भारत की 11.4% आबादी या 101 मिलियन लोगों को है मधुमेह

गुरुवार, 14 नवंबर 2024

भारत की 11.4% आबादी या 101 मिलियन लोगों को है मधुमेह: A 2023 Lancet study estimates that 11.4% of India's population, or 101 million people, have diabetes. A 2023 Reuters report based

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जनजातीय गौरव दिवस: जनजातीय विरासत का जश्न

जनजातीय गौरव दिवस: जनजातीय विरासत का जश्न: India’s rich cultural diversity is largely shaped by its tribal communities, who have played a crucial role in the nation’s

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जनजातीय गौरव दिवस: जनजातीय विरासत का जश्न

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मार्गदर्शित पिनाका शस्त्र प्रणाली का परीक्षण कार्य सफलतापूर्वक संपन्न

मार्गदर्शित पिनाका शस्त्र प्रणाली का परीक्षण कार्य सफलतापूर्वक संपन्न: Defence Research and Development Organisation (DRDO) has successfully completed the Flight Tests of Guided Pinaka Weapon System as part of

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अब तक 40 करोड़ से ज़्यादा सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग की गई

अब तक 40 करोड़ से ज़्यादा सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग की गई: नई दिल्ली, 15  नवंबर। अब तक 40 करोड़ से ज़्यादा सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग एक विशेष एचयूआईडी के साथ

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मार्गदर्शित पिनाका शस्त्र प्रणाली का परीक्षण कार्य सफलतापूर्वक संपन्न

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मुख्यमंत्री की ओर से कोई घोषणा न होने पर गौचरवासी हुए मायूस

मुख्यमंत्री की ओर से कोई घोषणा न होने पर गौचरवासी हुए मायूस: -गौचर से दिग्पाल गुसांईं- गौचर मेले के उद्घाटन अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा गौचर के लिए किसी

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अनुभवी इंजीनियरों के अभाव से प्रभावित हो रहे थराली क्षेत्र मे निर्माण कार्य

अनुभवी इंजीनियरों के अभाव से प्रभावित हो रहे थराली क्षेत्र मे निर्माण कार्य: -हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट- थराली, 15 नवंबर। तीन विकास खंडों में एक बड़े हिस्से में सुव्यवस्थित यातायात संचालन के साथ

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जनजातीय गौरव दिवस: जनजातीय विरासत का जश्न

जनजातीय गौरव दिवस: जनजातीय विरासत का जश्न: India’s rich cultural diversity is largely shaped by its tribal communities, who have played a crucial role in the nation’s

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मंगल ग्रह के ऊपरी वायुमंडल में पाई गई उच्च-आवृत्ति तरंगें

बुधवार, 13 नवंबर 2024

मंगल ग्रह के ऊपरी वायुमंडल में पाई गई उच्च-आवृत्ति तरंगें: By- Usha Rawat वैज्ञानिकों ने अद्भुत नैरोबैंड और ब्रॉडबैंड विशेषताओं के साथ मंगल ग्रह के ऊपरी वायुमंडल

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क्या हवा में मौजूद बदबू भी दूर कर सकते हैं एयर प्यूरीफायर, जानें इनका क्या होता है काम?

क्या हवा में मौजूद बदबू भी दूर कर सकते हैं एयर प्यूरीफायर, जानें इनका क्या होता है काम?: ठंड के साथ प्रदूषण ने भी दस्तक दे दी है। देश के कई शहरों की हवा का एयर क्वालिटी इंडेक्स

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अपने उद्देश्यों से भटक गया गढ़वाल मंडल का सबसे बड़ा विकास उत्सव, गौचर मेला

अपने उद्देश्यों से भटक गया गढ़वाल मंडल का सबसे बड़ा विकास उत्सव, गौचर मेला: -गौचर से दिग्पाल गुसांईं- संस्कृति को जीवंत बनाए रखने वाला एक मात्र गौचर औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेला एक दौर

