नोट-तंत्र के महापर्व में थोड़ा-थोड़ा.....

गुरुवार, 19 मार्च 2009

बुद्धू बक्से के खबरिया चैनल में बुद्धिमान एंकर के मुखार्बिंदु से निकालने वाले एक-एक शब्द ह्रदय में शूल से चुभते हैं। मुझे तो चुभते हैं औरों का पता नही, लेकिन उम्मीद है के उन्हें भी ऐसा ही महसूस होता होगा जैसा मुझे। जबसे लोकतंत्र के चुनावी बिगुल की दुन्दुभी बजी है, चैनलों के हाथ मानो अलादीन महाराज का चिराग लग गया है। दुसरे शब्दों अंधे के हाथ बटेर लगना कहा जा सकता हैं। इधर लोकतंत्र को एन्जॉय किया जा रहा है। पिछले दिनों कई नेताओं के विडियो दिखाए गए जिसमे वोट के लिए नोट बांटे जा रहे थे। मेरा व्यग्तिगत मानना हैं की नेताओं को खुली छुट दे देनी चाहिए की वी पैसे से वोट खरीद सकें। इसके कई फायदे भी हो सकते हैं जैसे- भ्रस्टाचार से कमाए गए धन का कुछ सदुपयोग हो पायेगा। नेताओं के खजाने कुछ खाली होंगे। जनता को अंततः ये महसूस हो जाएगा की उनके वोट की कीमत है और वी इसकी पुरी कीमत वसूलने के लिए तत्पर भी होंगे। सबसे बड़ा फायदा ये होगा की मीडिया को अंदरखाने दिए जाने वाले धन पर रोक लग सकेगी। भाईसाहेब लोग गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते हैं की फलाने नेता ने जनता को नोट बांटे। मैं पूछता हु की क्या बुरा किया? बेचारे गरीब-गुरबों को कुछ नोट मिल ही गए हो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? जनता को १०० रुपये मिल गए तो इतना हाय-तौबा और भ्रस्टों को लाखों-करोड़ मिल रहा है उसका क्या? हो सकता है की मेरे इस व्यक्तिगत विचार से ९९ प्रतिशत लोग वास्ता न रखते हो, लेकिन मैं सभी महानुभावों से कुछ प्रश्न जरुर पूछना चाहूँगा। पहला प्रश्न- जब जनता के बिना ख़रीदे गए वोट से जितने वाले नेतागण संसद में खुलेआम नोट लेकर बिक सकते हैं , वह भी करोड़ों-करोड़ में तो जनता का वोट क्यो नही? दूसरा प्रश्न - चैनल का समय, अखबार के पन्ने किसी नेता की छवि निर्माण के हेतु धन ले सकते हैं तो जनता क्यो अछूती रहेगी? तीसरा प्रश्न- जनता के नौकर कहे जाने वाले सरकारी कर्मचारी, सरकारी बाबु, नौकरशाह , सरकार के सभी ओहदों पर बैठे इन्सान रूपी चिल-कौव्वे जनता के हिस्से की बोटी निगल सकते हैं तो बेचारी जनता क्यो नही? अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिये! लोग ये कहेंगे की जनता को वोट के बदले कीमत दी जाने लगी तो आम आदमी कभी नेता नही बन पायेगा? मैं पूछता हूँ की अभी कितने आम आदमी नेता हैं। बुद्धिमान पुरूष ये भी तर्क दे सकते हैं की नोट के बदले वोट से लोकतंत्र की स्वस्थ परम्परा मर जायेगी, गरीब कभी चुनाव नही लड़ पाएंगे । ठीक अभी आप गिन कर बता दीजिये कितने गरीब चुनाव लड़ रहे हैं या कितने गरीबों को अमीरों की पार्टियों ने टिकेट दिए हैं। कुल मिलकर ये कहना चाहता हूँ की भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट नेता और भ्रस्टाचार के दलदल में बस गरीबों से ही इमानदार होने की आशा क्यों की जाती हैं। इन सभी भ्रष्ट चीजों से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले अपने गिरेबान में झांके , ख़ुद इमानदार बनने की कोशिश करें और पुरी भ्रष्ट व्यस्था के खिलाफ एकजुट हो तभी पारदर्शिता की कल्पना तक की जा सकती है। अन्यथा ये सब सिर्फ़ बरसाती बुलबुलों की तरह है जो अपने आप पैदा होते हैं और ख़ुद ही फ़ुट जातें हैं।
जय भड़ास जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

अजय मोहन ने कहा…

मनोज भाई बिलकुल सही दिशा में ले जा रहे हैं आप भड़ास गंगा का प्रवाह.... मैं अपने वोट की रुपए पैसे में कीमत नहीं लगाना चाहता बस देश आजाद हुए जितने साल हो गये हैं वोट मांगने आए नेता को उतने जूते कस कस कर उसकी दुकान पर लगाने की पेशकश रखूंगा यदि बंदा राजी हो गया तब लगेगा कि सही कीमत दे रहा है वैसे भी गरीबों को तो अपने वोट की सही कीमत का अंदाजा ही नहीं रहता, कम से कम पांच साल में एक बेचारी सस्ती वेश्या जितना पैसा कमाती हो उतना तो मूल्य ले ही लेना चाहिये क्योंकि पांच साल नेता जी मुफ़्त में बजाने वाले हैं;माफ़ करियेगा भड़ासियों बहुत गुस्सा भरा है बाकी चिकिर-चिकिर पोस्ट लिख कर करूंगा
जय जय भड़ास

mark rai ने कहा…

manoj jee bilkul satik tippani ki hai ... sabako thoda thoda chaahiye... democracy ko bech kar ...is bahati ganga me koun nahi haath dhona chahega...

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

एक बात कहना था कि यदि चुनाव का प्रत्याशी पैसा बांटता है तो उस पर आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनता है लेकिन यदि वोटर ही खुद अपने वोट के बदले पैसा मांगता है तो क्या उसका वोट देने का अधिकार समाप्त करने का कोई कानून है?
जय जय भड़ास

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