बनिए! बनिये, बिगड़िये मत ताकि "शुभ-लाभ" का विचार जीवित रहे

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

आज फिर से एक बार वैसा ही मौका आ गया है जब कि किसी गन्दी सोच से लड़ने के लिये हमें कमर कस लेनी चाहिये। भड़ास के मंच पर यह कोई नयी बात नहीं है कि किसी ने कोई विशेष पोस्ट को हटाने या फेरबदल कराने के लिये भड़ासियों को डराने या धमकाने का प्रयास करा हो। ये प्रयास कई बार विरोधी लोग मीठे अंदाज में करते हैं अपना-अपना कह कर भाई बन्धु बता-जता कर या फिर पुलिस और कानून की बंदरघु्ड़की देकर कि अब बस करो वरना हम लोग तुम्हारी आवाज को दबाने के लिये अपने जैसे ही भ्रष्ट लोगों को साथ लेकर तुम्हें कानून के चक्कर में फंसवा देंगे फिर बेटा अदालत के चारों तरफ परिक्रमा लगाना और बाद में जिंदगी भर सच को सच कहने का साहस दिखाने का दंड भुगतना चक्की पीसकर।
बस बात सिर्फ़ इतनी है कि मेरा भाई रास्ता भटक कर दूसरे रास्ते पर चला गया जिसमें उसने लोगों की संवेदनाओं को बिकाऊ समझ लिया। ऐसे में हम तो पहले चाहते हैं कि वो खुद समझ जाए फिर सलाह-मशविरा करते हैं, हाथ पकड़ कर रोकना चाहते हैं और जब नहीं मानता तो कान पकड़ कर ले आने का प्रयास करते हैं लेकिन भाई तो इतना बिगड़ चुका है कि उल्टा ही धमका रहा है कि उसके भले बुरे का वो खुद मालिक है तो भइया हम जब तक सारे प्रयास न कर लेंगे मानेंगे नहीं भले ही वह कितना भी लड़े-झगड़े या धमकाए। इसी क्रम में एक बात और कहना चाहूंगा कि भड़ास4मीडिया चूंकि भड़ास को आधार बना कर, भड़ास की प्रसिद्धि को लेकर बनाया गया है, किसी एक व्यक्ति का निजी श्रम नहीं है अतः उससे होने वाला लाभांश भड़ास के सारे सदस्यों में बराबरी से बांटा जाए। यह विचार "शुभ-लाभ" के अनुसार है क्योंकि लाभ भी हो और सभी के लिये शुभ हो न कि मात्र एक व्यक्ति सारा लाभ ले डाले। ऐसी स्थिति में जबकि "शुभ-लाभ" के अनुसार चला जाए तो समाज और देश का भला होने से कौन रोक सकता है कि देश के ग्रामीण अंचल में बैठा एक भड़ासी किसी साइबर कैफ़े में तीस से पचास रुपए घंटा दे कर भड़ास पर लिख रहा है और एक व्यक्ति उसकी इस संवेदना का दोहन आर्थिक लाभ के रूप में कर के स्वयं को संत स्वभाव बताए तो मैं इससे सहमत नहीं हूं। भाई इतनी सी बात है कि भड़ास4मीडिया को बताया गया है कि वह "भड़ास का बच्चा" है यानि कि उसी से उपजा है तो इस बच्चे के बाप को जिन्होंने पाला-पोसा वह इस बच्चे के कमाऊ पूत बनने पर आर्थिक लाभ की मलाई से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिये जाएं यह सही नहीं है। सभी भड़ासियों को उनकी सक्रियता के आधार पर लाभांश दिया जाए ताकि "शुभ-लाभ" का विचार जीवित रहे। समस्त वणिक समाज को कम से कम इस लांछन से बचाने के लिये एक उच्च आदर्श व उदाहरण भड़ास की तरफ़ से रखा जा सकता है, वणिक समाज या वणिकजन बुरे कहां है भाई... ये तो कुछ लोग हैं जो अपनी इस तरह की हरकतों की वजह से पूरे समाज को कलंकित कर देते हैं..... बस इतना ही कहना है " बनिए! बनिये, बिगड़िये मत"...... ताकि सारा समाज और देश उत्थान में तुम्हारा योगदान हमेशा याद रख सके।
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

अग्नि बाण ने कहा…

रुपेश भैया,
आप बेकार में भाई भाई की दुहाई दे रिये हो, अपुन पेहले हीच दिन से बोला था ये भिडू बनिया है और भड़ास में आप लोग आत्मा दाल रिये हो पण ये भैन डा टक्का आप सभी की आत्मा को बेचेगा. याद है अपुन को वोह दिन जब भड़ास का बच्चा का पोस्ट आया था और बच्चों के माफिक आप उछल रहे थे, आख़िर भडास का संकल्प सजीव होने का लोलीपोप जो सभी के मुहँ में डाल दिया गया. काम करवाने के लिए मनीष भाई को बुला लिया और हिस्सेदारी न बन जाए मक्खी की तरह निकाल फेंका.
एक बलात्कार का आरोपी आज उसको आँखें दीख रिया है जब भैन दे टक्के के लिए अपुन का साला बड़ा भाई कुत्ते की माफिक भोंक रिया था. अपुन ने साला तब भी मन किया था की ये भैन.... साला सियार है, मगर भाई इमानदारी से साथ देता रहा.
भाई अपुन लोगों को डर डर खेलने का नही है, जिस माँ के टक्के में ताकत है डरा ले.
रही बात नियम कानून की तो भैन दा टक्का इसमें उतना ही कच्चा है जितना पत्रकारिता में था नही तो ऎसी बच्चों वाली हड्कतें नही करता.
बारी अब उस भड़ास के पंखे की है, कौन कौन इस टक्के का पंखा बना रहता है.
जय जय भड़ास

हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा ने कहा…

अग्नि भाई आप सच कह रहे हैं ये आदमी सियार जैसा ही है वरना भाई डा.रूपेश जैसे इंसान के साथ तो मिल कर रह पाता लेकिन धूर्तता और कमीनापन स्वभाव में इस हद तक है कि अब हमें ही पुलिस का नाम लेकर धमका रहा है जबकि अविनाश ने मोहल्ला पर अभी भी इसके द्वारा करे गये बलात्कार के प्रयास के संबंध में पोस्ट डाल रखी है उसका कुछ क्यों नहीं उखाड़ता?? क्योंकि अपराधबोध है.....वैसी कुत्सित हरकत करी होगी न.....
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

गुरुदेव,
आप जिस से प्रभावित थे उसने मुझे पहले दिन से ही प्रभावित नही किया, उसकी मंशा का पता मुझे पहले दिन से ही था, भाईचारे को खरीदने के लिए इसने कई बार मुझे भी दारू पीने के लिए बुलाया मगर मैं गया नही.
ना कहू से दोस्ती न कहू से बैर के सिद्धांत पर चलने वाला मैं बस मानवीय सरोकार के कारण या कहिये भड़ास के कारण इस से जुदा रहा.
आप कोई भी दुहाई दीजिये ये आपकी व्यक्तिगत राय हो सकती है मगर यशवंत के लिए कम से कम मेरे विचार को आप नही बदल सकते.
अपने हित और स्वार्थ के लिए ये किसी भी हद तक जा सकता है.
जय जय भड़ास

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