लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-3

शनिवार, 12 जून 2010

वर्ष -2008 में 26/11 की घटना को लेकर हिन्दी ब्लॉग जगत काफी गंभीर रहा। आतंकवादी घटना की घोर भत्र्सना हुई और यह उस वर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा बना, मगर इस वर्ष यानी 2009 में जिस घटना को लेकर सबसे ज्यादा बवाल हुआ वह है समलैंगिकता के पक्ष में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला। पहली बार हिन्दुस्तान ने समलैंगिकता के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस किया है। हिन्दी ब्लॉग जगत ने भी इसके पक्ष विपक्ष में बयान दिए और देश में समलैंगिकता पर बहस एकबारगी सतह पर गई
किसी ने कहा कि लैंगिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान आधुनिक नागरिक समाज में नहीं है, पर लैंगिक मर्यादाओं के भी अपने तकाजे रहे हैं और इसका निर्वाह भी हर देश काल में होता रहा है, तो किसी ने कहा कि भारतीय दंड विधान की धारा 377 जैसे दकियानूसी कानून की आड़ में भारत के सम लैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों को अकारण अपराधी माना जाता रहा है, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने किसी भी प्रकार के यौन और जेंडर रुझानों से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के अधिकार को मान्यता देने का ऐतिहासिक कार्य किया है तो किसी ने कहा की यह विडंबना ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों द्वारा 1860 में बनाया गया यह कानून खुद इंग्लैंड के कानूनी किताबों में से सालों पहले मिट चुका, लेकिन भारत में यह उनके जाने के बाद भी दशकों तक कायम है आदि।
रेखा की दुनिया ने अपने 09 जुलाई 2009 के अंक में समलैगिकता की जोरदार वकालत करते हुए लिखा है जिस देश में कामसूत्र की रचना हुई आज उसी धरती पर वात्स्यायन के वंशज काम संबंधी अभिरुचि को बेकाम ठहराने में लगे हैं घृणा के इस दोहरे मापदंड पर उनका गुस्सा देखने लायक है इस आलेख में। महाशक्ति के दिनांक 29.07.2009 के आलेख का शीर्षक है समलैंगिंक बनो पर अजीब रिश्ते को विवाह का नाम न दो, विवाह को गाली मत दो । परमेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं कि वह दृश्य बड़ा भयावह होगा जब लोग केवल अप्राकृतिक सेक्स के लिए समलैगिंक विवाह करेंगे, अर्थात संतान की इच्छा विवाह का आधार नहीं होगा। अपने ब्लॉग पर अंशुमाल रस्तोगी कहते हैं कि अब धर्मगुरु तय करेंगे कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। नया जमाना के 16 अगस्त 2009 के पोस्ट वात्स्यायन, मिशेल फूको और कामुकता (2) के अनुसार समलैंगिकों की एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में फूको ने कहा ‘कामुकता’ को दो पुरूषों के प्रेम के साथ जोड़ना समस्यामूलक और आपत्तिजनक है। ‘‘अन्य को जब हम यह एक छूट देते हैं कि समलैंगिता को शुद्धतः तात्कालिक आनंद के रूप में पेश किया जाए, दो युवक गली में मिलते हैं, एक- दूसरे को आँखों से रिझाते हैं, एक-दूसरे के हाथ एक-दूसरे के गुप्तांग में कुछ मिनट के लिए दिए रहते हैं। इससे समलैंगिकता की साफ सुथरी छवि नष्ट हो जाती है।
दस्तक ने अपने 11 अगस्त 2009 के पोस्ट में टी.वी चैनलों का उमड़ता गे प्रेम पर चिंता व्यक्त की है । कहा है कि 2 जुलाई का दिन दिल्ली हाई कोर्ट का वह आदेश, पूरा मीडिया जगत के शब्दों में कहें तो खेलने वाला मुद्दा दे गया। जी हाँ हम बात कर रहें हैं हाईकोर्ट के उस आदेश का जिसमें देश में अपनें मर्जी से समलैगिंक संबंध को मंजूरी दे दी गई थी। ठीक हाँ भाई समलैंगिक को मंजूरी मिली। उनको राहत मिला। पर उनका क्या जिनका चैन हराम हो गया। आखिर जो गे नहीं उनकी तो शामत आ गई।
