राजशाही से भी खतरनाक साबित होगी यह लोकशाही

शनिवार, 11 जुलाई 2009

आजादी के बाद भी सत्ता की चाभी कुछ गिने चुने लोगो के हाथों
संसद व विधान सभाओं में बढ़ रही वंशवाद की वेळ
आजादी के लिए मर मिटनें वालों ने सपने तो बहुत देखें होगें लेकिन उनमे दो महत्व पूर्ण थे । एक था अंग्रेजों को भगाकर स्वतंत्रता हासिल करना और दूसरा भारत से राज सत्ता का खात्मा व लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत देश में सत्ता का सञ्चालन । अकल्पनीय कष्टों व तमाम कुछ खोने के बाद देश आजाद तो हुआ लेकिन पूर्ण रूप से लोकतान्त्रिक व्यवस्था देश में लागू नही हो सकी है ।
भारत में आजादी के पूर्व ५६५ छोटी बड़ी रियासतें थीं । इनमे कुछ काफी बड़े राज घराने थे जो सदियों से कायम थे तो कुछ ऐसी भी रियासतें थी जिन्हें दिल्ली पर शासन करने वाले शासको ( अंग्रेज व मुग़ल शासकों ) ने बना दिया था । आजादी के बाद सभी रियासतों का विलय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत भारतीय गणराज्यों में हो गया । कुछ ने अगर भारतीय गणराज्य में शामिल होने से इनकार किया तो सरदार बल्लभ भाई पटेल ने उन्हें मजबूर किया और सभी रियासतें टूट गयीं ।
26 जनवरी १९५२ से भारतीय संविधान के तहत देश का सञ्चालन शुरू हुआ । पहला लोक सभा चुनाव सन १९५२ में हुआ तो तमाम रियासतों के राजा या उनके परिवार के लोग चुनकर संसद में पहुचना शुरू हो गए । राजस्थान व मध्य प्रदेश की राजनीति में आज भी तमाम राज परिवार पूरी तरह हावी हैं । लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मूल मंत्र था की किसी एक परिवार या वंश से नहीं बल्कि देश की सत्ता का सञ्चालन जनता द्वारा होगा । लेकिन आजादी के ६२ वर्षों के बाद भी देश की सत्ता कुछ गिने चुने लोगो के परिवार तक सिमट कर रह गई है । तमाम भारतीय मतदाता भी अभी तक अपनी गुलाम मानसिकता से मुक्त दिखाई नही दे रहें । सबसे दुखद पहलू यह है की आजादी के पूर्व तो देश की जनता ५६५ रियासतों के अधीन थी । लेकिन आजादी के बाद जनता का शासन बड़े ही बारीकी से कुछ परिवार के लोगों ने हाइजैक कर लिया । भारतीय राज्यों( कुछ राज्यों को छोड़ कर ) व भारत की सत्ता घूम फिरकर चार दर्जन परिवारों के इर्द गिर्द घूम रही है । ५६५ परिवारों के हाथ से सत्ता संचालन समाप्त करने वालो ने यह कल्पना भी नही की होगी की देश का संचालन कुछ परिवारों तक सिमट कर रह जाएगा । १५वी लोकसभा चुनाव में जो तस्वीर उभर कर सामने आई है वह भविष्य के लिए आम भारतीय के लिए कत्तई ठीक नही । आम भारतीय किसी भी दशा में संसद या विधान सभा में नही पहुँच पायेगा । कुछ राजनेता परिवार , वंश वाद व सगे सम्बन्धियों के मोहजाल से नही उबर रहें । हर बड़ी पार्टी का बड़ा नेता अपने साथ अपने पुत्र पुत्री दामाद भाई को भी संसद व विधान सभा में पहुंचाने में लगा हुआ है । १५वी लोकसभा मेंकुछ परिवार इसमे पूरी तरह सफल भी हो चूके हैं । हम वंशवाद व् परिवार वाद की शुरुवात गांधी परिवार से कर रहें हैं । नेहरू से लेकर वरुण गांधी तक सभी संसद तक पहुच चुके हैं । इस बार तो पूरा परिवार ही सांसद बन गया है । गांधी परिवार के सदस्यों की संख्या ४ हैं । सोनिया गांधी, राहुल गांधी , मेनका गांधी , वरुण गांधी.