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उत्तराखंड में पलायन रोकथाम के लिए बनेगी अल्प, लघु और दीर्घकालिक योजनाएं

उत्तराखंड में पलायन रोकथाम के लिए बनेगी अल्प, लघु और दीर्घकालिक योजनाएं: देहरादून,  13  नवंबर।   उत्तराखंड राज्य में पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी

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मुख्यमंत्री धामी बोले, चार धामों में आने वाले यात्रियों की सख्या होगी तय

मुख्यमंत्री धामी बोले, चार धामों में आने वाले यात्रियों की सख्या होगी तय: बद्रीनाथ/ज्योतिर्मठ, 13नवंबर ( कपरूवाण) । प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने तय कार्यक्रमानुसार बुधवार को प्रातः 10 बजे बदरीनाथ

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टीपू सुल्तान की ऐतिहासिक तलवार नीलाम, 3.4 करोड़ रुपये में हुई बिक्री

टीपू सुल्तान की ऐतिहासिक तलवार नीलाम, 3.4 करोड़ रुपये में हुई बिक्री: नई दिल्ली। टीपू सुल्तान की तलवार नीलाम हो गई है, जो उनके निजी शस्त्रागार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। यह

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नंदा भगवती एवं गोल्जयू महाराज का सिद्धपीठ देवराड़ा में भावपूर्ण मिलन

नंदा भगवती एवं गोल्जयू महाराज का सिद्धपीठ देवराड़ा में भावपूर्ण मिलन: -हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट- थराली, 13 नवंबर। मामी नंदा भगवती एवं भांजे गोल्जयू महाराज का नंदा सिद्धपीठ देवराड़ा थराली में

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उत्तराखण्ड में डेढ़ लाख महिलाओं को लखपति दीदी बनाने के लक्ष्य

उत्तराखण्ड में डेढ़ लाख महिलाओं को लखपति दीदी बनाने के लक्ष्य: देहरादून,  13  नवंबर।  भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में आयोजित राज्यस्तरीय ग्रामीण उद्यमिता विकास कार्यशाला को संबोधित करते हुए, मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह

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पेरिफेरल ज्वाइंट मोबिलाइजेशन पर हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण

मंगलवार, 12 नवंबर 2024

पेरिफेरल ज्वाइंट मोबिलाइजेशन पर हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण: तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के फिजियोथेरेपी विभाग की ओर से दो दिनी वर्कशॉप में कंधें और कूल्हे के ज्वाइंट्स

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अजीबोगरीब बूढ़ा

 जब ऑस्ट्रेलिया के एक छोटे कस्बे के एक नर्सिंग होम के बूढ़ों के वार्ड में एक वृद्ध ने आखिरी सांस ली तो यह मान लिया गया कि उसके पास कीमती कुछ भी नहीं है.

बाद में, जब नर्सें उसके बचे खुचे  सामान को खांगाल रही थीं तो उन्हें यह कविता मिली. कविता की विषय वस्तु और शैली से वे इतनी ज़्यादा प्रभावित हुईं कि उन्होंने इसकी फोटो प्रतियां करके अस्पताल की सारी नर्सों को भेजी.

उनमें से एक नर्स यह कविता मेलबोर्न ले गई. उस बूढ़े की अगली पीढ़ी के नाम यह वसीयत अब तक वहां की पत्रिकाओं के क्रिसमस विशेषांकों में और मानसिक स्वास्थ्य विषयक पत्रिकाओं में कई दफा प्रकाशित हो चुकी है. इस कविता पर एक स्लाइड प्रस्तुति भी तैयार की जा चुकी है.

और इस तरह यह बूढ़ा, जिसके पास दुनिया को देने के लिए कुछ भी नहीं था, इण्टरनेट पर बहु पठित इस इस अनाम कविता के रचियता  के रूप में जाना जा रहा है. 

 

 

क्या देख रही हो नर्स?  क्या देख रही हो?

जब मेरी तरफ़ देखती हो तो क्या सोचती हो तुम?

