संतों की वाणी

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

जिएं ऐसे की कल हो अंत, सिखें इतना की जीवन हो अनंत।
दहेज मांगकर आप अपना सम्मान तो खोते ही हैं, साथ ही भिखारी होने का प्रमाण भी देते हैं।
क्रोध से मनुश्य दूसरों की बेइज्जती ही नहीं करता, बल्कि अपनी प्रतिश्ठा भी गंवाता है।
  • (सौजन्य से: लाला रामनारायण रामस्वरूप)

4 टिप्पणियाँ:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

ह्रदेश भाई,
स्वागत है आपका, वैसे ये कह कर मैं ख़ुद शर्मिन्दा हो रहा हूँ,
इस संदेश्वाचक पोस्ट के माध्यम से आपने भड़ास परिवार में वापस आए हैं.
पंखे वाले भड़ास से यशवंत ने आपको मेरे ही नाम पर मेरे कंधे पर बन्दूक चला कर आपको बाहर किया था मगर अब आप परिवार में वापस शरीक हो चुके हैं.

संतों की बेहतरीन वाणी के लिए आपको बधाई.
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भाई आप हम सब में वापस आ गये इससे बड़ा शुभ शकुन और क्या हो सकता है। सुखद है आपकी वापसी भड़ास परिवार में इस पोस्ट के साथ...
जय जय भड़ास

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

रजनीश मामू ये शर्मिन्दगी वाला क्या आईटम है अपने को भी बताना कभी.... क्या भाई को दुःखी करा था आपने??
जय जय भड़ास

हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा ने कहा…

रजनीश भाई शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है जो भी हमारे साथ हुआ है उसकी ही सहज प्रतिक्रिया का नतीजा है भड़ास का पुनर्जन्म। भाईसाहब फिर से हमारे बीच हैं खुशी है इस बात की जबकि सच तो ये है कि दिल से दूर हुए ही नही ये रिश्ते....
जय जय भड़ास

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