। हर कोई उदारीकरण का राग अलाप रहा है। ऐसे में बाजार भी किसी से पीछे नहीं है। बाजार भी कह रहा है कि वो उदार है। आज अगर कोई नंगा दिखता है तो समझिये वो फैशन परस्त है। आज कोई भूखा है तो समझिये वो डाइटिंग कर रहा है। आज कोई परेशान है तो समझिये परेशान होना उसकी फितरत है। आज कोई घी नहीं पीता तो समझिये घी पीने से उसका पेट खराब हो जाता है। बाजार सारी आम-ओ-खास चीजे उदार हो कर दे रहा है। वह भी जीरो परसेंट इंट्रेस्ट पर। है न गजब की उदारता! बाजार बहुत उदार हो चला है। आज शिकायत वो नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। ‘हमें तो कोई पूछता नहीं’ का दर्द अब नहीं रहा। आज परेशानी की वजह तो ‘अरे यार ये तो पीछे पड़ गये’ है। आप क्या सोच रहे है? यही न! क्या कभी बाजार भी उदार हो सकता है? क्या बाजारू शब्द का अर्थ बदल गया है,जो बाजार की विशेषताओं के कारण ही अस्तित्व में आया! वो बाजार जहाँ बड़े से बड़े पल भर में नंगे हो जाते है, क्या अब वो वैसा नहीं रहा! वो बाजार जो किसी को नंगा करने के बाद शर्मता भी नहीं, क्या उसका हृदय परिवर्तन हो गया है! फिलहाल बाजार तो यही कर रहा है कि वो उदार हो गया है।
बाजार खुद पूछ रहा - बच्चे तूझे दौड़ में फस्ट आना है कि नहीं! बिटिया तुझे मिस इंडिया बनना है कि नहीं! भाई साहब आप अपने गिरते बालों को रोकते क्यों नहीं! बहन जी आप को समझदार गृहणी बनती क्यों नहीं! आज बाजार आप को परेशान होता हुआ नहीं देख सकता। वो आप का हाल ले रहा। वो आपकी चाल देख रहा। वो बहुत उत्सुक दिखता है आपकी समस्याओं का समाधान करने के लिये। अब तो उसकी उत्सुकता अधीरता में बदल चुकी है। वो समाधान लिये-लिये इधर से उधर बेसब्र घूम रहा है। आपका दरवाजा खटकटा रहा है। डोर बेल बजा रहा है। एस.एम.एस. भेज रहा है। फोन कर रहा है। रेडियों पर बोल रहा है। टी.वी. से झांक रहा है। इंटरनेट में घुस कर बैठा है। आज बाजार ने घेर लिया है आपको चारों तरफ से। आप अकेले रहना चाहते है तो रह नहीं सकते। जहाँ जाओ वहाँ बाजार पहले से खड़ा है,अपनी बांहे पसारे आपके स्वागत के लिये। बाजार जा कर खरीदारी करें तो अच्छा, घर बैठ कर खरीदारी करें तो अच्छा। अपना मुहँ खोलकर अपनी जरूरतें बतायें तो ठीक, इशारे से बताये तो ठीक। बाजार जेब में नकद रख कर जाते हैं तो बेहतर, अगर क्रेडिट कार्ड रख कर जाते है तो बेहतर। जैसा बाजार आज है वैसा पहले कभी नहीं रहा।
बाजार सिर्फ आपके जरूरतों को ही नहीं पूरा करता, बल्कि आज उसने खुद को इतना आकर्षक बना लिया है, उसको देखकर ही जरूरत खुद-ब-खुद पैदा हो जाती है। बाजार प्रतिदिन किसी न किसी वस्तु की सेल चला रहा है। आये दिन कोई न कोई स्कीम दे रहा है। किसी आइटम पर अप्रत्याशित रूप से छुट दे रहा है। बाजार कहता है कि सारी दुनिया आपके घर में पहंुचा देगा, वो भी महज कुछ मिनटों में, आप बस एक आर्डर करें। घर में बैठे-बैठे पिज्जा खिला दें रहा है। आप से ‘एस्कुयूज मी’ कह कर आपकी वित्तीय जरूरतों को पूछ रहा है। दुनियाभर का सामान एक ही जगह डिपाटमेंटल स्टोर में दे रहा है। डाइनासोर के आकार के शापिंग माॅल दे रहा है। बिना ब्याज के गाड़ी दे रहा है। बाजार की उदारता यहीं नहीं खत्म होती। उसके उदारता की परिधि बहुत व्यापक है। बाजार उदारता के साथ आपके शुभचिंतक होने का रोल भी अदा कर रहा है। जल्द करें मौका छुट न जाये! बाजार आपको चेता रहा है। आपको दूरदृष्टि दे रहा है, यह कह कर कि स्टाक सीमित है। ये छुट बस कुछ दिनों तक, बता कर आपको समय का पाबंद बना रहा है। कंपनी का प्रचार है फायदा आपका, यह गूढ़ रहस्य भी बता रहा है।
बाजार मददगार बन गया है। आपको हेल्पलाइन दे रहा। बाजार आप का केयर भी करना जानता है। वो आपको कस्टमर केयर भी दे रहा है। बाजार की उदारता की परिधि बहुत व्यापक है, जैसा कि पहले भी कहा। मात्र एक रूपये में विश्व भ्रमण करवा दें रहा है। एक कोल्ड ड्रिंक पीने पर क्रिकेट का वल्र्ड कप दिखावा दे रहा है। अण्डर वियर खरीदने पर कार दे रहा है। पच्चीस पैसे की चीज पर करोड़ों इनाम दे रहा है। बस एक एस.एम.एस. करने पर बेशकिमती चीजे दे रहा है। स्कैच कार्ड स्कैच करवा कर किस्मत बदल रहा है।
बाजार, सुविधा, समाधान, सपने दे रहा है। बाजार किस्मत जिदंगी, हालात बदलने की बात कर रहा है। बाजार अब क्रूर नहीं रहा, वो उदार हो गया है। बाजार ने अपना व्यवहार बदल लिया है। बाजार ने अपना रूप बदल लिया है। बाजार ने अपना रंग बदल लिया है। अब आप पूछेंगे, और बाजार का चरित्र! तो सुनिये सर, बाजार कहता है कि वो अपना चरित्र भी बदलने को तैयार है, मगर उसके लिये कंडिशन अप्लाई है यानि कि शर्तें लागू...।

