मूर्ति चोरी संघ परिवार ने की है - स्वामी
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मूर्ति चोरी संघ परिवार ने की है - स्वामी अमर उजाला से साभार
1 दिन पहले
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तुम गंध में न बसते हो
तुम रूप में न मिलते हो।
साधना समर्पित मेरी ,
पाषाण न तुम हिलते हो॥
मेरे सपनो की छाया
अब मुझे जलाती रहती ।
कुछ गरल छलक जाता है,
आशा है गाती रहती॥
मानस की स्नेहलता को
सींचा हमने सिसकन से ।
पर वह टूटी मुरझाकर
आडम्बर की चितवन से॥
-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'
© भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८
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