दान के पैसे पर अधिकार किसका ?

रविवार, 11 जनवरी 2009

जो श्रद्धालु जन आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व माँ वैष्णों देवी के दर्शन करने गये होंगे और आज दोबारा जायें तो वह सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पायेंगे कि हर प्रकार की सुविधा से विहीन, दुर्गम पहाड़ियों में बसा हुआ ये तीर्थ स्थल अचानक इतना सुन्दर और सुख सुविधा सम्पन्न कैसे हो गया!  पहले हालात ये थे कि तीर्थयात्री कटरा से मां के दरबार तक की कठिन चढ़ाई अत्यन्त कष्टकर ढंग से पूर्ण कर पाते थे क्योंकि रास्ते भर न तो एक बूंद पानी मिलता था और न ही पल भर विश्राम करने/सुस्ताने के लिये कोई बैंच ही थी।  यदि किसी महिला के गोद के बच्चे ने टट्टी कर ली तो धोने के लिये एक बूंद पानी भी नहीं होता था।  छः रुपये वाली कोल्ड ड्रिंक की बोतल दस रुपये में खरीद कर उससे बच्चे के शरीर को साफ करना पड़ता था।  सारे दुकानदार लूट खसोट मचाये रहते थे। गंदगी इस कदर कि नाक पर कस कर कपड़ा बांध कर, दिल मज़बूत करके मूत्रालय / शौचालय में घुसना पड़ता था। अन्दर जाकर साक्षात नर्क के दर्शन हो जाते थे।  
 
फिर एक दिन जम्मू काश्मीर की सरकार ने निर्णय किया कि इस तीर्थस्थल का अधिग्रहण किया जाये। भाजपा समेत अनेक हिन्दू संगठनों ने हल्ला मचाया कि ये हिन्दू विरोधी सरकार हिन्दू तीर्थों पर कब्ज़ा करना चाहती है।  उन दिनों जम्मू काश्मीर के गवर्नर जगमोहन थे।  अधिग्रहण के बाद ये तीर्थ उनके नियन्त्रण में आ गया और फिर आरम्भ हुआ इसका काया पलट अभियान।  अब वह क्या है येह अपनी आँखों से देख कर ही विश्वास किया जा सकता है।  बरबस मुँह से निकल पड़ता है - यदि अधिग्रहण कर लेने से ऐसा चमत्कार हो जाता है तो सरकार को सारे तीर्थों का अधिग्रहण आज ही कर लेना चाहिये।  बस शर्त एक ही है - ये सभी तीर्थ जगमोहन जैसे कर्मठ एवं कर्तव्यपरायण राज्यपाल के हाथ में जाने चाहियें।         
 
हर प्रकार की सुविधओं से वंचित ऐसा ही एक तीर्थ माँ शाकुम्भरी देवी का दरबार भी है। सहारनपुर के मुख्य आकर्षणों  में से एक ये तीर्थस्थल, नगर से ४२ किलोमीटर उत्तर की ओर शिवालिक की सुरम्य वादियों में स्थित है।  देश विदेश में मौजूद लाखों करोड़ों हिन्दुओं की आस्था उनको यहां बरबस खींच लाती है।  उल्लेखनीय है कि जिस भूमि पर ये तीर्थ स्थित है, वह भूतपूर्व जसमौर रियासत के अन्तर्गत आती है अतः इसका भूस्वामित्व रानी देवलता नाम की एक महिला के पास है जो राणा परिवार की वर्तमान मुखिया हैं।  ये महिला भाजपा से जुड़ी हुई हैं।  ये भी कहा जा सकता है कि ये भाजपा से जुड़ी ही इस लिये हैं ताकि चढ़ावे के रूप में प्राप्त होने वाली करोड़ों रुपये की आय कहीं हाथ से न निकल जाये।  हिन्दू हितों की रक्षा का दम भरने वाली भाजपा, रानी देवलता को अपना विधान सभा का प्रत्याशी बना कर हिन्दू तीर्थयात्रियों के नहीं बल्कि रानी देवलता के हित साधने में लीन रहती है।  जब भी इस क्षेत्र में कुछ ढांचागत सुविधाओं के निर्माण की बात होती है, विस्तार का प्रस्ताव आता है, राणा परिवार को लगने लगता है कि उनके विरुद्ध षड्यन्त्र हो रहा है और कहीं ये दुधारु गाय सा तीर्थस्थल हाथ से न निकल जाये। बस, राणा परिवार के विरोध के चलते सारे प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।  हर वर्ष बरसाती नदी में अचानक आ जाने वाले पानी में कई तीर्थयात्री बह जाते हैं।  पानी का बहाव इतना तीव्र होता है कि उसमें कार और बस का भी संभलना कठिन हो जाता है।  भूरा देव मंदिर से लेकर माँ शाकुंभरी देवी के दरबार तक लगभग एक किलोमीटर नदी में पत्थरों पर चलना होता है तब हम दरबार तक पहुंचते हैं।  इस मार्ग पर यदि पुल / फ्लाई ओवर बन जाये तो सभी यात्री सुरक्षित रूप से मन्दिर तक पहुंच सकते हैं।  
 