अनूप मणि त्रिपाठी
09956789394

लोकसंघर्ष पत्रिका के मार्च अंक में शीघ्र प्रकाशित

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करकरे की लापता जैकेट खोजते राहुल तो अच्छा रहता'

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के मुंबई दौरे को लेकर शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा है कि मुंबई ‘दिल्लीवालों’ के लिए हमेशा एटीएम यानी ऑल टाइम मनी रही है। लोकल ट्रेन से सफर करने का ड्रामा करने वाले राहुल गांधी ने यदि चोर बाजार जाकर शहीद हेमंत करकरे की लापता बुलेट प्रूफ जैकेट खोजने का काम किया होता, तो ज्यादा अच्छा होता।राहुल की मुंबई यात्रा तस्‍वीरों में देखने के लिए क्‍िलक करें...* शिवसेना भवन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि शिवसेना प्रमुख ने काले झंडे दिखाकर राहुल गांधी का स्वागत करने का आदेश दिया, तो पूरी सरकार सकते में आ गई। शिवसेना का राहुल का विरोध करने का आंदोलन सफल होने का दावा करते हुए उद्धव ने शिवसैनिकों की पीठ थपथपाई है। उन्होंने कहा कि यह शिवसेना की ताकत का ही परिणाम है कि राहुल गांधी को अपने कुछ कार्यक्रम रद्द करने पड़े। अपने मार्ग में तब्दीली करनी पड़े और सरकार को उनकी सुरक्षा में पूरी ताकत लगानी की भूमिका में मुख्यमंत्री : मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने राहुल गांधी के दौरे के वक्त फौजदार की भूमिका निभाई। यह आरोप शिवसेना कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने लगाया है। उन्होंने कहा कि राहुल की अगवानी में मुख्यमंत्री ने रमाबाई आंबेडकर नगर में करीब 3 घंटे गुजारे जबकि गृह राज्यमंत्री रमेश बागवे पर दौरे के दौरान राहुल के जूते संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उद्धव ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अपनी सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों की तैनाती को देख कर राहुल गांधी को मुंबई पुलिस की ताकत का अंदाजा आ गया होगा। उन्होंने एक बार फिर दोहराया है कि शिवसेना मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कांग्रेस की साजिश को किसी भी हालत में सफल नहीं होने देगी।

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Friday, February 5, 2010

चेन्या के बदलाव के चित्र


शिरीष खरेChenya.JPG

‘‘मुंबई तेरी फुटपाथ पर/अनगिनत काम करते ये बच्चे/रात और दिन पसीना बहाते हुए/दौड़ते, भागते/ठहरते, हांफते/फिर भी हंसते हुए/मुसकुराते हुए/रंगीन गुब्बारे या प्लास्टिक की गाड़ी/फिल्मी अखबार या रेल की

चौपड़ी/कंघियां काली और लाल, छोटी बड़ी/बच्चे कहने को सामान यह लाए हैं/सच तो यह है कि खुद बिकने को आए हैं।’’

‘मुंबई तेरी फुटपाथ पर’- जावेद अख्तर की इस कविता के उलट, एक बच्चा ऐसा भी है, जो तंग झोपड़पट्टियों और बंद गलियों से पढ़ते हुए, अपने पैरों से चार कदम आगे चलते हुए, कागजों पर नए-नए चित्रों को गढ़ता है। जहां दूसरे बच्चे, गलियों जैसे मोड़ों या मोड़ों जैसी गलियों से गुजरते हुए- गाड़ियों के कई-कई शीशों को धोते हैं, उम्र के मुकाबले ढ़ेरों जख्मों को सहते हैं, वहीं से अपने सीने में जख्मों की बजाय ढ़ेरों मेडल लटकाए, देखो चेन्या नाम का यह बच्चा भी आया है।

चेन्या मुंबई के उस इलाके से है, जिसमें रोज-रोज की छोटी-छोटी ख्वाहिशों की सांसे इन दिनों कुछ ज्यादा ही फूलने लगी हैं- यहां की <5> <5000> <35000> और <उनके बीच 15000 से भी ज्यादा बच्चे> रहते हैं। इतने बड़े और घने हिस्से में <केवल 7 आंगनबाड़ियां> हैं। यानि औसतन <715> <7000> <2000> के हिस्से में <केवल 1 आंगनबाड़ी> है। इसके अलावा <बाम्बे महानगर पालिका का 1 स्कूल> है भी तो यहां से <3>। मुंबई की ज्यादातर झोपड़पट्टियों में ऐसा ही असंतुलन है। चेन्या मुंबई के उस इलाके से है, जिसमें बच्चों के माता-पिताओं का हाल यह है कि उन्हें <हर रोज खाने के लिए हर रोज काम मिल ही जाए-ऐसा जरूरी नहीं>। ऐसे में <परिवार के गुजारे के लिए बच्चों को काम पर भेजना> जरुरी मान लिया जाता है। इसलिए यहां चेन्या जैसे बच्चों को बेहतर शिक्षा की सहूलियतें पाने के लिए पथरीले रास्तों से गुजरना पड़ता है। कुल मिलाकर एक तरफ <गहरी नींद में डूबी व्यवस्था> है, तो दूसरी तरफ है <गृहस्थी ढ़ोने की भारी जवाबदारी>- और इन दोनों हालातों के बीच बचा है <चेन्या जैसे बच्चे का बचपन>। जो बेवजह खो जाने की बजाय <इंजीनियर बनने का ख्वाब> लिए है, यहां के लिए यह ख्वाब <साधारण नहीं> है।

