क्या हम सचमुच आजाद हैं?

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

आजादी की ६२ वी सालगिरह मनाई गई ! सच मानिये तो रितायेरमेंट की सटीक उम्र भी यही मानी जाती है। हमारा लोकतंत्र भी अब बूढा हो चुका है। सिर्फ़ उम्र से ही नही बल्कि व्यस्था से, विश्वास से और कर्म से क्यूंकि हमें वो आजादी हासिल नही हो पाई जिसकी दरकार थी। जिस आजादी का सपना हमारे शहीदों ने ध्यान दीजिये सिर्फ़ शहीदों ने देखा था। लेकिन तत्कालीन जीवित देशभक्तों ने अंग्रेजों से बड़ा धोखा देश के साथ किया। बचपन में कभी बुढे दादा से सुना करता था की इस आजादी से भली तो अंग्रेजों की गुलामी थी? मन व्यथित हो जाता था की ऐसा कैसे सम्भव है । धीरे धीरे उम्र बढती गई और दादा की बातें मन में गहरे घर कर गई। इतिहास के पन्नों को पलटने का एक ये भी कारन बना । अब हम भी इस नतीजे पर पहुँच हैं की सचमुच में हम १५ अगस्त १९४७ को आजाद नही हुए थे, बल्कि हमारे शाशानकर्ता बदले थे। सत्ता और पॉवर का हस्तांतरण किया गया था न की देश को आजादी मिली थी। वो ही अंग्रेजी कानून, अंग्रेजी मानसिकता के पक्षधर काले अंग्रेजों का शाशन हमारे ऊपर हो गया। कुछ लोग ये भी कहते है की काश सरदार पटेल जी प्रधानमंत्री बनते तो बात कुछ और होती, लेकिन जनता पर राज करने की ठाने बैठे काले अंग्रेजों का क्या होता? खजाना भरा हुआ था लेकिन उसे बढ़ाना भी तो था, तो भला वे कैसे पटेल जी को प्रधानमंत्री बना देते। शायद भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद सरीखे देशभक्त यदि ये जानते होते की अंग्रेजों को भागने के बाद ये हाल होने वाला है तो पता नही क्या होता? सत्ता हस्तांतरण का समझौता इतनी आनन्-फानन में किया गया मानो बरसों से इसका इंतजार था। मैं पूछता हूँ कैसा हस्तांतरण ? देश हमारा था, लोग हमारे थे फ़िर ये क्यों कहा गया की सत्ता हमारी हो चुकी है। देशभक्त शहीदों ने सत्ता नही मांगी थी उन्होंने तो आजादी मांगी थी, लेकिन दोस्तों सही मायनों में हमें आजादी नही मिली है। हमें गुलामी मिली वो भी अपनों की। इसलिए आज समय आ गया है की हम अपने शासकों को विदा करें। नई आजादी , नया परिवर्तन और नई व्यस्था की लडाई हमें लड़नी होगी। येही हमारी देश के प्रति, देशवासियों के प्रति और देश के नाम aभी तक कुर्बान हुए लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम भड़ास के मंच से एक नए भारत के निर्माण के लिए आन्दोलन का आगाज़ करते हैं। हम गडे मुर्दे नही उखादेंगे लेकिन ख़ुद भी मुर्दा नही बनेंगे। कई तथ्य हमारे सामने है इन साठ सालों में हमें क्या मिला और क्या मिलाना चाहिए का अन्तर आप ख़ुद कर सकते हैं। मेरा सभी पाठकों और भडासी भाइयों से अनुरोध है की इस विषय अपनी राय जरुर दें और इसके लिए जो भी सुझाव हो हमें अवगत कराएं। क्यूंकि ये किसी एक के बस की बात नही है इसके लिए हमें लाखों हाथों का सहारा चाहिए तभी हम कुछ कर पाने की स्थिति में होंगे।
जय भड़ास जय जय भड़ास

4 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मनोज मुझे ही क्या सभी भड़ासियों को याद है कि जब पंखों वाली भड़ास पर मैंने इन्हीं शब्दों में लिखा था बिल्कुल इसी जज़्बे के साथ तो वणिक माडरेटर ने एकदम साफ़ शब्दों में लिखा था कि डाक्टर साहब भड़ास क्रान्ति का मंच नहीं है लेकिन मैं मानता हूं कि वैचारिक क्रान्ति का आग़ाज तो हमारे भड़ास पर हो ही चुका है बस मशाल रोशन रहे और बदलाव का सूरज चमके.....
जय जय भड़ास

Manoj dwivedi ने कहा…

Guruji pankhe wali bhadas ka madar..bhi to kala angrej hi hai.lekin iski atma bhi kali hai

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

मनोज भाई डा.साहब ने जिन पुरानी पोस्ट्स का जिक्र करा है आप उन्हें इन लिंक्स और इन लिंक्स पर देख सकते हैं कि वो कितना काइयां आदमी है अगर उसने अब तक पोस्ट्स हटा न दी हों लेकिन अगर उसने भड़ासियों की पोस्ट्स हटाई तो दुकान में क्या बचेगा? बस खाली डिब्बे....
जय जय भड़ास

Manoj dwivedi ने कहा…

BHADAS AUR GURUJI KE BARE KUCHH AUR JANKARI MILI..MUNAOUR AAPA APKA BAHUT-BAHUT SUKRIYA..IS JANKARI KE LIYE. APLOGON SE MUJHE JO PYAR MIL RAHA HAI.USKE LIYE MAIN AP SABKA RIDI HUN.

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