लोकतांत्रिक सरकार को प्रेस/मीडिया के ऊपर लगाम कसने की जरूरत क्यों पड़ी???

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

मीडिया पर लगाम लगाने की बात को लेकर जिस केबल रेग्युलेशन एक्ट की बात सरकार ने करी उसे लेकर उससे सारे मीडिया के लालाजी और बनिए हड़बड़ा कर इकट्ठा हो गए और एक सुर में चिल्लाने लगे ....... काला कानून.... गैर जिम्मेदार सरकार...... हाय...हाय....चिल्ल...पौं....। जब देश ग़ुलाम था तब प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के ऊपर रोक लगाना तो सरकार के हित में था अब देश आजाद हो गया तो फिर जनता द्वारा वोट लेकर बनायी हुई लोकतांत्रिक सरकार को प्रेस/मीडिया के ऊपर लगाम कसने की जरूरत क्यों पड़ी ये विषय विचारणीय है। देश की तुलना हम एक चारपाई से करें बिलकुल सरल शब्दों में तो जरूर समझ में आ जाएगा। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा पाया है मीडिया/प्रेस...... पिछले पचास-साठ साल में इस देश रूपी चारपाई का हर पाया धीरे-धीरे हिलने लगा और कुछ सिस्टम से अलग लोगों ने इन हिलते पायों में पच्चर लगा-लगा कर चारपाई की चरमराहट को रोक रखा था लेकिन अब जब हर पाया अलग दिशा में जा रहा है तो आप अंदाज लगा सकते हैं कि चारपाई पर लेटे हुए हमारे देश को चला पाने के सठिया चुके लोकतंत्र रूपी खांसते बुड्ढे का क्या हाल होगा.... अरे होगा क्या....चारों खाने चित्त होकर जमीन पर औंधा दिखाई देगा....। हमारे देश का लोकतंत्र का माडल असफल हो चुका है क्योंकि हमारे यहां की जनता सामंतवाद को पसंद करती है नेता का बेटा नेता और अभिनेता का बेटा अभिनेता...... ये पसंद है हमारी देश की जनता की.... राजनीति की दुकान चलाने वाले इस झक्कीपन को समझते हैं और लोकतंत्र-लोकतंत्र कह कर जनता को चूतिया बनाते हैं और जनता है कि चुनाव को क्रिकेट मैच से ज्यादा नहीं समझती उसे देश से कोई लेना-देना नहीं है वह तो बस जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र की बात जानती है, सिस्टम की मशीनरी का सभी पाये दुरुपयोग कर रहे हैं तो जब भी किसी पाए का नुकसान होता है तो वह दूसरे पाये को खींचने लगता है, विधायिका हो या न्यायपालिका .... प्रेस हो या कार्यपालिका ....सब पाइप लगा कर जनता का खून चूस रही है। हमारा लोकतंत्र बकवास सिद्ध हो गया है क्योंकि हम राज्य की मशीनरी के प्रमुख का चुनाव जनमत से नहीं करते चाहे वह राज्यपाल हो या राष्ट्रपति.....। जिस दिन हम आम आवाम अमेरिका की तरह से राज्यपाल हो या राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनमत से कर पायेगी उस दिन से न तो कोई कानून काला महसूस होगा न ही ऐसे आंदोलन करने के लिये स्वार्थी लाला हिम्मत जुटा पाएंगे। अब तक देश अंग्रेजों द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनाए गए संविधान में चिथड़े-चिंदी लगा कर हमारी न्यायपालिका और कार्यपालिका चल रही है।
जय जय भड़ास

2 टिप्पणियाँ:

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

काला कानून लाल कानून सफ़ेद कानून...
कितना रंगबिरंगा कानून हो चुका है हमारे देश का:)
लालाजी सरेशाम परेशान हैं कानून के रंगों से जो रंग लालाजी को पसंद है वो कानून बनाने का जतन है।
जय जय भड़ास

sticker ने कहा…

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