एक अजीबोगरीब बूढ़ा ...कोई ख़ास अक्लमंद भी नहीं,

जो नहीं जानता कि क्या करे और क्या न करे...कहीं दूर ताकता.

जो बिखेर  देता है खाने-पीने की चीज़ें और नहीं देता है कोई जवाब

जब तुम ज़ोर से कहती  हो उसे...’कोशिश  तो करके देखो!’

और लगता है जैसे उसका ध्यान ही नहीं जाता कि क्या कर रही  हो तुम.

हमेशा ही खोता रहता है वो अपनी चीज़ें – कभी मोजा तो कभी जूता.

वो जो कभी तुम्हें रोकता है और कभी नहीं,  करने देता है तुम्हें अपनी मनमानी-  

उसे नहलाने में या खिलाने  में. कितना लम्बा तो होता है उसका दिन?

यही तो सोच रही  हो ना तुम! यही तो नज़र आता है ना तुम्हें!

अपनी आंखें खोलो नर्स!  नहीं देख रही हो तुम मुझे.

यहां शांत बैठा मैं,

तुम्हारी आवाज़ पर हिलता-डुलता और तुम्हारे इशारों  पर खाता-पीता,

 

बताता हूं तुम्हें कि कौन हूं मैं.

मैं हूं दस साल का एक बच्चा.. मेरे भी हैं मां-बाप,

भाई-बहन – जो करते हैं प्यार एक दूसरे से.

सोलह साल का एक लड़का  - लगे हैं पंख जिसके पैरों में

देखते हुए ख़्वाब कि जल्दी ही मिलेगा उसे उसका प्रेम

और फिर  बीस में आकर वो बना दूल्हा.......मेरा दिल धड़क रहा है बहुत ज़ोर से.

याद आ रही हैं वो कसमें जो खाई थी मैंने.

और अब मैं हूं पच्चीस का और है मेरा भी एक बेटा

जो चाहता है कि मैं उसकी उंगली पकड़ कर दिखाऊं उसे राह और दूं एक सुरक्षित सुखी घर.

मैं हुआ अब तीस का और तेज़ी  से बड़ा हुआ मेरा बेटा,   

बन्धे हुए रिश्तों के मज़बूत बन्धन में.

मैं हुआ चालीस का और और मेरे बच्चे बड़े होकर  चले गए हैं मुझसे दूर

लेकिन पास है मेरी पत्नी... करती फिक्र इस बात की कि न छाए उदासी मुझ पर.

पचास में एक बार फिर बच्चे खेल रहे हैं मेरे इर्द गिर्द

फिर हम घिरे हैं बच्चों से, अपने प्यारे बच्चों से.

अंधियारे दिन आए हैं... छोड़ गई है  मेरी पत्नी.

मैं ताकता हूं भविष्य को और थरथराता हूं डर से. 

मेरे बच्चे पाल पोस  रहे हैं अपने छोटे बच्चों को

और मुझे याद आ रहे हैं वे बरस और वो प्यार जो मैंने था जिया.

अब हो गया हूं मैं बूढ़ा और निर्दयी है प्रकृति!

बेवक़ूफी है उड़ाना मज़ाक बुढ़ापे का.

खण्ड खण्ड होती है देह और अलविदा कहते हैं लावण्य़ और ऊर्जा.

पहले जहां था दिल अब वहां है एक पत्थर.

लेकिन उस पुराने खण्डहर में अब भी रहता है एक युवक

और अक्सर मेरा टूटा-फूटा दिल खिल उठता है

याद करके वो खुशियां.........और वो ग़म.

मैं फिर से कर रह हूं मुहब्बत और फिर से जी रहा हूं ज़िन्दगी.

बीत गई ज़िन्दगी बहुत जल्दी....

मान लिया है मैंने इस सच को कि कुछ भी तो नहीं होता है अजर अमर.

तो खोलो अपनी आंखें  लोगों...खोलो  और देखो.