वंशवाद को बढ़ाने वाले परिवार
गाँधी परिवार
जवाहर लाल नेहरू ,इंदिरा गाँधी ,संजय गाँधी ,राजीवगांधी ,सोनिया गाँधी ,मेनका गाँधी ,वरुण गाँधी ,राहुल गाँधी
सिंधिया परिवार
विजया राजे सिंधिया ,माधव राव सिंधिया ,बसुन्धरा राजे सिंधिया ,ज्योतिरादित्य सिंधिया ,यशोधरा राजे सिंधिया ,दुष्यंत सिंधिया
शेख परिवार
शेख अब्दुल्ला ,फारुख अब्दुल्ला ,उमर अब्दुल्ला
यादव परिवार
मुलायम सिंह यादव ,शिवपाल सिंह यादव ,राम गोपाल यादव ,अखिलेश यादव ,धर्मेन्द्र यादव
करूणानिधि परिवार
एम् .करुनानीधि ,कनिमोझी (सांसद राज्य सभा) एम् .के .अझागिरी (सांसद ),एम्.स्तालिन (उप मुख्यमंत्री )व् ,मुरासोली मारण ,दयानिधि मारण (रिश्तेदार )
तिवारी परिवार
हरिशंकर तिवारी ,विनय शंकर तिवारी ,भीष्म शंकर तिवारी व् गणेश पाण्डेय (भांजा )
चौधरी परिवार
चौधरी चरण सिंह ,अजीत सिंह ,जयंत चौधरी
बादल परिवार
प्रकाश सिंह बादल (मुख्यमंत्री ),सुखबीर सिंह बादल (उप मुख्यमंत्री ),हर सिमरत कौर (सांसद )
इसी तरह पीऐ,संगमा ,व् उनकी पुत्री अगाथा संगमा ,जी .के .मुपनार व् उनके पुत्र जी .के .वासन ,लालू यादव व् उनकी पत्नी ,बीजू पटनायक के बाद पुत्र नवीन पटनायक ,माधव सिंह सोलंकी के बाद पुत्र भरत सिंह सोलंकी ,अमरिंदर सिंह व् उनकी पत्नी परनीत कौर ,शरद पवार व् पुत्री सुप्रिया सुले ,भूपेंद्र सिंह हुड्डा व् उनके पुत्र दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ,शीला दीक्षित व् उनके पुत्र संदीप दीक्षित ,देव गौंडा व् उनके पुत्र कुमार स्वामी ,पूर्व सी .एम् मध्य प्रदेश सुभाष यादव के पुत्र अरुण यादव ,के अलावा कई परिवार वंश वाद को आगे बढ़ा रहें हैं । अब आप सोचें देश किधर जा रहा है ।
विजय विनीत
9415677513

3 टिप्पणियाँ:

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

आपने सही लिखा है भाई ये वाकई भयानक है। लेकिन इस सच को दूसरे शब्दों में भड़ास पर कई बार डा.रूपेश श्रीवास्तव खीझ कर कह चुके हैं कि अधिकांश भारतीय मतदाता लोकतंत्र के अनुकूल सोच नहीं रखते और जाति,वंश,धर्म,क्षेत्र आदि के मुद्दों को ही आधार बनाते हैं। शायद कभी सुधार हो पाए इसके लिए हम सबको प्रयास करते रहना होगा कि लोग इस बात के प्रति जागरूक हो सकें के देश को राष्ट्र बनाना है ये सफ़र लम्बा है।
जय जय भड़ास

अमित जैन (जोक्पीडिया ) ने कहा…

मै सोनी जी की बातो से सहमत हु / जब तक धर्म जाती सम्पर्दय , . वंश वगैरा रहेगे ये सब होता ही रहेगा

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

आपने बिल्कुल सही लिखा है भाई ये मात्र छद्म लोकतंत्र है। धारदार और पैने शब्दों का चयन करके बेहतरीन अभिव्यक्ति करी है।
जय जय भड़ास

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