इधर चैनल वालों को ऐसा मसाला मिल गया जिसको किसी भी चैनल ने छोड़ना उम्दा नहीं समझा। उधर इस चक्कर में और दूसरें मुद्दे जरूर छूट गए। दिलीप के दलान से श्रनसल 10, 2009 को एक घटना का जिक्र आया कि घर की घंटी बजी, साथ-साथ बहुत लोगों की। अंदर से गुड्डी दौड़ती हुई आई, झट से दरवाजा खोला। बाहर खड़े भैया ने गुड्डी से कहा गुड्डी ये तुम्हारी भाभी हैं। गुड्डी के चेहरे पर खुशी की जगह बारह बज गए और वह फिर दोबारा जितनी तेजी से दौड़ती हुई आई थी उतनी तेजी से वापस दौड़ती हुई माँ के पास गई, और माँ से बोली माँ भैया आपके लिए भैया लेके आए हैं। परिकल्पना पर भी मंगलवार, 29 जुलाई 2009 को ऐसी ही एक घटना का जिक्र था जिसका शीर्षक था-शर्मा जी के घर आने वाली है मूंछों वाली बहू, बहूभोज में आप भी आमंत्रित हैं। बात कुछ ऐसी है के 7 जुलाई 2009 के एक पोस्ट ‘यहाँ’ आसानी से पूरी होती है समलैंगिक साथी की तलाश, में यह रहस्योद्घाटन किया गया है कि क्लबों, बार, रेस्टोरेंट व डिस्कोथेक में होती हैं साप्ताहिक पार्टियाँ। पिछले 10 वर्षों से लगातार बढ़ रही है समलैंगिक प्रवृत्ति। पिछले छह वर्षों में बढ़ा है समलैंगिकता का चलन। समलैगिकों में 16 से 30 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की संख्या अधिक दक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में होती हैं। अप्राकृतिक संबधों को गलत नहीं मानते समलैंगिक। उनके लिए प्यार का अहसास भी अलग है और यौन संतुष्टि की परिभाषा भी अलग है। समलिंगी साथी के आकर्षण का सामीप्य ही उन्हें चरम सुख प्रदान करता है तभी तो चढ़ती उम्र में वह एक ऐसे हमराही की तलाश करते हैं जो तलाश उन्हें आम आदमी से कुछ अलग करती है।
इस सन्दर्भ में भड़ास के तेवर कुछ ज्यादा तीखे दिखे जिसमें उसने स्पष्ट कहा कि समलैंगिकता स्वीकार्य नहीं बल्कि उपचार्य है । मोहल्ला का समलैंगिकता पर कानून की मुहर से प्रकाशित शीर्षक में कहा गया है कि नैतिकता ये कहती है कि यौन संबंधों का उद्देश्य संतानोत्पत्ति है, लेकिन समलैंगिक या ओरल इंटरकोर्स में यह असंभव है। वहीं ब्लॉग खेती-बाड़ी के दिनाँक 05 जुलाई 2009 के एक पोस्ट में समलैंगिकता के सवाल पर बीबीसी हिन्दी ब्लॉग पर राजेश प्रियदर्शी की एक बहुत ही यथार्थ टिप्पणी आई है, जो थोड़ा असहज करने वाली है लेकिन समलैंगिक मान्यताओं वाले समाज में इन दृश्यों से आप बच कैसे सकते हैं? हमारे देश में इस वक्त दो अति-महत्वपूर्ण किंतु ज्वलंत मुद्दे हैं-पहला नक्सलवाद का विकृत चेहरा और दूसरा मँहगाई का खुला तांडव। आज के इस क्रम की शुरुआत भी हम नक्सलवाद और मँहगाई से ही करने जा रहे हैं। फिर हम बात करेंगे मजदूरों के हक के लिए कलम उठाने वाले ब्लॉग, प्राचीन सभ्यताओं के बहाने कई प्रकार के विमर्श को जन्म देने वाले ब्लॉग और न्यायालय से जुड़े मुद्दों को प्रस्तुत करने वाले ब्लॉग की।
आम जन के दिनांक 23.06.2009 के अपने पोस्ट नक्सली कौन? में संदीप द्विवेदी कहते हैं, कि गरीबी में अपनी जिन्दगी काट रहे लोग क्यों सरकार के खिलाफ बन्दूक थाम लेते हैं इसे समझने के लिए आपको उनकी तरह बन कर सोचना होगा। सरकार गरीबी और बेरोजगारी खत्म करने की पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन यह दिनों दिन और भयानक होती जा रही है। इसका कारण हम आप सभी जानते हैं। रोजाना छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सलियों के हाथों मारे जाते हैं और जो बच जाते हैं वे मलेरिया या लू के चपेट में आ कर अपने प्राण त्याग देते हैं। क्या अब सरकार नक्सलियों का ख़ात्मा लिट्टे की तरह करेगी? लेकिन इतना याद रखना होगा कि लिट्टे ने अपने साथ 1 लाख लोगों की बलि ले ली। क्या सरकार इसके लिए तैयार है। नक्सलियों के साथ आर-पार की लड़ाई से बेहतर है कि हम अपनी घरेलू समस्या को घर में बातचीत से ही सुलझा लें वरना एक दिन यह समस्या बहुत गंभीर हो जाएगी।

-रवीन्द्र प्रभात
(क्रमश:)

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून-2010 अंक में प्रकाशित

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

रवीन्द्र प्रभात जी इस पूरे आलेख खण्ड में समलैंगिकता के मुद्दे पर लिखते समय जिस अतिविशेष व्यक्तित्व को भूल गये जिसके कारण अपूर्णता साफ़ झलक रही है वह हैं हिन्दी पत्राकारिता की कद्दावर शख्सियत जिनके होने से ही तमाम परंपरावादियों और मुखौटाधारियों को रोना आने लगा था वह हैं भड़ास की आदरणीया वरिष्ठ पत्राकार मनीषा नारायण यानि हम सबकी मनीषा दीदी। मनीषा दीदी स्वयं एक लैंगिक विकलाँग हैं जिन्हें सभ्य समाज में हिजड़ा जैसे कठोर संबोधन से पुकारा जाता है। मनीषा दीदी अर्धसत्य पत्रा लिखती हैं जिसपर आजकल उन्होंने लिखना कम कर दिया है।
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