मोर-मोर मौसेरे भाई : वणिक श्री यशवंत सिंह और वणिक शिरोमणि अविनाश दास

सोमवार, 26 जनवरी 2009

जैसा कि मेरे ऊपर एक आरोप है कि मैं सच को सच और झूठ को झूठ कहने में नहीं डरता हूं, इस आरोप से मुक्त होने के लिये आजकल डरने का भरपूर अभ्यास कर रहा हूं। अब किसी बनिये को बनिया कहने या चोर को चोर और छिछोरे को छिछोरा कहने से पहले एक करोड़ बार सोच लेता हूं कि कहीं पुलिस घर पर आकर हड्डियों का झांझ-मंजीरा न बजा दे। इसलिये अगर डरने में कोई कमी रह गयी हो तो माफ़ करते हुए बता दीजियेगा। मैं अपने आक्रांताओं को सहस्त्र कोटि नमन करता हूं। मुझे अब तक याद है कि कठपिंगल नाम से अविनाश बाबू ने जो कर्म(कुकर्म लिखना चाहता था पर अब डरने के अभ्यास के अंतर्गत ऐसे शब्दों के प्रयोग से बचूंगा) करा था जैसे कि किसी के निजी जीवन में कूद कर आक्षेप लगाना और उसे हिंदी ब्लागिंग में स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराना। इससे जब यशवंत दादा(अभी भी दादा ही कहूंगा क्योंकि वे मेरे भड़ास जीवन में बड़े भाई जैसे हैं उनसे ही सीखा है कि छल,प्रपंच,कपट को किस तरह से मुखौटे में छिपाया जाता है ताकि आप भदेस और अपने से लगें) उबिया गये तो हम भड़ासियों ने अविनाश दास के मोहल्ले पर खुला हमला कर दिया था उसने यशवंत दादा और मुझ पर कीचड़ फेंका था तो हम सबने उस पर गोबर(मानव से लेकर सुअर तक का) फेंक कर हिसाब चुका लिया था। इस दौरान यशवंत दादा ने मादर-फ़ादर की श्रेणी की अनेकानेक नवीनतम गालियां ईजाद करके अविनाश को गरिआया था। यकीन मानिये कि तब उस पन्ने पर मुर्दा हो चुकी भड़ास को अच्छी खासी (कु)ख्याति हासिल हो गयी थी। अब मुर्दे को नहला-धुला कर सौ-डेढ़ सौ पंखे लगा दिये हैं ताकि सड़ांध न आये उस मरी भड़ास में, भाट और चारण मुर्दे की प्रशंसा कर रहे हैं, छद्म ब्राह्मण शुद्धिकरण कर रहे हैं पूर्वकाल में दी गयी गालियों पर मंत्रादि मार कर साफ कर रहे हैं। इस पूरे मुद्दे को ताना-बाना से लेकर गाना-बजाना तक नाम से लिखने वाले हिंदी के स्वनाम धन्य ब्लागर विराट रूप देकर पंखों वाली भड़ास को प्रसिद्धि की सिद्धि करा रहे थे। अब जब यशवंत दादा ने अपना मुखौटा सहज ही हटा कर अपना असली चेहरा दिखा दिया है तो अब समझ में आने लगा है कि अरे ये चेहरा तो अविनाश दास से कितना मिलता-जुलता है। अविनाश मोहल्ला में अपनी सविता भाभी जी(एक अत्यंत गलीज़ किस्म की पोर्न वेबसाइट) को प्रोत्साहित करके अधिकतम प्रकाश हासिल करने का टोटका अपना रहे हैं वहीं यशवंत दादा ने भी कुछ ऐसा ही अंदाज अपनाया लेकिन यहां प्रसिद्धि व धन का समीकरण कुछ अलग था। अविनाश बाबू ने भाभी जी का पल्लू पकड़ कर ख्याति हासिल करने का रास्ता अपनाया है और यशवंत दादा ने भड़ासियों के मनोभावों और उनकी संवेदना को गठरी में बांध कर उस गठरी के वजन से भड़ास4मीडिया बना लिया और भड़ासियों की भावनाओं के टके करा लिये, भुना लिया उन भावनाओं को जो कि हम भड़ासियों ने बस ऐसे ही सहज भदेस दर्शन के प्रभाव में आकर जाहिर करी थीं। मुझे लगता है कि अगर इन दोनो के डी.एन.ए. का गहन अध्ययन करा जाए तो यकीन मानिये कि इनके क्रोमोसोम्स मिलते जुलते ही प्राप्त होंगे।
जय जय भड़ास

1 टिप्पणियाँ:

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

इन बनियों की दुहाई देना तो सुनिये कि ये कहते हैं कि पैसा जमा करके समाज हित में अस्पताल,विद्यालय,अनाथाश्रम वगैरह बनवाएंगे, इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि अगर वणिक सोच दान भी करेगी तो ये सोच कर कि बदले में क्या मिलेगा...
जय जय भड़ास

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