वैसे तो देश के करोड़ों बच्चों की तरह चेन्या के भी स्कूल जाने में कुछ खासियत नजर नहीं आती। मगर यहां से स्कूल के रास्ते रोकने वाली ताकतों के मजबूत गठजोड़ को देखते हुए चेन्या का स्कूल जाना असाधारण लगता है। 11 साल का चेन्या फिलहाल कक्षा 3 में है। यह वाशीनाका झोपड़पट्टी के बंजारटंडा, भरतनगर में रहता है। यहां से 3 किलोमीटर दूर- नेशनल केमीकल फर्टीलाइजर कालोनी के कैंपस में बाम्बे महानगर पालिका का स्कूल है। इसलिए चेन्या स्कूल आने-जाने के लिए रोजाना कम से कम 6 किलोमीटर का रास्ता पैदल ही पार करता है। उसके परिवार में उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा भाई भी है। उसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जो हमेशा से अनिश्चिताओं पर टिकी होती है। चेन्या का बड़ा भाई अभी 13 साल का ही है, उसके नन्हें कंधों पर परिवार का आर्थिक बोझा है, जिसे उठाने के लिए उसे पास के रेस्टोरेंट में जाना पड़ता है। उसके चेहरे पर, चेन्या के चेहरे की तरह न तो सुकून झलकता है, न जुनून। 10 साल पहले, यह परिवार रोजीरोटी के चलते कर्नाटक के छोटे से गांव गुलबर्गा से मुंबई आया था।

चेन्या के आजकल
चेन्या के भीतर सुंदर संदेश देने वाले बहुत सुंदर-सुंदर चित्रों को बनाने की बेजोड़ कला है। बीते 2 सालों में उसने बहुत सारी इंटर स्कूल प्रतियोगिताओं में भागीदारी करके बहुत सारे पुरस्कार और मेडल पाए हैं। इस साल भी उसने इंटर स्कूल प्रतियोगिताओं में भागीदारी करते हुए 3 पुरस्कार पा लिए हैं। उसके शिक्षकों का कहना है कि चेन्या के भीतर चित्रकला की ही तरह पढ़ने-लिखने की भी खूब लगन है। इस स्कूल का वह एक अच्छा और होनहार छात्र है।

चेन्या के ज्यादातर चित्रों में उसके आसपास की दुनिया के दृश्यों के साथ-साथ कल्पना के पुट भी दिखाई देते हैं- जैसे घर के चित्र को ही लो तो ज्यादातर बच्चे घपड़ों की छत और घासपूस की दीवारों वाला ऐसा घर बनाते हैं जो गांव से दूर एक पहाड़ी पर होता है, जिसके आसपास कोई दूसरा घर होने की बजाय एक नदी, एक जंगल, एक मंदिर, एक सड़क और सूरज का नजारा मिलता है। जबकि चेन्या अपने झोपड़े और उसके आसपास की पट्टी को हू-ब-हू उभार देता है। ऐसा करते हुए वह अपनी कल्पना के घोड़े को दौड़ाता है और कुछ दृश्यों को अनुपात से बड़ा, तो कुछ दृश्यों को अनुपात से छोटा कर देता है, जैसे कि एक जगह पर रेड लाईट से टकराता चांद, लगता है मानो दोनों के बीच किसी बात को लेकर धक्कामुक्की चल रही हो। चेन्या के चित्रों में शहरी सभ्यता का हर रुप और उसमें शामिल चीजें जैसे ऊंची ईमारतें, मोटर, कार, रेल, हवाईजहाज, सिनेमाहाल, होर्डिंग्स, लाइटिंग, ट्राफिक और भीड़ दिखाई तो देती हैं, मगर जब वह अपनी रचनात्मकता से ऐसी चीजों के आकार या आकृतियों को बदलता है तो लगता है कि उनमें कोई गहरे भाव छिपे हैं। उसे अपने हुनर में रंगों की भी अच्छी मिलावट करना आता है। तेजी से चित्र बनाने वाले चेन्या के नन्हें हाथों को देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

चेन्या के चित्रों की और एक खासियत है- उनमें कई बार तरह-तरह की मशीनें दिखाई देती हैं। दिलचस्प यह भी है कि वो ऐसी मशीनों के चित्र बनाते वक्त उनमें अपने हिसाब से कुछ जोड़ता-घटाता है। वह कहता है कि बड़ा होकर मशीनों का इंजीनियर बनना चाहता है। वह घर की गरीबी दूर करने और अपने दोस्तों की मदद करने की बात भी कहता है। फिलहाल चेन्या के गालों पर पड़ती मुसकुराहट से उदासी और अंधरे किनारे लगते हैं। यहां के लिए वह हकीकत के पंखों पर सवार एक सपना जैसा है, जो आजकल बार-बार अपने पंख फड़फड़ाने को बेताब रहता है।

चेन्या जैसे दोस्तों के लिए
चेन्या के पीछे छिपे कलाकार को सामने लाने और उसे लगातार बढ़ावा देने के लिए ‘समता मित्र मंडल’ और ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाओं ने भरपूर साथ दिया है। यह दोनों संस्थाएं मिलकर- यहां की 3 झोपड़पट्टियों में, बच्चों के अधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले मानवीय अधिकारों के लिए काम करती हैं। इन संस्थाओं ने ऐसे इलाकों में ‘बाल सक्ष्म केन्द्र’ तैयार किए हैं, यहां बच्चों को पढ़ने-लिखने का मौका देने और विभिन्न कलाओं मे उनकी दिलचस्पियों को प्रोत्साहित किया जाता है। यहां चेन्या जैसे ही कई दोस्तों में बदलाव लाने के लिए उनकी पसंदगी/नापसंदगी और ताकत/कमजोरियों के बारे में पूछा जाता है। यहां बच्चे, उनके परिवार वाले और शिक्षक एक साथ बैठकर- आपसी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। यहां से ही बड़ी तादाद में बस्ती के बच्चों को बाम्बे महानगर पालिका के स्कूल में दाखिल करवाने का अभियान चलाया जा रहा है।

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शिरीष खरे ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘संचार-विभाग’ से जुड़े हैं।
संपर्क : shirish2410@gmail.com
ब्लॉग : crykedost.tk


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Shirish Khare
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I believe that every Indian child must be guaranteed equal rights to survival, protection, development and participation.
As a part of CRY, I dedicate myself to mobilising all sections of society to ensure justice for children.


