हिन्दी का चीरहरण किया राजेन्द्र यादव ने.......

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

हिंद युग्म का कल वार्षिकोत्सव था, धूम धाम के साथ सफलतापूर्वक आयोजन के लिए बधाई शैलेश को। मगर क्या ये हिन्दी की भी भावी सफलता की शुरुआत थी, दांतों में सिगार दबाये मुख्य अतिथी श्री राजेंद्र यादव का हिन्दी का मखोल उडाना और सफेदपोश जाहिल दर्शकों का उनके हाँ में हाँ मिला कर ताली बजाना बस ऐसा ही दृश्य था जैसे की द्रौपदी का चीरहरण हो रहा हो और तमाम सभासद तालियाँ बजा रहे हों।




राजेन्द्र जी :- हिन्दी की रोटी या हिन्दी का सिगार, अक्षम्य अपराध, शर्मिन्दा है हिन्दी


हिंद युग्म की साथी और हिन्दी की अध्यापिका श्रीमती शोभा महेन्द्रू जी का दर्द उनके ही शब्दों में.............


शर्मिन्दा हुई हिन्दी


हिन्दी की सेवा करने वाले और उसी की कृपा से विख्यात यशस्वी साहित्यकार को देखने और उनको सुनने को मैं बहुत उत्सुक थी। यह सुअवसर मुझे कल २८ दिसम्बर को हिन्द-युग्म के वार्षिक उत्सव में मिल गया। मैं बहुत उत्साहित थी। मेरा उत्साह कुछ ही देर में क्षीण हो गया। माननीय अतिथि बड़े गर्व से सभा में सिगार पी रहे थे। मैं हैरान होकर सोच रही थी-क्या ये वही देश है जहाँ एक एक कलाकार ने केवल इसलिए गाने से इन्कार कर दिया था कि राजा पान खा रहा था। कला के पारखी क्या इतना बदल गए हैं? अपनी संस्कृति कहाँ गई? और हम सब अतिथि देवो भव का भाव रख मौन देख रहे थे।कार्यक्रम की समाप्ति पर जब उन्होने बोलना शुरू किया तब मुझपर तो जैसे बिजली ही गिर गई। उन्होने कहा- आधुनिक तकनीक का प्रयोग करने वाले साहित्यकारों को अपने विचारों में भी आधुनिकता लानी चाहिए। हिन्दी के प्राचीनतम रूप और उसके प्राचीन साहित्य को अजाबघर में रख दो। उसकी अब कोई आवश्यकता नहीं। आज एक ऐसी भाषा कली आवश्यकता है जिसे दक्षिण भारतीय भी समझ सकें। एक विदेशी भी सरलता से सीख सके। अपनी बात के समर्थन में उन्होने कबीर का सर्वाधिक लोकप्रिय दोहा- गुरू गोबिन्द दोऊ खड़े पढ़ा और उसका विदेश में रह रही महिला द्वारा भावार्थ बता कर मज़ाक उड़ाया। फिर कहा- ऐसी भाषा की अभ कोई आवश्यकता नहीं। इसे अजायबघर में रख दो। अपनी भाषा की सम्पन्नता, उसकी समृद्धि पर गर्व छोड़ उसे दरिद्र बना दो। अपाहिज़ बना दो। एक ऐसी भाषा बना दो जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं। उन्होने हिन्दी साहित्य को भी आज के समय में व्यर्थ बताया। कबीर, प्रेमचन्द आदि का आज कोई महत्व नहीं। मुख्य अतिथि बोलते जा रहे थे और मेरे कानो में भारतेन्दु की पंक्तियाँ - नुज भाषा उन्नत्ति अहै सब उन्नत्ति को मूल गूँज रही थी। यह आधुनिकता है या अन्धानुकरण? संसार की सर्व श्रेष्ट भाषा की ऐसी प्रशंसा? हिन्दी तो स्वयं ही वैग्यानिक भाषा है, सरल है तथा अनेक भाषाओं को अपने भीतर समेटे है। फिर सरलता के नाम पर उसे इतना दरिद्र बना देने का विचार????????? और वह भी एक ऐसे साहित्यकार के मुख से जो हिन्दी भाषा के ही कारण सम्मानित हैं-अगर ऐसी बात किसी विदेशी ने कही होती तो मैं उसको अपनी भाषा के अतुल्य कोष से परिचित कराती किन्तु इनका क्या करूँ? हिन्दी और हिन्दी साहित्य के लिए ऐसे अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करने वाले शब्द शीषे के समान कानों में गिरे। हिन्दी की सेवा करने वालों को सम्मिलित रूप से इस तरह के भाषणों का विरोध करना चाहिए। अपनी भाषा की उन्नति होगी किन्तु उसे दरिद्र बनाकर नहीं। हिन्दी का प्राचीन साहित्य अजायबघर में रखने की बात करने वाला स्वयं ही अजायबघर में रखा जाना चाहिए। अपनी भाषा का अपनमान हमें कदापि स्वीकार नहीं। मैं सारे रास्ते यही सोचती रही कि ऐसे लोगों का सामाजिक रूप से बहिष्कार करना चाहिए- जिनको ना निज भाषा और निज देश पर अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक के समान है।


जय भारत जय


2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भाई दुर्दैव है ठेका गलत लोगों के हाथ में चला गया है तो ये होना ही था। ध्यान रखियेगा आपकी इस सीधी कठोर समीक्षा से हिन्द-युग्म वाले क्या कोई भी इस तरह के आयोजन में आपको बुलाना ही बंद कर देंगे तब आपको जबरन तम्बू में घुसना पड़ेगा और फिर आकर भड़ास पर समीक्षा करनी होगी:)
जय जय भड़ास

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

आप लोग जानते हैं न कि एक तो राजेन्द्र यादव उम्र के चलते सठिया गए हैं दूसरे वे चूने का धंधा करते हैं तो हो सकता है कि चूने की धूल ने दिमाग के इर्द-गिर्द ऐसी परत बना ली हो इतने लंबे अरसे में के अक्लमंदी मंदी के दौर में चली गयी हो,उन्हें माफ़ कर दीजिये वे दिमागी मरीज हैं इससे ज्यादा और कुछ नहीं......
जय जय भड़ास

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