अल्लाह का चमत्कार है तो इसे जल्द से जल्द अल्लाह के पास भेज दो (मार कर इसका मांस खाकर)

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

बकरीद की परंपरा है स्वाभाविक सी बात है कि इस विषय पर लिखना विवादास्पद हो जाता है क्योंकि मैं खुद एक मुस्लिम के घर में पैदा हुई हूं। कुछ दिन पहले मैंने एक अंग्रेज़ी अखबार में एक विज्ञापन देखा कि एक बकरा बिकाऊ है। सहज सी बात है कि बकरीद के अवसर पर ऐसे विज्ञापन ही प्रकाशित होंगे। लेकिन मुझे इस बकरे के बारे में जान कर अजीब सा भाव मन में उठा कि यदि किसी चमत्कार वश इसके बदन पर एक तरह "अल्लाह" और दूसरी तरफ़ "मोहम्मद" लिखा है तो क्या इसे सबसे पहले अधिकतम कीमत पर खरीद कर कथित कुरबानी के जरिये काट-पीट कर खा डाला जाए? अगर खुद ऊपर वाले ने इसके जिस्म पर आटोग्राफ़ करे हैं तो ये प्राणी उसका चहेता होगा लेकिन इसी अल्लाह के आटोग्राफ़ ने इससे तत्काल जीने का अधिकार छीन लिया कि बेटा जा उसी अल्लाह के पास और अपनी हड्डी-बोटी हमें देता जा।
इस लिहाज़ से तो जितने माता-पिताओं ने अपने नौनिहालों का नाम "मोहम्मद" रखा है उन्हें भी तत्काल काट कर अल्लाह की राह में भेज देना चाहिये और उनका मांस पका कर खा लेना चाहिये क्योंकि शायद दुनिया बनाने वाले तक कोई भी चीज भेजने का रास्ता उसके भक्तों के पेट से होकर जाता है।
बेचारा बदकिस्मत बकरा
जय जय भड़ास

5 टिप्पणियाँ:

ab inconvinienti ने कहा…

बेचारा बदकिस्मत बकरा

गुफरान सिद्दीकी ने कहा…

salam aapa kafi dino baad apko yahan dekha khushi hui waise mujhe ummid thi ap iss mudde ko yun hi jane nahi dengi lekin aapa maine pahle bhi likha tha in maslon ko jab tak ham thik se jaan na le hame itni gambheer baten nahi likhni chahiye waise dr.sahab bhi us parampita parmeshwar aur unke bandon ke bare me jante aur mante hain ye mujhe pata hai khair eid mubaraq .

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

निःसंदेह गम्भीर बात है क्योंकि आस्था का विषय है और आस्था पर तार्किक प्रश्न करना(वो भी सिर्फ़ ऐसे तर्क जो आपको सुहाएं)परेशानी का सबब बन जाता है। कम से कम परेशानियों से तो डरा करिये।
समस्या है सचमुच इस देश के अजीबो गरीब हो चुके कानून में जो मांसभक्षण करने वाले हिन्दुओं द्वारा उनकी परम्पराओं से मन्दिरों में बलि चढ़ाने को अपराध मानता है।
गुफ़रान भाई यकीन मानिये कि न तो आज तक परमपिता(या माता? जो कुछ भी वो हो, हो तो भी और न हो तो भी मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही उसकी यदि है तो...) और उसके बन्दों के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूं रही बात समझ पाने की तो उन्हें छोड़ कर खुद को समझ पाने के प्रयास में हूं कि आखिर मैं क्यों हूं???? इस चक्कर में अधर्मी और बेदीन जैसी न जाने कितनी मानव निर्मित उपाधियों से नवाज़ा जा चुका हूं।
हर दिन, हर पल मुबारक हो
जय जय भड़ास

दीनबन्धु ने कहा…

धांसू पोस्ट है लेकिन क्या करा जाए आस्था यदि किसी अतार्किक बात पर है तो भी आस्था ही है हम उसके पक्ष में तमाम तर्क और तथ्य जुटाने के लिये प्रयास करते रहते हैं। बस मैं मांस नहीं खाता जिसे खाना हो खाए मुझे एतराज नहीं है लेकिन धर्म की आड़ में बलि देना सही है क्या? हो सकता है कि सही हो हम ही चूतिया हैं :)
जय जय भड़ास

अजय मोहन ने कहा…

आदरणीय आपा,
आपने जो भी कड़ी व्यंगात्मक शैली में लिखा है वह जिनके पक्ष में है हंस रहे हैं जिनके विरोध में है रो रहे हैं। अल्लाह के आटोग्राफ़ जैसे शब्द सचमुच चुटीले हैं दूसरी बात कि भगवान,देवी-देवताओं तक कोई चीज पहुंचाने का रास्ता भक्तों के पेट से होकर जाता है :) आनंद आ गया।
देवी पर बलि चढ़ाने वाले भी तब ही तक बलि देते हैं जब तक दांतों में मांस खाने की ताकत होती है फिर उसके बाद मजबूरी में शाकाहारी हो जाते हैं क्योंकि मांस हजम ही नहीं होता।
परंपराओं को प्रतीकों के तौर पर मनाते रहने में सबके अपने निहित स्वार्थ होते होंगे, मुझे दीवाली के त्योहार के तरीके चिढ़ है देखिए पर्यावरण का सत्यानाश कर दिया जाता है लेकिन आप अगर किसी को पटाखा चलाने से रोकें तो झगड़ा हो जाता है। ऐसे परंपरावादी लोग अभी भी मानव सभ्यता में हजारों साल पीछे हैं।
जय जय भड़ास

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