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धर्म का सच्चा रुप

धर्म कौन बड़ा है शायद इसका उत्तर इससे बेहतर नहीं हो सकता है।
साभारः दैनिक जागरण दिनांक 05.02.2010

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हिंदी फिल्म "हल्ला बोल" जैसा लग रहा है शाहरुख खान-ठाकरे विवाद


पिछले कुछ दिनों से मुंबई में शिवसेना और शाहरुख खान का लगातार चल रहा विवाद देख रही थी। भाईसाहब डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने इस विवाद के शुरू होते ही एक घोषणा कर दी थी कि इस मामले के कारण शिवसेना खुद ही अपने ताबूत में कील ठोक रही है। शाहरुख ने इस मामले में विनम्रता बनाए रखते हुए राष्ट्रीय वैचारिकता का उत्तम परिचय दिया साथ ही अपनी उस स्थिति को भी परख लिया कि वे कितने मजबूत हैं। इस पूरे प्रकरण में अभी कुछ समय पहले आयी एक हिंदी फिल "हल्ला बोल" याद आ गयी जिसमें समीर खान( अजय देवगन) एक नामचीन अभिनेता हैं और परिस्थिति वश एक इसी तरह के राजनेता से भिड़ जाते हैं। यकीन मानिये कि शाहरुख ने जो रुख अपनाया वह काफ़ी हद तक अपनी लोकप्रियता और रीढ़ की हड्डी की मजबूती के चलते सही था और उस फिल्म से प्रेरित था क्योंकि शाहरुख जानते हैं कि बालठाकरे जैसे लोग उनकी लोकप्रियता के आगे कीड़े हैं। शिवसेना के संजय राउत ने धमकी दी के शाहरुख का घर "मन्नत" मुंबई में है, माय नेम इज़ खान नामक फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे, उन्हें मुंबई आने पर देख लेंगे वगैरह......। इन सियारों ने इकट्ठा होकर शाहरुख के घर पर पथराव करा, उसके पोस्टर फाड़े ऐसे में आप सोचिए कि शाहरुख के पत्नी बच्चों पर क्या बीती होगी, ये बिल्कुल फिल्म के सीन का हकीकत में होने जैसा था।
आज देखा कि सामना के एडिटर संजय राउत ने थूक कर चाट लिया, कल उद्धव ठाकरे ने भी थूका और चाटा ये कह कर कि शाहरुख से उनके अच्छे संबंध हैं लेकिन वो लोग जो कर रहे हैं मुंबई के लिये कर रहे हैं। हल्ला बोल फिल्म में फिल्म का नायक राजनेता के घर जाकर उसके यहां पेशाब करके नेता को उसकी औकात बता देता है। ठाकरे और उसके लोमड़-सियारों को आज राहुल गांधी ने भी आकर इनकी सही औकात बताई है, पहले बहुत बकबक जारी थी फिर बोले काले झंडे दिखायेंगे। ये बेवकूफ़ मरते हुए लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि फासीवाद की एक उम्र होती है और वह पूरी हो चुकी है इस जर्जर सोच को लेकर ये अब ज्यादा समय तक राज्य नहीं कर सकते ये धीरे धीरे मर रहे हैं। इसी सोच से पैदा हुआ राज ठाकरे नाम का छोटा सियार भी बहुत भन भन करता है लेकिन उसे भी भारत की राष्ट्रीय सोच एक दिन मार ही देगी और ये लोग देश छोड़ कर या तो भाग जाएंगे या फिर यहीं कहीं ठेकेदारी दलाली करते नजर आएंगे। राहुल गांधी को काले झंडे दिखाओ या पीले उससे क्या फर्क पड़ने वाला है। पुलिस ने कुछ सियार पकड़ कर पिंजरे में कर दिये हैं बाद में छोड़ दिये जाएंगे कि जाओ और हुआ हुआ करो
शिवसेना का मुंह पूरी तरह से काला हो गया है, मैं भले ही कांग्रेस से सहमत नहीं पर फासीवादी शक्तियों को परास्त होते देख कर अच्छा लगा। मैंने मुंबई में इन दुष्टों का आतंक देखा है लेकिन आज इनका पराभव भी देख रही हूं।
जय जय भड़ास

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लो क सं घ र्ष !: साहित्य अकादमी: सगुण विरोध् ही कारगर होगा

