अनंत अंत......

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

अनंत अंत को तलाश करते हुए एक ऐसे पथ पर चल रहा हूँ जहाँ दूर दूर तक फैला अन्धकार है मुझे लगा ये मेरा वहम है लेकिन इस अंधकार से बाहर निकलने का कोई रास्ता मुझे नहीं मिल रहा है बहुत तलाश करने पर भी वो रौशनी की किरण नहीं दिखती जिसके लिए मै यहाँ आया.....


अनंत अंत

इस अर्थ हीन जीवन में
अनंत अंत के चक्कर में
भटकता सा चंचल मन मेरा है ,
कभी सोचता हूँ इस सृष्टि को
मेरे लिए रचा गया है , कभी
इनसे भागता सा मन मेरा है,
स्वयं को धिक्कारती सी आत्मा
सब कुछ पाने को बेताब शरीर दिखे है ,
अपनों के पापों से दूषित देखो
गंगा का निर्मल जल भी दिखे है,
सूरज की किरने भी अब तो
अपनों के लहू सी लाल दिखें हैं,
इस जीवन दाई हवा से पूछो
उसमे घुलता सा ज़हर ये किसका है,
अनंत अंत के चक्कर में
भटकता सा चंचल मन मेरा है,

3 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बेहतरीन, रहस्यवाद से परिपूर्ण, शायराना सूफ़ियाना अंदाज़......
बड़े दिनों बाद मोहतरम; कहां रहे???
जय जय भड़ास

गुफरान सिद्दीकी ने कहा…

shuqriya suman ji rupesh bhai sahi kahan idhar jeevan ko samjhne ki nakam si koshish kar raha tha isi liye bharhaas par hazir nahi ho paya

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