नहीं हूं मैं एक अजीबोगरीब बूढ़ा.

ध्यान से देखो.... यह हूं मैं!  

 

अगली दफ़ा जब भी किसी बूढ़े से आपकी मुलाक़ात हो, हो सकता है कि उसके बूढ़े शरीर के भीतर छिपे बैठे युवा मन  को आप अनदेखा कर जाएं. तब  इस कविता को  ज़रूर याद करें. एक दिन हम सबका भी यही हश्र  होना है!

 

(मूल कविता: फिलिस मैककॉर्माक, रूपांतरण – डेव ग्रिफिथ).

हिन्दी अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 

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चुनाव जाल में फंसती जनता

शनिवार, 15 जून 2024

चुनावी जाल में फँसते आम वोटर

जाति मज़हब जीते सब,
गया हिंदु बस हार। 
फ्री पैसे के लोभ में, दिया काम दुत्कार।
पंकज प्रियम
नेताओं की धूर्तबाजी और चालाकी में भोली भाली जनता फंस जाती है। निश्चित तौर पर ये धूर्तबाजी सभी अशिक्षित वर्गो पर की गई और वोट लेने के लिए 1 लाख रुपये की गारंटी कार्ड तक दे दी गयी। उन्हें यह नहीं बताया गया कि कोंग्रेस की सरकार बनने पर 1 लाख सलाना दिए जाएंगे वल्कि यह बताया गया होगा कि इंडि गठबंधन को वोट दीजिये और हर महीने आपके खाते में पैसा आने लगेगा तभी तो बंगलुरु में चुनाव के पहले खाता खुलवाने मुस्लिम महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। चुनाव खत्म होते उन्हें लगा कि अब तो उनके खाते में पैसे आ जाएंगे और इसीलिए औरतें कोंग्रेस दफ्तर में पहुँचने लगी। इन दलों ने शुरू से ही मुस्लिम, दलित और पिछते अशिक्षित वर्ग को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करने का पाप किया है। अगर ये महिलाएं शिक्षित होती तो निश्चित तौर पर उन्हें यह पता होता कि यह महज चुनावी भाषण था।
वैसे भी देश की हर महिला को 1 लाख रुपये सलाना देना व्यवहारिक नहीं है। आखिर कहाँ से कोई सरकार इतने रुपये फ्री में देगी? सरकार कोई भी चीज फ्री में नहीं देती है उसकी वसूली आम जनता से ही टैक्स के जरिये करती है। देश की बहुसंख्यक आबादी अपनी मेहनत की कमाई को टैक्स ले रूप में सरकार को देती है और सरकार उसे अपनी राजनीतिक लाभ के लिए रेबड़िओं की तरह मुफ्त में बांटने का काम करती है। अगर फ्री में ही देना है तो विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री अपनी निजी संपत्ति से दे इसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं है लेकिन मध्यमवर्गीय परिवार की मेहनत की कमाई को फ्री में लुटाने का अधिकार किसी सरकार को नहीं है। 

