पुण्य प्रसून वाजपेयी और भ्रष्टाचार !

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011


आप सोच रहे होंगे की अगर मैंने भ्रष्टाचार लिखा तो पुण्यप्रसून वाजपयी को क्यूँ जोड़ा या फिर पुन्यप्रसून की बात कर रहा हूँ तो भ्रष्टाचार का क्या तुक है मगर बात बड़ी गहरी है. जुगलबंदी तो है क्यूंकि आज मीडिया में सिर्फ भ्रष्टाचार मुद्दा है और मुद्दा है तो मीडिया है. मुद्दा और मीडिया का गठजोड़ है तो हम पुन्य प्रसून को लेकर चलते हैं.


बड़ा घालमेल है भ्रष्टाचार पर विचार करें तो बात नयी नहीं लगती और मीडिया पर बात करें तो मामला पुराना नहीं है. आदर्श घोटाला हो या टू जी स्पेक्ट्रुम या फिर विदेशी बैंक में काला धन बात तो है और जब बात है तभी मुद्दा भी है और मीडिया भी मगर इस बात में शीर्षक का क्या सरोकार समझना होगा.

पहले चलते हैं मध्य पूर्व में जहाँ लोक तंत्र के लिए बिगुल है, एक क्रांती जो पुरे मध्यपूर्व में लोकतंत्र के लिए हो रही है मगर पुन्य प्रसून वाजपेयी को देशी लोकतंत्र में जो खामी नजर आती है उसे लेकर मध्यपूर्व की क्रांति पर उन्हें संदेह है. जी हाँ बात पुन्य प्रसून के प्राइम टाइम कार्यक्रम की. पुण्य का मन्ना है की दुनिया का जो सबसे बड़ा लोकतंत्र जिस भ्रष्टाचार की दल दल में आकंठ डूबा हुआ है को देखते हुए लोकतंत्र पर संदेह्ह होगा.

मामला सिर्फ लोक तंत्र का नहीं क्यूंकि पुन्य को मध्यपूर्व में मीडिया का दमन और सबसे बड़े लोकतंत्र में बाजारवाद पर मीडिया की बुक्काफाड़ स्वतत्रता नहीं दिखाई दे रही है.

चलिए हम वापस अपने देश लौटते हैं, यहाँ राजा, टू जी, कपिल सिब्बल और आदर्श घोटाले के बीच मीडिया ने कुछ गम किया है तो वो है नीरा राडिया, बरखा दत्त, और वीर संघवी का गठजोड़. राजा सबसे बड़ा अपराधी और चर्चा सिर्फ राजा का, आखिर बरखा और वीर कहाँ चले गए ? बरखा वीर और राजा की तिकड़ी में पुण्य प्रसून कहाँ से आ गए.

बड़ा गोरख धंधा है सब का मेल मगर सब के सब मौका परस्त. तो बात पुण्य प्रसून पर जी हाँ नीरा के नीड़ को ग्रहण अगर बरखा ने अपने और एन डी टी वी के लिए किये तो वीर ने भी इस नीड़ को ग्रहण किया, पुन्य प्रसून के भ्रष्टाचार आन्दोलन से वीर और बरखा का गायब होना और कभी कभार नीरा का आना, कुछ न कुछ तो है मगर है क्या? समझना होगा.

चलिए पुण्य प्रसून पर नजर डालते हैं. विदर्भ से हजार रूपये का करीब की तन्ख्व्वाह के साथ पत्रकारिता की शुरुआत करने वाला आज देश के कुछ गिने चुने लखटकिया पत्रकार में शामिल है. पत्रकारिता में तरक्की के क्या साधन है पत्रकार मित्रों को बताने की जरुरत नहीं क्यूंकि कलम की धार के बावजूद आपकी तरक्की निश्चित नहीं है तो फिर आखिर पुन्य ने इतनी बड़ी छलांग कैसे लगाई. बड़ा कठिन है किस की बात माने किस पर विश्वास करें और लोकतंत्र में पत्रकारिता को कहाँ रखें जहाँ उदाहरण को छोड़ दें तो अधिकतर पत्रकार एक सरकारी बाबु की तरह रिटायर हो जाते हैं और उन्हें पता तक नहीं चलता की उनकी तरक्की कब हुई.

तो बात नीरा राडिया की, पुन्य के नीरा राडिया और बरखा-वीर की तिकड़ी में क्या काम, समझना होगा क्यूंकि इस मिक्स वेज में कुछ तो है जिसके कारन सभी बोल रहे हैं, सभी आरोप लगा रहे हैं और सभी बचा भी रहे हैं. पुन्य को नीरा-वीर-बरखा के बारे में जानकारी थी, इस जानकारी का जिक्र पुन्य अपने ब्लॉग पर कर चुके हैं तो पुन्य का भ्रष्टाचार पर पत्रकारिता या निशाना कहना कठिन है.

अगर धीरू भाई अम्बानी एक मामूली नोकरी करते हुए बहुत बारे अम्पायर का मालिक बन जाता है तो नि:संदेह वो इमानदारी से नहीं हुआ होगा और पुन्य प्रसून सरीखे हजार रूपये वाला पत्रकार लखटकिया बन जाता है तो अपने पत्रकारिता के काबिलियत से तो बिलकुल नहीं.

बात समझना होगा,

जरा सोचिये.....

1 टिप्पणियाँ:

अमित जैन (जोक्पीडिया ) ने कहा…

बिलकुल सही कहा है आप ने ,एक मामूली नोकर अचानक ही ७८००० करोड का मालिक बन जाये , ये ईमानदारी से नहीं हो सकता ,इन सब के पीछे कोई न कोई आर्थिक घोटाला जरुर है , अब जैसे आप सहारा को ही ले लीजिए , इन के एजेंट भोली भली जनता को फ्लैट बेचने के नाम पर उन का लाखो रुपया किसी उस स्कीम मे लगा देते है जहा उन्हें मोटा कमीशन मिले और लगाने वालो को झूठा भरोषा

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