लोक सूचना अधिकारियों पर दस हजार रूपए का जुर्माना

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

महाराष्ट्र सूचना आयोग ने एक मामले की सुनवाई के बाद नंदुरबार जिला प्रशासन के दो लोक सूचना अधिकारियों पर 9,750 रूपए का जुर्माना लगाया है। मामला कुछ ऐसा है कि सरदार सरोवर बांध से प्रभावित आदिवासी सियाराम सिंगा ने जिला प्रशासन से सूचनाएं मांगने के लिए जो आवेदन दिया था उसे लोक सूचना अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया और सूचना देने में बेवजह देरी बरती। इसके बाद नर्मदा बचाओं आंदोलन की अगुवाई में प्रशासन की इस कार्यप्रणाली के खिलाफ राज्य सूचना आयोग का दरवाजा घटघटाया गया। आयोग ने दोनों पक्षों के साथ बैठकर सुनवाई की और अपने आदेश में लोक सूचना अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आर्थिक दण्ड दिया।
यह किस्सा नंदुरबार जिले में अक्कालकुंआ तहसील के डेनेल गांव का है, जहां नरेगा के तहत कुदावीडुंगर से हिरापाड़ा तक एक सड़क बनायी जा रही है। सियाराम सिंगा ने अपने आवेदन में इस सड़क योजना की मंजूरी,उदघाटन, प्रकाशन पटल, मजदूरों की संख्या, हाजिरी रजिस्टर और नामांकन रजिस्टर से जुड़ी सूचनाएं मांगी थीं। उन्होंने 11 मई, 2009 को अपना आवेदन लोक सूचना अधिकारी, लोक निर्माण विभाग, मोलगी को दिया था। 15 मई, 2009 को पहला जवाब आया जो बहुत ही सीमित, अधूरा और भ्रामक था। इसके बाद जुलाई, 2009 की 6, 14 और 27 तारीखों में विभागीय अपील प्राधिकारी के साथ कागजी सिलसिला तो चला मगर सूचनाओं के पते-ठिकाने का कोई ओर-छोर नहीं मिला। इसे देखते हुए 22 अगस्त, 2009 को राज्य सूचना अधिकारी के नाम से दूसरी अपील दाखिल की गई। हालांकि 5 सितम्बर, 2009 को कुछ सूचनाएं दी भी गईं जो एक बार फिर से अधूरी, झूठी और गुमराह करने वाली ही थीं। दिलचस्प यह है कि सूचना देने वालों कागजातों में बाकायदा यह लिखा हुआ था कि मस्टर रोल नहीं दिया जाएगा क्योंकि वह बेवसाइट पर उपलब्ध है। यह कथन अपनेआप में दिलचस्प इसलिए है क्योंकि यहां के ग्रामीण और आदिवासी इलाके का लोक सूचना अधिकारी पहले से ही यह मान बैठा है कि हर एक आवेदक के पास कम्प्यूटर होगा ही और उसे कम्प्यूटर के साथ-साथ बखूबी इंटरनेट चलाना भी आता होगा!!

इस मामले में 8 दिसम्बर, 2009 वह तारीख थी जिसमें आयोग के सामने सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान महाराष्ट्र के मुख्य सूचना आयुक्त सुरेश जोशी के सामने आवेदक और लोक सूचना अधिकारी हाजिर हुए। तब आवेदक के पक्ष में नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता एडवोकेट योगनी कानोलकर ने बतलाया कि सूचना देने की यह पूरी प्रक्रिया किस तरह से गैरकानूनी और जानबूझकर उलझाने वाली है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद आयोग ने पाया कि लोक सूचना अधिकारियों की ओर से सूचना देने में कुल 39 दिनों की देरी हुई है। इसलिए 24 दिसम्बर, 2009 को आयोग ने अपने आदेश में दोनों अधिकारियों पर 250 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से कुल 9,750 (250x39) रूपए का जुर्माना लगाया। मतलब अब दोनों को अपनी-अपनी जेब से 4,895-4,895 (आधे-आधे) रूपए देने पड़ेंगे। आदेश में आगे कहा गया है कि यह रकम दोनों लोक सूचना अधिकारियों को जनवरी, 2010 में मिलने वाली सेलरी से बसूल की जाए और इसी के साथ 15 फरवरी, 2010 तक राज्य सूचना आयोग के समक्ष जुर्माना भरे जाने की पुष्टि भी की जाए।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने आयोग के इस आदेश का स्वागत किया है। आंदोलन का मानना है कि नंदुरबार जैसे जिलों में, जहां लोक निर्माण कार्यों में होने वाली घूसखोरी पर नियंत्रण नहीं है, वहां अधिकारियों पर इस तरह की कार्रवाई से आमजनता में अच्छा संदेश पहुंचेगा। वैसे भी नरेगा जैसी परियोजना में बड़े पैमाने पर जो घूसखोरी व्याप्त है वो जगजाहिर है, लिहाजा आयोग द्वारा सुनाई गई यह सजा अपनेआप में खास महत्व रखती है।