दक्षिण कोरिया की बहुराष्ट्रीय कंपनी समसुंग इंडिया और भारत की केंद्रीय साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधन में भारतीय भाषाओं के लेखकों को ‘टैगोर साहित्य पुरस्कार’ देने के पफैसले का हिंदी के कई लेखकों ने विरोध् किया। विरोध् का सिलसिला इस योजना का पता लगने के साथ ही शुरू हो गया था। विरोध् में ज्यादातर हिंदी के लेखक सामने आए। कापफी बाद में इक्का-दुक्का दूसरी भाषाओं के कुछ लेखकों के नाम विरोध् करने वालों में सुनने को मिले। पुरस्कार वितरण वाले दिन कुछ लेखकों ने साहित्य अकादमी के बाहर मानव श्रृंखला बना कर सक्रिय विरोध् दर्ज किया। लेकिन कंपनी और अकादमी पर लेखकों के विरोध् का कोई असर नहीं हुआ। अकादमी की तरपफ से कोई स्पष्टीकरण भी नहीं आया। कंपनी पहले ही यह घोषणा कर चुकी है कि वह ये पुरस्कार सामाजिक दायित्व निभाने के उद्देश्य से देने जा रही है। पहली खेप में 25 जनवरी को हिंदी समेत आठ भाषाओं के लेखकों को पुरस्कृत किया गया। 61वें गणतंत्रा दिवस पर मुख्य मेहमान के रूप में भारत आए दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की पत्नी ने ये पुरस्कार लेखकों को प्रदान किए। पिछले कई सालों से उड़ीसा के आदिवासियों के अस्तित्व का संकट बनी पोस्को कंपनी दक्षिण कोरिया की है। इसी वजह से वहां के राष्ट्राध््यक्ष को मुख्य मेहमान बनाया गया। यह भारत सरकार की आदिवासियों को दुत्कार और पोस्को को चुमकार है।
कहने की जरूरत नहीं कि पुरस्कार की योजना और कार्यक्रम लेखकों के सहयोग से सपफल हुए। अकेले अकादमी अध््यक्ष, उपाध््यक्ष और विभिन्न भाषाओं की समितियों के सदस्य चयन-प्रव्रिफया को अंजाम नहीं दे सकते थे। उसमें पुरस्कृत भाषाओं के बहुत-से लेखकों का सहयोग हुआ है। पुरस्कृत लेखकों का तो हुआ ही है। यानी भारतीय भाषाओं के लेखकों की सहमति से ही कंपनी और अकादमी का यह गठजोड़ संभव हुआ है और आगे भी बना रह सकता है। भविष्य में समर्थक लेखकों की संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है। साहित्य अकादमी के पुरस्कारों का सबसे ज्यादा महत्व है। जिन्हें वह नहीं मिल पाता वे कंपनी की स्टैंप वाला पुरस्कार पाकर ही संतोष कर सकते हैं। जाहिर है, उसके लिए उन्हें अपना सहयोग और समर्थन कंपनी-अकादमी गठजोड़ को देना होगा। बाजार की कीच में पिफसलने वाले ही नहीं, गंभीर लेखक भी उनमें शामिल होंगे।
विरोध् करने वाले लेखकों के मत में इस तरह के गठजोड़ से साहित्य अकादमी की स्वायत्ता खंडित होती है। कुछ ने इसे स्वयत्तता का अंत माना है। यह बिल्कुल सही है कि साहित्य अकादमी की स्वायत्तता बरकरार रहनी चाहिए। अतीत में वह कापफी हद तक रही है। साहित्य अकादमी में सरकारों और नेताओं की दखलंदाजी उस तरह से कभी नहीं रही जैसी राज्य-स्तर की अकादमियों में होती है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि सरकारें और पार्टियां लेखकों को आगे करके साहित्य अकादमी सहित अन्य केंद्रीय अकादमियों में अपना हस्तक्षेप नहीं करती रही हैं। उस तरह से नामित हुए लेखक कई बार सुविधओं व पुरस्कारों का बांट-बखरा भी करते हैं। अपने शासनकाल में भाजपा के नेताओं ने उर्दू के लेखक प्रोपफेसर गोपीचंद नारंग को आगे करके अकादमी के अध््यक्ष पद के चुनाव में दखलंदाजी की थी। वह चुनाव कापफी विवादास्पद बन गया था। महाश्वेता देवी से चुनाव जीतने के बाद प्रोपफेसर नारंग ने अकादमी में कापफी मनमानी की। प्रोपफेसर नामवर सिंह ने उनके जीतने पर अकादमी में जाना बंद कर दिया था। उन्हें यह आशा रही होगी कि उनके एहसानमंद लेखक अकादमी न जाने में उनका साथ देंगे। लेकिन प्रोपफेसर नारंग को लेखकों के सहयोग की कमी नहीं रही। कहने का आशय है कि अकादमी तभी स्वायत्त बनी रह सकती है जब लेखक अपनी स्वायत्तता बना कर रख सकें।
नवउदारवादी दौर में पिछले करीब 20 सालों से देश की संप्रभुता पर गहरा संकट है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी की चर्चा अक्सर होती है। इस दौर में भारत सरकारों ने ऐसे सौदे और समझौते किए हैं जिनके चलते संवैधनिक और आजादी की विरासत के मूल्यों को गहरी ठेस पहुंची है। देश की लगभग समूची मुख्यधरा राजनीति इस ध्त्कर्म में शामिल है। लेखक गहरी नजर रखने वाले लोग होते हैं। उनसे यह सब व्यापार छिपा नहीं है। लेखकों से यह भी नहीं छिपा है कि विश्व बैंक, अंतरर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के डिक्टेट पर जो ‘नया भारत’ बनाया जा रहा है, वह पूंजीवादी-उपभोक्तावादी भारत है। वहां हर मनुष्य और मानवीय उद्यम की कसौटी बाजार है। सरोकारध्र्मी लेखक यह भी जानते हैं कि ‘नए भारत’ में देश की विशाल वंचित आबादी के लिए कोई जगह नहीं है। समानता, स्वतंत्राता या सम्मान की बात तो जाने ही दीजिए।
ऐसे परिदृश्य में साहित्य एवं कला की अकादमियां स्वायत्त नहीं बनी रह सकतीं, यह भी लेखकगण जानते हैं। जानते वे यह भी हैं कि अकादमी की स्वायत्तता का अंत करना या बचाना उसके मौजूदा लेखक पदाध्किारियों के वश का काम नहीं है। पुरस्कार वितरण समारोह में अध््यक्ष सुनील गंगोपाध््याय ने बताया है कि कंपनी और अकादमी के बीच का यह समझौता भारत और कोरिया सरकारों के बीच हुआ है। तो साहित्य अकादमी की स्वयत्ता का अपहरण सीध्े केंद्र सरकार ने किया है। केंद्र सरकार कोई निर्गुण सत्ता नहीं है। न ही संस्कृति मंत्रालय जिसके अंतर्गत साहित्य अकादमी आती है। संस्कृति मंत्रालय प्रधनमंत्राी के पास है। यानी साहित्य को साहित्य अकादमी के स्वायत्त क्षेत्रा से निकाल कर पूंजी;वादद्ध के क्षेत्रा में ले आने का काम खुद प्रधनमंत्राी ने किया है। उसी प्रधनमंत्राी ने जिसने पिछली संसद में अमेरिकी ध्न-बल से पूरी निर्लज्जता के साथ परमाणु करार पास कराया था। प्रधनमंत्राी भी कोई निर्गुण सत्ता नहीं है। मनमोहन सिंह देश के दूसरी बार प्रधनमंत्राी हैं। हमने ऊपर जो नवउदारवादी यथार्थ बताया है, वह वाया कांग्रेस और सोनिया गांध्ी मनमोहन सिंह के नेतृत्व का नतीजा है। जिनके लिए देश की संसद की कोई कीमत नहीं रही, उनके लिए साहित्य अकादमी की स्वयत्तता क्या मायने रखती है!
लिहाजा, निर्गुण विरोध् का कोई अर्थ नहीं है। विरोध् सगुण होना वाहिए। अगर आज ही देश के ज्यादातर लेखक अपने पुरस्कार अकादमी को राशि-सहित वापस पफेर देंऋ जो समितियों में नामित हैं, अपने नाम वापस ले लेंऋ और एक कड़ा पत्रा सोनिया गांध्ी, मनमोहन सिंह व उनकी मंडली को लिखें, तो कल ही कंपनी और अकादमी के बीच कायम किया गया यह गठजोड़ निरस्त हो सकता है। बस अपने नाम सहित इतना लिखना है कि ‘आप महानुभावों ने देश लगभग बेच डाला है, कला और साहित्य को हम बाजार में नहीं बेचने देंगे। हमें वैसे पुरस्कार नहीं चाहिए। हम देश और नतीजतन कला व साहित्य बेचने वाले आप लोगों का संपूर्ण विरोध् करते हैं।’ सभी भाषाओं के लेखकों को विरोध् में शामिल करना चाहिए। दूसरे विषयों के बु(िजीवी और नागरिक समाज के लोग भी उसमें आ सकते हैं। अपने अस्तित्व के लिए जूझने वाली मेहनतकश जनता भी उसमें आएगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो माना जाएगा कि यह विरोध् भी हिंदी अकादमी के विरोध् जैसा हो कर रह जाना है।

