लो क सं घ र्ष !: बुद्धि जहाँ खत्म होती है, वहीँ पर हाथ चलने लगता है

बुधवार, 19 मई 2010

आज बाराबंकी में बिजली की समस्या को लेकर उत्तेजित अधिवक्ताओं के एक समूह ने जिला मजिस्टे्ट श्री विकास गोठलवाल के कार्यालय में घुसकर जमकर तोड़ फोड़ कीकई वर्षों से बुद्धिजीवी तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्तागण हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं जिससे न्यायिक व्यवस्था ध्वस्त होने लगती है जबकि किसी भी समस्या का सामाधान अधिवक्ता समाज बड़े आसानी से कर देता हैजनता के हर तबके का आदमी किसी किसी रूप में अधिवक्ताओं से सलाह लेकर ही कार्य करता है किन्तु आज कल अधिवक्ता समाज के कुछ लोग हिंसा पर उतारू ही रहते हैं इससे पूर्व कानपूर में अधिवक्ता वर्सेस पुलिस की मारपीट के कारण कई बार कार्य बहिष्कार हो चुका है सेन्ट्रल बार एसोशिएसन के चुनाव में भी कुछ अधिवक्ताओं ने मतपत्र फाड़ डाले और जम कर बवाल किया जबकि अधिवक्ताओं के पास प्रत्येक समस्या का विधिक उपचार मौजूद है उसका प्रयोग करना चाहिए
अधिवक्ताओं के बीच में एक बड़ी संख्या जिसकी रोजी-रोटी अन्य व्यवसाय से चलती है वह अपने काले कारनामो को छिपाने के लिए काला कोट पहनकर न्यायलय परिसरों का उपयोग कर रहे हैंदूसरी तरफ अधिवक्ता समुदाय ने एक ऐसा तबका रहा है जो किसी भी क्षेत्र में कार्य पाने के कारण विधि व्यवसाय में रहा है उसको जब कहीं चपरासी की भी नौकरी नहीं मिली तो वह कुंठाग्रस्त होकर अधिवक्ता हो गयावहीँ पर एक बड़ी संख्या अच्छे ईमानदार अधिवक्ताओं का है जो सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था को संचालित करने में मदद करता है और उसका कोई भी झगडा किसी से नहीं होता है उसको झगडा करने के लिए वक्त ही नहीं रहता है लेकिन नॉन प्रैक्टिसिंग लायर्स ने अधिवक्ताओं की छवि जनमानस में खराब कर रखी है जिसको बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है अन्यथा विधि व्यवसाय पर संकट के बदल मंडराते रहेंगे और विधि व्यवसाय पर अराजक तत्वों का कब्ज़ा हो जायेगाऐसा ही मत माननीय उच्च न्यायलय लखनऊ ने भी किया है

मेरा निश्चित मानना है जहाँ बुद्धि खत्म होती है, वहीँ पर हाथ हिंसा करने के लिए उठते हैंगाली गलौज की भाषा भी वहीँ प्रयोग होती हैचाहे समाज हो या ब्लॉग जगत

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भाईसाहब मुझे विश्वास है कि विधि जब तक व्यवसायिक रहेगी जैसे कि चिकित्सा या शिक्षा आदि जो कि कभी सेवाभाव के क्षेत्र थे तो इस व्यवसायिकता के चलते ऐसा होना सहज है। अपनी बात मनवाने का एक तरीका जबरई भी है जब तर्क न चले। आप चाहें तो इस सदा कारगर तरीके को आजमा सकते हैं जो न माने उसे जुतिया दीजिये वह आपकी बात आपके सामने तो कम से कम मान ही जाएगा यह साम दाम दंड भेद नीतियों में से दंड नीति के तहत करा जाता है। "ईमानदार" अधिवक्ता एक ऐसा आदर्श व्यक्तित्व होता है जो कि किस्से कहानियों या दामिनी जैसी हिंदी फिल्मो में ही दिखता है और अच्छा भी लगता है यदि वकीलों के जिस्म पर जिरह करते समय "लाई-डिटेक्टर" लगा हो तो फिर आप देख लीजिये कि ये सेवाभावी क्षेत्र जब से व्यवसाय बना है तभी से इसकी मिट्टी पलीद हो गयी है। सर्वाधिक भ्रष्टाचार न्यायपालिका में ही प्रतीत होता है
जय जय भड़ास

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