इस मामले की अगर थोड़ी और पड़ताल की जाए तो महाराष्ट्र सूचना आयोग के आदेश पर थोड़ा और सोचा-विचारा जा सकता है। पहले विचार के मुताबिक, सूचना आयुक्त कानून में मौजूद अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उचित मुआवजे के निर्देश भी दे सकते थे। ऐसा इसलिए भी क्योंकि आवेदक सियाराम सिंगा गरीबी रेखा के नीचे आने वाले उस आदिवासी परिवार से है जिसे बेवजह ही शारारिक और मानसिक परेशानियों से गुजरना पड़ा है। दूसरे विचार के मुताबिक, मई से लेकर अबतक मतलब कई महीनों के बीत जाने तक आवेदक को सूचनाएं देने के मामले में गुमराह किया जाता रहा है, इस हिसाब से लोक सूचना अधिकारियों पर 9,750 रूपए का जुर्माना तो बेहद मामूली है। कायदे से यह जुर्माना 25,000 रूपए के आसपास होना चाहिए था। तीसरे विचार के मुताबिक, आदेश में गुमराह करने वाले ऐसे अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई भी जरूरी थी। इससे सभी लोक सूचना अधिकारियों को यह सबक तो मिलता कि उन्हें आवेदकों तक बगैर किसी देरी के सही, सटीक और पर्याप्त सूचनाएं पहुंचानी है।
चलते चलते
महाराष्ट्र सूचना आयोग के आडिट यह दर्शाता है कि 6 सूचना आयुक्त हर रोज करीब 5 सुनवाइयों का निपटारा करते हैं। इस तरह से एक आयुक्त हर महीने करीब 150 मामलों का निपटारा करता है। 2008 में नागपुर के सूचना आयुक्त विलास पाटिल ने सबसे ज्यादा 2003 मामलों को निपटारा किया था। इसके बाद मुंबई के सूचना आयुक्त सुरेश जोशी 1983 मामलों को निपटाया था। मगर नवी मुंबई के सूचना आयुक्त नवीन कुमार सबसे कम 1298 मामलों को ही निपटा सके थे। अनुमान है कि एक सूचना आयुक्त हर महीने कम से कम 300 मामलों को तो निपटा ही सकता है। इस आधार पर अगर दिसंबर, 2008 के आकड़े पर नजर डाले तो महाराष्ट्र सूचना आयोग में सुनवाई के लिए 15026 मामले लंबित थे। इससे पूरे राज्य में सूचना आयुक्तों द्वारा मामलों को निपटाने की गति का पता चलता है।
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शिरीष खरे 'चाईल्ड राईटस एण्ड यू' के 'संचार-विभाग' से जुड़े हैं।
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2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

इस देश में जितना अधिक घोड़े कागज़ों पर दौड़ सकते हैं दौड़ाए जाते हैं जब कागज से बात नहीं बनती तभी ठोस रूप सामने आता है। सूचना प्राप्ति वाले कानून का तो ऐसा ही झुनझुना है। ये हाल है कि लोकतंत्र का हर स्तंभ सूचना दे कर ये बता देता है कि कर लो साले क्या करोगे कानून जो है सो है हम तो अपनी मनमानी ही करेंगे। कानून हमारा क्या बिगाड़ेगा हम ही तो कानून बनाते हैं हम ही पालन करवाते हैं
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

गुरुदेव,
कानों तो ठीक मगर ये कानों लॉन्ग इलाय्न्ची के पैसे ही जुर्माने में वसूलता है, इन मोटे गैंडे पर इस छोटे छोटे जुर्माने का असर होगा क्या.
जय जय भड़ास

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