प्रेम सिंह

लोकसंघर्ष पत्रिका के मार्च अंक में प्रकाशित होगा

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Thursday, February 4, 2010

महिला की बेनामी टिप्पणी

चित्र को बड़ा करके देखिये कि क्या भड़ास निकाली है और क्या संपादित करा गया है
पहली बार किसी महिला की बेनामी टिप्पणी आयी है हो सकता है कि ये किसी महिला की टिप्पणी न होकर किसी ऐसे माहिल की हो जो कि अपने मन में महिला बनाने की तमन्ना दबाए बैठा हो तभी तो बेनामी टिप्पणी में भी उसकी दबी चाहत निकल कर आ गयी है। वैसे भड़ास पर बेनामी टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं करा जाता है लेकिन इस टिप्पणी में हमें जिस तरह स्त्रियोचित अंदाज में गरिआया गया है उस पर हमें ये लगा कि इसका प्रकाशन अनिवार्य है वरना उस बेचारी महिला/माहिल की भावनाएं आहत होंगी, हमारा क्या है हमारे लिए तो गालियाँ हमारे कार्य के प्रतिसाद स्वरूप हुई एक प्रतिक्रिया मात्र है बस थोड़ी सी कठोर है। हम स्त्रीत्व का सम्मान करते हैं कहते वह आक्रोश में गरिया ही क्यों न रहा हो।
जय जय भड़ास

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Wednesday, February 3, 2010

हम्माल

हम्माल

उस


सियाले में


अकस्मात


जंगल की हवा में समाहित


वनद्रुमों की मदनीय सुवास से


नहाई शाम में


घर लौटे


धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग


लगढग नग्न


लीतड़ा पहने


युगों से विशाल भार को काँधें लिये


आदिम रहस से भरे अंतस की


पहरेदारी करता


वह हरहठ


युवा हम्माल


जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते


श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित


कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती


गहन सिसियाँद से बेपरवा


सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर


उस के जाँगर पर आसक्त


वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी


उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह


पसीनाई चेहरा


जिस पर झुकती है वह


साँझ की तरह


दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में


और डूब जाता है वह युग्म


प्रेम के गहन पुरातन पाश में।


प्रणव सक्सेना

amitraghat.blogspot.com

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लो क सं घ र्ष !: अब पशु भी हिन्दू मुसलमान होने लगे

अब कातिलों को भी जाति और धर्म के नाम पर पहचान की जा रही है वास्तव में कातिल कातिल है उसकी कोई जाति है उसका कोई धर्म है, लेकिन समाज में नियोजित तरीके से जो देश की एकता और अखंडता को नहीं बनाये रखने में विश्वास करते हैं वह लोग कातिलों को हिन्दू, मुसलमान सिख, ईसाई में बांटने लगे हैंक्या महात्मा गाँधी की हत्या, श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या, राजीव गाँधी की हत्या क्या हिन्दुवों ने की है ? मैं कहूँगा नहीं संविधान न्याय कहेगा नहीं, कातिल कातिल है, दंगाई दंगाई है , लुटेरा लुटेरा है, आतंकी आतंकी हैजब कुछ इनकी पैरवी करने वाले लोग जाति और धर्म के नाम पर पैरवी करने लगते हैं और गलत तथ्यों के आधार पर झूंठे आंकड़े पेश करने लगते हैं तो वह किसी कातिल की पैरवी कर रहे होते हैं उसके गुनाह को छोटा करके धर्म के आधार पर दूसरे का गुनाह बड़ा करके बताते हैंजोश में होश खोकर वह संविधान देश विरोधी हरकतें करने लगते हैंविष वृक्षों की नई-नई नर्सरियां पुराने इतिहास के गलत तथ्यों पर तैयार करते हैं उनका राष्ट्रवाद सिर्फ इतना है कि जाति और धर्म, क्षेत्र और भाषा के नाम पर हमारे समाज में युद्ध होता रहे और साम्राज्यवादी शक्तियों के मंसूबे पूरे होते रहे
अब लोग हिन्दू टाईगर्स भी होने लगे हैं उनकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ कि हिन्दू मैथोलॉज़ी के मानने वाले काफी लोग शाकाहारी हैं और टाईगर्स शुद्ध मांसाहारी हैयह टाईगर किसका मांस खाना चाहता हैअपने देश के किसी नागरिक का ? कल को धर्म के आधार पर टाईगर पैदा होने लगेंगे तब इंसान और इंसानियत क्या रहेगी ? अच्छा यही है कि टाईगर मत बनो, लुप्तप्राय वन्य जीव है। चिड़ियाघर में जगह खाली है रहने का शौक है तो आराम से वहां रहो। हिन्दू टाईगर नहीं होता है वह सौम्य, दयालु करुणामय तथा सर्वे भवन्ति सुखना में विश्वास रखने वाला है