रानी देवलता व राणा परिवार के पास इतनी आर्थिक सम्पदा बताई जाती है कि वह अकेले अपने दम पर इस फ्लाईओवर का निर्माण कार्य अपने हाथ में ले सकते हैं। इतना खर्च करने की क्षमता न भी हो, पर कुछ आर्थिक सहयोग करने की क्षमता तो होगी ही।  यदि वह ऐसा करें तो इस भू क्षेत्र की ही नहीं,  सभी आस्थावान हिन्दुओं के दिलों की भी रानी बन सकती हैं।    पर बताया यही जाता है कि इस क्षेत्र के विकास की हर बात में उनको अपनी सम्पत्ति पर सरकारी कब्ज़ा होने का भय सताता रहता है।  दरबार में दीवार पर एक नोटिस बोर्ड टंगा हुआ है जिस पर लिखा है कि यहां दिया गया दान इस तीर्थ के विकास में व यात्रियों की सुविधाओं के लिये खर्च किया जायेगा।  पर इस मद में एक पैसा भी खर्च होता दिखाई नहीं देता है।  न तो तीर्थ का विकास ही हो रहा है और न ही यात्रियों की सुविधा के लिये कुछ किया जाता दिखाई देता है।  क्या यह जनता के विश्वास को ठगना नहीं है?  क्या जनता द्वारा दिये जा रहे दान को अपनी जेब में डाल लेना भिक्षा पर गुज़ारा करने के समकक्ष नहीं है?  क्या राणा परिवार अब इतनी दुरवस्था में है कि भीख पर गुज़ारा करने के लिये विवश है?     
 
रानी देवलता से रार मोल लेने की क्षमता केवल एक राजनीतिज्ञ में है और वह हैं उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमन्त्री मायावती।  यदि वह ठान लें कि इस पावन तीर्थस्थल का उद्धार करना है और देश विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों को समुचित सुविधायें प्रदान करानी हैं तो  जनता का अपार सहयोग और समर्थन उनको सहज ही मिलेगा।  यदि वह एक फ्लाईओवर का निर्माण करा पाती हैं और इस पावन तीर्थस्थल का समुचित विकास करा पाती हैं तो इस तीर्थ के व देश के इतिहास में मुख्यमन्त्री मायावती का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा। 
 
क्या बहिन मायावती सुन रही हैं?                    

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

क्या बहिन मायावती सुन रही हैं?
काश ऐसा हो कि मायावती जी सुन पाएं और सुन कर ध्यान दें और ध्यान देने के बाद उस पर कार्यवाही हो और उससे पहले उनका कार्यकाल समाप्त होकर कोई दूसरी पार्टी की सरकार न आ जाए....
काश...
काश...
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

बहिन जी,
सुन रही हैं या सिर्फ़ हाथी की सवारी हीई,
ये आवाज आम जन की है, कौम की है, आस्था की है, विश्वास की है.
और आशा की लौ को क्या मुख्यमंत्री जलाएँगी.
प्रश्न है और उत्तर सरकार की मुखिया ही देंगी.
जय जय भड़ास

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