  चुनाव के वक्त पैसे और शराब बांटने का काम लगभग हर पार्टी करती है। वोट के बदले नोट के लालच में समाज के पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग आसानी से फंस जाते हैं और राजनीतिक दल उन्हें अपना वोट बैंक बनाते रहे हैं। वे सही गलत का चुनाव नहीं कर पाते उन्हें समाज के कुछ ठेकेदार जैसे हांकते हैं उसी तरफ हो लेते हैं जबकि अगड़े और शिक्षित वर्गो का वोट बिखरा रहता है, एक ही घर में 4 अलग विचारधारा के लोग रहते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक दलों के लिए पहले अल्पसंख्यक वर्ग वोटबैंक था अब धीरे-धीरे उन्होंने बहुसंख्यक आबादी को जातियो में विभाजित कर दलितों को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं। मौजूदा लोकसभा चुनाव परिणाम को ही देख लीजिए । अल्पसंख्यक, दलित, ओबीसी वर्ग में एकमुश्त एकतरफा वोट दिया क्योंकि उन्हें 1 लाख सलाना का लालच और आरक्षण खत्म करने का डर दिखाया गया। जबकि भाजपा के पारंपरिक वोटर अगड़े और शिक्षित वर्ग वोट देने भी नहीं निकले उन्हें लग रहा था कि भाजपा तो प्रचण्ड जीत की ओर बढ़ ही रही है। प्रधानमंत्री के 400 पार नारे ने भी भाजपा के वोटरों को अलसी बना दिया यही वजह रही कि मुस्लिम बहुल इलाकों में तो बम्पर वोटिंग हुई लेकिन हिन्दू बहुल इलाकों में लोग बाहर नहीं निकले। इसमे कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार के पिछले 10 वर्षों में अभूतपूर्व और अप्रत्याशित कार्य हुए हैं। सड़क, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास हर क्षेत्र में काम हुए हैं। मोदी सरकार में  सरकारी कामकाज की परिभाषा बदल गई। प्राइवेट सेक्टर की तरह ही सरकारी विभागों में टारगेट बेस्ड कार्य हो रहे हैं। छुट्टी और रविवार तो जैसे सरकारी कर्मचारी भूल ही गये हैं। घर आने के बाद भी देर रात तक सबको काम करना पड़ रहा है। सबको मिशन मोड में काम करना पड़ता है। यही वजह है कि मोदी सरकार से सरकारी कमर्चारी का एक बड़ा वर्ग नाराज भी है क्योंकि पहले की सरकारों में उनके लिए कोई काम ही नहीं था। हर घर जल, स्वच्छ भारत मिशन, आवास में सबको शुद्ध पेयजल, शौचालय और पक्के मकान मिल रहे हैं। कोरोना काल से प्रत्येक परिवार में हर सदस्य को 5 किलो मुफ्त अनाज दिए जा रहे हैं आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि इसका लाभ किस वर्ग को ज्यादा मिल रहा है। हिन्दू गरीब परिवारों में मुश्किल से 3 या 4 सदस्य होते हैं तो कुल जमा 20 किलो अनाज उन्हें मिलता है जबकि एक मुस्लिम परिवार में 15-20 सदस्य होते हैं तो उन्हें हर माह 1 क्विंटल मुफ्त अनाज मिल रहा है। उसी तरह हर परिवार को शौचालय और आवास मुफ्त में मिल रहा है। इन योजनाओं से लाखों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़े हुए हैं। गॉंव -गाँव में बिजली, पानी और सड़क की सुविधा मिल रही है। मैं अपने ही गाँव को देखता हूँ कि 15-17 वर्ष पहले एक अदद सड़क तक नहीं थी कोई रिक्शा वाला भी जाने को तैयार नहीं होता था आज हाइवे बन गया है और 24 घण्टे गाड़ियां चलती है। 24 घण्टे बिजली मिल रही है। आज से 15 साल पहले किसी के घर मे एक मोटरसाइकिल तक नहीं थी लेकिन मोटरसाइकिल छोड़िये अधिकांश के घर में कार है।    