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Tuesday, February 2, 2010

अनोखे चित्रकार एन.डी.एडम से मुंबई की व्यस्तता में दूसरी मुलाकात



कुछ समय पहले जब बड़े भाई श्री अविनाश वाचस्पति मुंबई आए थे तब एक पत्राकार-मिलन हुआ। उस मिलन में भाई सूरज प्रकाश जैसे वरिष्ठ पत्राकारों से लेकर फ़रहीन जैसी युवा पत्राकार ने शिरकत करी थी। भाई महावीर सेमलानी जी के प्रयास से सब कुछ बेहद उत्तम रहा और दिल-दिमाग में अब तक उस मिलन की यादें ताजा हैं। वहीं भाई अविनाश वाचस्पति के साथ आए थे एक अनोखे-अनूठे बुजुर्ग चित्रकार श्री एन.डी.एडम जो कि लोगों को देख कर चंद मिनटों में ही छवि को कागज पर उतार देते हैं। इनकी कला को देख कर सभी लोग सराह रहे थे, श्री एडम ने कई लोगों के उस पत्राकार-मिलन में वहीं बैठे-बैठे चित्र बना डाले। भाई अविनाश की इनसे मुलाकात गोवा में हुए IFFI के फिल्म समारोह में हुई और IFFI की स्मारिका में श्री एडम के बारे में प्रकाशित भी हुआ। पत्राकार मिलन की समाप्ति के बाद मैं ओर फ़रहीन ने पनवेल की राह चल पड़े लेकिन हमारा सौभाग्य था कि अविनाश भाई के साथ ही श्री एन.डी.एडम भी हमारे साथ कुर्ला तक साथ रहे जिससे उनसे बातें करने का अधिक मौका मिला, पता चला कि वे मुंबई के ही एक उपनगर विक्रोली में रहते हैं। यदाकदा फोन पर बातें होती रहीं और कल एक बार उन्हें हमारा प्यार हमारे घर पर खींच ही लाया। लोग कहते हैं कि मुंबई की व्यस्तता में सब खो जाते हैं लेकिन यदि दिल में प्यार हो तो मुलाकातें होती हैं और सुख-दुःख बांटने का रिश्ता बना रहता है।
जय जय भड़ास

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12 साल में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की है

किसान आत्महत्याओं के मामले में सबसे आगे है महाराष्ट्

राष्ट्रीय अपराध लेखा ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1997 से अबतक कुल 1,99,132 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। जबकि 2008 में 16,196 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।

जाने माने पत्रकार पी साईनाथ ने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख में भी यह खुलासा किया है कि 2008 में 5 बड़े राज्यों-महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जिन्हें ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ कहा जाता है, में सबसे ज्यादा 10,797 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यानि 2008 में देश भर से जिन 16,196 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, उसका 66.7 प्रतिशत हिस्सा अकेले ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ से है। इसमें भी महाराष्ट्र सबसे आगे है, जहां 3,802 किसानों ने मौत को गले लगाया हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 1997 से अब तक 41,404 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यह देशभर में हुई कुल किसान आत्महत्याओं की संख्या का 1/5वां से अधिक भाग है।

राष्ट्रीय अपराध लेखा ब्यूरो की यह रिपोर्ट कहती है कि 1997 से 2002 के बीच ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ से 55,769 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। जबकि 2003 से 2008 के बीच यह आकड़ा 67,054 तक पहुंच गया। जिसमें किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं में औसतन सलाना 1,900 की बढ़ोतरी दर्ज हुई। सालाना औसत के मद्देनजर 2003 से हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या करता है। यह रिपोर्ट कहती है कि हालांकि 2007 के मुकाबले आत्महत्याओं में थोड़ी कमी तो आई है, मगर कोई उल्लेखनीय बदलाव दिखाई नहीं देता है।

मद्रास इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़े रहे जानेमाने अर्थशास्त्री प्रोफेसर के नागराज कहते हैं कि ‘‘अगर 2008 में 70,000 करोड़ रुपए के कर्ज की माफी और खेती के लिए दी जाने वाली सहायता के बाद यह हालात है तो सूखाग्रस्त 2009 के बाद के हालात तो और भी भयावह हो सकते हैं। कुल मिलाकर किसानों की यह समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है।’’
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शिरीष खरे, संचार विभाग, चाइल्ड राइटस एण्ड यू, मुंबई.


