लो क सं घ र्ष !: क्या राष्ट्रवादियों के कानो में झुनझुना बजाऊं ?

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

जब कभी आप किसी सच्चाई की तलाश करना चाहते है तो यह जरूरी है कि आप उसके प्रचलित और लोकप्रिय अर्थ से हटकर सोचने की कोशिश करेंसाम्प्रदायिकता की परिभाषा आज नए सिरे से करने की जरूरत हैसमाज का एक वर्ग जब किसी चीज की परिभाषा एक तरह से करना शुरू कर देता है तब हम उसी दिशा में सोचने लगते हैअगर दस-पाँच पीढियों से हमारा परिवार हिन्दुस्तान में रह रहा है तो मैं उतना ही राष्ट्रीय हूँ जितने की आपफिर क्या जरूरी है कि आप मुझे अपनाएंगे जब मैं आपके कानो में राष्ट्रीयता का झुनझुना बजाऊंयदि मैं सांप्रदायिक हूँ तो आप मुझसे ज्यादा सांप्रदायिक हैं, जिन्होंने मुझे सांप्रदायिक बनाया

-गुलशेरखान शानी
विनोद दास की 'बतरस' से साभार

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

जनाब,झुनझुने इन्हें सुनाई ही नहीं देते इनके कानों पर तो धमाकों से भी जूं नहीं रेंगती है....
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