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यशवंत ने बेचा भड़ास को, भड़ास की आत्मा हमारे पास.

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

भडासी भाई लोगों, अपुन ने अपने रुपेश भैया को देखा है भड़ास के लिए दिल दिमाग और आत्मा तक को भड़ास में लगा दिया था, जो आज भी बरकरार हैभड़ास के मोडरेटर ने हमारे भैया को भाई बनाया, फ़िर मोडरेटर, और प्रधान संरक्षक का लोलीपोप दिया और हमारे रुपेश भैया हो गए यशवंत के दास

यशवंत ने इसी संवेदना का फायदा उठाया और रुपेश भैया को सब जगह हथियार के तौर पर किया इस्तेमाल, और जब हथियार ने संवेदना को बेचने से मना कर दिया तो, उपयोग करने के बाद भड़ास का ही सौदा कर दिया

भड़ास की आत्मा चुरा कर भडासी ने अपना भड़ास रखा अपने पास
अब हमारे भैया अपनी आत्मा को तो बेचने से रहे सो अपना कुनबा ही अलग कर लिया, और छोड़ दिया बनिए की दुकान, जिसने भड़ास की संवेदना और आत्मा ( तमाम भड़ास के लेखक) को ही अपनी दुकान के लिए बेच दिया और खड़ा कर लिया दो दुकान जिसे आज भी भड़ास के मुखौटा वाले ब्लॉग पर देखा जा सकता है। पहले जहाँ भड़ास का संचालक मंडल हुआ करता था, भड़ास को अपनी आत्मा से सींचने वालों के दर्शन हुआ करते थे वहां अब सिर्फ़ और सिर्फ़ यशवंत का दुकान रह गया है
मुखौटाधारी ने बदला नाम, भड़ास को बनाया दूकान
मगर लोगों का हुजूम अब भी इस मुगालते में की भड़ास एक मंच है, अरे चेतो और भड़ास के पंखे बनने से बेहतर है की अपना चेहरा ख़ुद बनो, ये बनिया है इस जमात का अग्रिम दलाल है जो तुम्हारी आत्मा को अपनी दुकान के लिए कभी भी बेच सकता है

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