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आस्था और भोजन का जुड़ाव के भी चिन्ह हैं हमारे पास



हो सकता है कि आप में से कई लोगों ने देखा और खाया होगा लेकिन मैंने कल पहली बार "रामफल" देखा और खाया। जो आदिवासी महिला सड़क पर वो फल बेच रही थी उसने भावविभोर होकर बताया, दादा ! जब भगवान राम वनवास के दौरान महाराष्ट्र आए थे तब उन्होंने, माता सीता और लक्ष्मण जी ने जंगली फल खा कर ही समय निकाला था बड़े कष्ट में दिन गुजारे थे। याद आता है कि जब रमजान माह आता है तो रोज़ा खोलते समय भी खजूर का फल हाथ में आने पर ऐसी ही चर्चा अक्सर निकल पड़ती थी कि नबी मुहम्मद साहब ने भी अपने कष्ट के दिनों में इस फल पर दिन गुजारे थे। आस्था की जड़े समाज में इतनी गहरी होती हैं कि हर आयाम में समाई हुई हैं हमारे आचरण से लेकर भोजन तक में इसके निशान हैं। मुनव्वर आपा ने मुस्करा कर कहा कि देखिये भगवान राम के अस्तित्व पर हमारी सरकार सवालिया निशान लगा सकती है लेकिन इस बात का क्या करेंगे कि उनके वजूद की छाप हमारे देश में जगह-जगह है। रामफल खाकर हमने भी भगवान राम को एक बार याद कर ही लिया जिन्होंने आर्यों के समाज में एक आदर्श स्थापित करा है।
जय जय भड़ास

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क्या होगा यदि अंबानी और शाहरुख खान मुंबई से खुद को अलग कर लें?

पता नहीं कि हमारे देश के सामाजिक समीकरण क्या हैं कि आदमी अपनी रोजी-रोटी को भी दांव पर लगा कर किसी का पिछलग्गू बन कर सही गलत का विचार करे जान देने पर भी अमादा हो जाता है। मुंबई में बाल ठाकरे कभी हिंदुओं के नेता बन कर बकैती करता है उसका अखबार मुसलमानों के लिये अपमानजनक भाषा लिखता है और कभी मराठी का बाजा बजाने लगता है। जबकि शिवसेना में न जाने कितने मुस्लिम हैं न जाने कितने गैर मराठी भाषी हैं। इसको क्या लगता है कि यदि शाहरुख खान जैसे लोग स्वयं ये कह दें कि उनकी फिल्म मुंबई छोड़ सारे विश्व में दिखाई जाएगी तो शाहरुख के प्रशंसक मुंबई से बाहर जाकर फिल्म नहीं देखेंगे या बाहर से डीवीडी लाकर देखना बंद कर देंगे या फिर मुंबई में बनने वाली हिंदी फिल्मों में शाहरुख की जगह लोग बाल ठाकरे को देखना पसंद करने लगेंगे। यदि अंबानी अपने कारोबार को किसी दूसरे राज्य में स्थानान्तरित कर दें तो क्या बाल ठाकरे मराठी बोलने वालों को रोजगार देगा? ऐसा ही एक चूतियापा नैनो कार वाले प्रकरण में हो चुका है कि बंगाल में न लगाने दिया तो गुजरात में प्लांट लग गया इससे किसको लाभ हुआ और किसको हानि ये तो अब जाकर कोई उनसे पूछे जिन्होंने इस मामले में जान तक देने की ठान ली थी क्या अब वे हीरे-मोती की फसल काट रहे हैं अपने नेता के साथ मिल कर और मालपुए खा रहे हैं? यदि कोई भी आर्थिक शक्ति को राजनीति से अलग करने की बात कर रहा है तो वह जनता का दुश्मन है।
जय जय भड़ास

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खुद सुप्रीम कोर्ट नहीं चाहता देश में मुसलमानों की समान नागरिकता की स्थिति?

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मुस्लिम दूसरी शादी नहीं कर सकते, ये शीर्षक बना कर मीडिया ने खबर बेचना शुरू कर दिया; मच गया हो-हल्ला कि क्या कुछ नया सा हो गया है इस देश में। कोई भी सरकारी कर्मचारी(ध्यान दीजिये कि "सरकारी कर्मचारी"......) एक पत्नी के जीवित रहते उससे विवाह विच्छेद हुए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता, ये नियम कोई नया नहीं है इसमें मुस्लिमों को कोई छूट नहीं है कि वे शरीयत के कंधे पर सवार हो कर सरकारी पगार की दम पर चार-चार बीवियों के साथ बिस्तर तोड़ सकें। ये नियम सिर्फ़ सरकारी कर्मचारियों पर ही क्यों लागू होता है क्या किसी को इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता? आखिर क्यों ऐसा नहीं होता कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों को इस देश में समान नागरिकता को बोध कराने के लिये इस बात को सभी पर लागू करने के लिये इस विषमता को समाप्त करता कि आस्था और धार्मिक नियम निहायत ही निजी बात है उसे राष्ट्रीय कानून पर थोपना उचित नहीं है और न ही सबको ये लालीपाप पकड़ाना उचित है कि भाई करो जो तुम अपनी आस्था से सही मानते हो। इस बात का सीधा दुरुपयोग कई बार हमारे देश ने देखा है चाहे वह फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र-हेमामालिनी का प्रकरण हो या फिर फ़िज़ा-चांदमुहम्मद की कहानी। क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट खुद इस विषय में कोई कदम खुद उठाता या फिर वह अपाहिज है कि उसे किसी हाईकोर्ट से विवादित मामले की बैसाखी जब तक न दी जाए वह हिलने को तैयार ही नहीं होता? यदि ये बात आम नागरिकों के लिये भी लागू कर दी जाती तो सरकार और जनता के बीच जो दरार सुप्रीम कोर्ट ने भरने नहीं दी है वह मुस्लिम समाज की महिलाओं के सामाजिक पक्ष को सशक्त करने की दिशा में उपयोगी हो पाती। सुप्रीम कोर्ट और सरकार( वह सरकार जो कहा जाता है कि जनता बनाती है) नहीं चाहते कि इस हिन्दू-मुसलमान-इसाई-सिख-पारसी आदि के भेद को मिटा कर समान नागरिकता की बात करी जाए।
जय जय भड़ास

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