जय भड़ास जय जय भड़ास

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

आज बहुत दिनों बाद अपने मन की भड़ास निकालने का वक्त मिला। अब ये मत पूछियेगा की अब तक कर क्या रहे थे? खैर आप लोग पूछे या न पूछे मैं बता ही देता हूँ..भइया हुआ यूँ की जब भी भड़ास पर आता तो पता चलता की दो सांड आपस ऐसे गुथ्थम-गुत्थ हुए रहते की बस भागने में ही भलाई समझ में आती थी। क्या करू महाराज गरीब-गुरबा आदमी हूँ, कभी-कभी जब पेट भर जाता है तो अपनी तरह के बाकी भूखो की अग्नि शांत करने का रास्ता तलाशता हूँ..मैं भी गर्दन तक मलाई ठूस लूँगा तब कही जाकर धर्म-कर्म जैसी उल्टियाँ कर पाउँगा। इसीलिए जब भी भड़ास पर आने की सोचता तो मन में ये रहता था की चलू देखूं कही मेरे जैसे भूखों की रोटी का जुगाड़ हो रहा है? कोई चोरों-भ्रस्ताचारियों और अघाये लोगों से हमारी मांगो को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहा या नही? मगर इधर कुछ दिनों से हताशा और निराशा के सिवाय कुछ नही मिलता था। गुरूजी रुपेश श्रीवास्तव जी ने ऐसा आहाता बनाया था की गली के भूखे-नंगे कुत्ते यहाँ आकर कुछ आप बीती भो -भो कर पाते। हो भी ऐसा ही रहा था..भड़ास पर एक दुसरे की हालत-मलानत पर चर्चाएँ होती थी और आगे भी होती रहेंगी। मगर इस आहते में कुछ छुट्टा सांड ऐसे घुसे की हम जैसे लोग तो उनकी दुलत्ती का शिकार हो गए। कोई बात नही ! मैं बिल्कुल निराश नही हु क्योंकि यही तो एक चीज है जो हम जैसे लोगों को जिन्दा रखने में मदद करती है...आप लोग सोच रहे होंगे की इतनी जान कहाँ से आ गई जो सांडो से दो-दो हाथ करने का मूड बना लिया तो जनाब ये सुन लीजिये..पड़ोस में एक शादी थी सो जो कूड़ा-कचरा बचा था ..दबा के खा लिया है और अभी तक डकार आ रही है। फ़िर दिमाग में एक आईडिया आया की क्यों न अपने घर को साफ -सुथरा करने की कोशिश की जाय... तो भाई तथाकथित धर्म में पहरुओं से पहले मेरी करवद्ध प्राथना है की आप लोग कृपया आपनी बाते कहे लेकिन जनहित को ध्यान में रखते हुए..दूसरी बात जो मुझे लगती है की भड़ास को भड़ास रहने दे। इसे धर्म-कर्म का आखाडा न बनाये , भाई साहेब इसके लिए बड़े ठेकेदार सदियों से धर्म का झंडा गाडे खड़े है..कुछ चुभ रहा हो तो उनसे संपर्क करें..जहाँ तक मैंने इतिहास पढ़ा तो यही समझ में आया की सबकी अपनी -अपनी ढपली और अपना-अपना राग है। आप सब के गले में कोई ये पट्टा डालने नही जा रहा है की आप फलाने धर्म को मानिये या फलाने धर्म को मत मानिये..मैं भी किस चुतियापे की बात करने लगा। खैर छोडिये ! भैय्या इधर मंदी, महंगाई और सूखे ने ऐसी मारी है मेरे जैसे भाई लोगों को दिन में ही तारे दिखयीं दे रहे है..सूर्य ग्रहण वाले नही , गरीब ग्रहण वाले..तो कुल मिलकर यही गुजारिश है की धर्म के बारे में ज्यादा सोचेंगे तो आपको चीन की तरह सोचना होगा..हाल में ही चीनियों में मसौदा तैयार किया है की भारत को कम से कम २० स्वतंत्र देशो में विभक्त करने की तैय्यारी की जाए। अब आप लोगों जैसे आपस में ही सर-फुत्तौल करेंगे तो किसी को मज़ा आए या न आए चीनियों को जरुर आएगा..अरे अरे अरे जरा धीरे थूथुन फुलाओ महाराज मेरी तो हवा निकल जायेगी...अंत में यही कहना चाहूँगा भड़ास जैसा कोई नही..न हर्रे न फितीकिरी पोस्ट पेल मारिये इ मेल से..आखिर यही तो भड़ास का जनतांत्रिक धर्म है!!!!!
जय भड़ास जय जय भड़ास

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मनोज भाई हम कुत्ते हों या सुअर लेकिन एक बात तो साफ़ है कि हमारे अहाते की चहारदीवारी अगर कोई धार्मिक या कुटिल राजनीतिक सांड तो क्या हाथी भी गिराना चाहे तो हम उसकी क्या मार देंगे????? जवाब दो तो चवन्नी दूंगा:) अच्छा चलो इशारा देता हूं, सांड से मिलता जुलता शब्द है। चलो साले चीनियों को चाय में मिला कर पीने का न्योता है सब भड़ासियों को।
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

सत्य वचनं गुरुदेव,
वैसे मनोज भाई भी ये सब जानते हैं ;-)
जय जय भड़ास

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