सबके पक्के मकान बन गए हैं। हालत यह है कि घर और खेत के लिए मजदूर तक नहीं मिलते। सड़क निर्माण में जमीन अधिग्रहण से अधिकांश परिवार लखपति -करोड़पति हो गए हैं। आज मेरे गाँव की जमीन भी सोने के भाव बिक रही है। लोग पैसे लेकर घुम रहे लेकिन जमीन नहीं मिल रही है। सबको फ्री का आवास और अनाज जो मिल रहा है तो कौन काम करे? इसी तरह किसी भी गाँव शहर का उदाहरण देख सकते हैं। अयोध्या और काशी की तो दशा बदल गयी है। याद कीजिये 5 साल पहले की अयोध्या और आज की अयोध्या! जमीन आसमान का फर्क दिखता होगा। काशी, मथुरा, वृंदावन, उज्जैन का विकास देखिए। अपने बाबाधाम में ही अब इंटरनेशनल एयरपोर्ट और एम्स बन गया है। रेल सुविधाओं का विस्तार हुआ है। राम मंदिर बनने के बाद सबको लगा रहा था कि भाजपा को बम्पर सीट मिलेगी लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति देखिए कि फ़ैजाबाद सीट ही हार गई। लोगों का  कहना है कि स्थानीय प्रत्याशी लल्लू सिंह ने कोई काम नहीं किया इसलिए उन्हें हराया। दुकानदारों की दुकानें छिनने का भी रोष था। ठीक है लल्लू सिंह ने काम नहीं किया लेकिन अयोध्या का विकास तो भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी ने ही किया न! आप उस काम के लिए तो वोट देते। केंद्र में मोदी की सरकार रहेगी तो सपा के सांसद कितना विकास कर देंगे? रही बात दुकान घर टूटने की तो आप बेशक मुआवजे के लिए लड़िये, अपनी मांग रखिये। विरोध में आप वोट का बहिष्कार भी कर देते तो भी बात समझ मे आती लेकिन उस दल को कमजोर करना जिसने अयोध्या की 500 वर्षो से अभिशप्त नगरी को पुनः सजाने सँवारने का काम किया। मन्दिर बनने से उसी क्षेत्र का तो सर्वांगीण विकास हुआ है। एक स्थानीय बता रहे थे कि पहले  पूरे मकान का किराया 2 से 3 हजार महीना मिलता था आज एक कमरे का किराया प्रतिदिन 2 से 3 हजार उठाते हैं। फूल-प्रसाद से लेकर घर दुकान तक का रोजगार बढा ही है। अयोध्या, काशी, मथुरा, वृंदावन जैसे शहर की पूरी अर्थव्यवस्था ही मंदिरों के भरोसे है। यूँ कहें कि भारत के अधिकांश शहर मन्दिरो के भरोसे चल रहे हैं। फिर भी उत्तरप्रदेश की जनता का विकास के बजाय महीना मुफ्त का साढ़े आठ हजार ला लालच और आरक्षण जैसे कोढ़ के डर से मोदी सरकार के विरूद्ध वोट करना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। हालांकि इसके लिए भाजपा को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है। अपने कोर कार्यकर्ता की बजाय दलबदलू को टिकट देना भी नुकसानदायक रहा है। यूपी में सीटों के बंटवारे में मुख्यमंत्री योगी को पूर्ण स्वतंत्रता देनी चाहिए थी। जो अच्छे काम कर रहे थे उनका टिकट नहीं काटना था। संघ को लेकर चलना चाहिए था ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिनपर पार्टी को मंथन रखते हुए आगामी चुनाव की तैयारी में अभी से जुटने की आवश्यकता है। बंगाल में ममता बनर्जी के लिए रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठियों का बड़ा वोटबैंक है। ममता बनर्जी उनके अंदर CAA कानून का भय बिठाने में कामयाब रही। वहाँ एक मजबूत विकल्प की जरूरत है। 
 लब्बोलुआब यही कि हर क्षेत्र में विकास हुआ है बावजूद इसके मोदी सरकार को बहुमत नहीं मिलना देश का दुर्भाग्य है। इतिहास गवाह है कि गठबंधन की सरकार कभी स्थायी और मजबूत नहीं होती। पिछले दो कार्यकाल में जिस दृढ़ता के साथ सरकार ने निर्णय लिया तीसरे टर्म फर्क साफ दिखेगा। सहयोगी दल अभी से ही मलाईदार मंत्रालय मांगने लगे हैं जाहिर है उनका एकमात्र ध्येय मलाई काटना ही है विकास से कोई लेना देना नहीं होगा। गठबंधन सरकार के सहयोगी दल अपने ही विकास में लगे रहेंगे तो जाहिर तौर पर नुकसान देश की जनता का ही होगा। 

पंकज प्रियम

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