भाई गुफ़रान कबाइली सोच के लोग हमें क्या संस्कार और भाषा सिखाते ...??

गुरुवार, 13 अगस्त 2009



आशा है कि भाई गुफ़रान सिद्दिकी जी की गलतफ़हमी कि हम भारत वालों को यानि कि हिंदुओं को शब्द या भाषा के साथ संस्कार किसी हूण या बर्बर जाति के लोगों ने दिये होंगे। आपने बहन जैनब शेख को ........ लगाते हुए लिखना चाहा था कि हमें हिंदू शब्द किसी कबाइली सोच के अरबी ने दिया है। आप ही नहीं इसी तरह अनेक आप जैसे विद्वान गलतफ़हमियों के भयंकर शिकार हैं जो कि ये सोचते हैं कि अरबी सभ्यता हमारी सभ्यता के मुकाबले अधिक श्रेष्ठ है। जबकि सच तो ये है कि ये एक किस्म का अरबी साम्राज्यवाद है जो आप समझ नहीं पा रहे हैं जिसे आपको धर्म की घुट्टी के साथ घोल कर पिलाया गया है इसलिये आस्था की बात कह कर हम इस पर चर्चा न करेंगे वरना विवाद होगा। आशा है कि आप इस विमर्श को अन्यथा न लेकर अपनी गलतफ़हमी सुधार लेंगे। धन्यवाद

3 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

प्रिय गुमनाम बेनाम अनाम विद्वान मित्र आपने मुझे ये संदेश मेरे आयुषवेद के आई.डी. पर क्यों भेजा है मुझे नहीं पता लेकिन मुझे ये आपके धड़ाधड़ पूर्व प्रेषित श्रंखला का ही है ऐसा पता है इसलिये मेरे नाम से ही पोस्ट कर रहा हूं। ये जानता हूं कि अनजाने में कुछ भले आदमी विवाद कर सकते हैं लेकिन मुझे चलता है सब, मैं विवादों से नहीं डरता। किन्तु आपसे निवेदन है कि जब सीधे ही आप ब्लागर के द्वारा ई-मेल से भड़ास पर पोस्ट भेज सकते हैं तो मेरा दूसरा पता इस लिये प्रयोग न करें। यदि कोई बीमारी अजारी हो तो उस पते पर अवश्य भेजियेगा। गुफ़रान भाई ये तो आपके ही पीछे पड़ गये इनसे कहिये कि हमारे भी पिछवाड़े टटोलें शायद कोई गलतफ़हमी मिल जाए जिसे ये दूर कर सकें :)
जय जय भड़ास

दीनबन्धु ने कहा…

इसे कहते हैं गुरू भयंकर भड़ास निकालना। इन्होंने तो दिल दिमाग पेट और न जाने कहां-कहां से जानकारियां निकाल कर उल्टियों से भड़ास को रंग डाला है। गुफ़रान भाई को बधाई हो कि वे इस महान कार्य के निमित्त बने हैं। समझ न आया कि इस महान वमन से किसका भला होने वाला है?
जय जय भड़ास

दीनबन्धु ने कहा…

दूसरी बात कि आप महाशय भी अनूप मंडल से सम्पर्क में हैं कस कर तभी तो अपनी किताब पर टिप्पणी लिख रहे हैं। कोई बात नहीं और ज्यादा "होचिये(सोचिये)" ताकि देश का भला हो सके

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