परंपराओं के खोल..... हैप्पी होली, बुरा न मानो होली है वगैरह....

सोमवार, 9 मार्च 2009


त्योहार आए नहीं कि हम सारे लोग एक दूसरे को दे दनादन उस पर्व की शुभकामनाएं देना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात है लेकिन जिन नैतिक मूल्यों के लेकर ये पर्व या त्योहार शुरू हुए थे क्या वे आज भी जिंदा हैं या बस हम सब खोखली हो चुकी परंपराओं को निभाये चले जा रहे हैं? कल होली और ईद मिलादुन्नबी है आजकल के माहौल में बस परंपराओं के खोल रह गये हैं अंदरूनी नैतिक भावनाएं और सौहार्द तो गुम हो गया है सारा सौहार्द और प्रेम तो वेलेन्टाइन डे या ऐसे ही अजीब से दिन पर दिखता है मुझे अभी तक आश्चर्य है कि भारत देश के "इंडियन्स" ने अब तक ’हैलोवीन’ मनाना शुरू क्यों नहीं करा है?
मेहरबानी करके होली नशा करके बेहूदा हरकतें करने का बहाना मत तलाशिये और ईद पर
साम्प्रदायिक दंगा हो ऐसा माहौल टालिये चाहे कुछ भी हो अपनी ऊर्जा सकारात्मक बनाए रखिये। खुश रहिये और सबको खुश रखने का प्रयास करिये।
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बासित भइया अब तो हर दिन हैलोवीन जैसा डरावना सा लगता है मुंबई में कि घर से निकले तो हैं वापिस आएंगे या नहीं:(
पर कुछ समय के लिये होली और ईद की खुशी में हम इन कड़वी सच्चाईयों को भूल जाएं और त्योहार मनाते हैं
जय जय भड़ास

seema gupta ने कहा…

चन्दन की खुशबु
रेशम का हार
सावन की सुगंध
बारिश की फुहार
राधा की उम्मीद
"कन्हैया' का प्यार
मुबारक हो आपको
होली का त्यौहार
regards

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

मित्र बासित,
थोड़े से शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया, आशा और उम्मीद के साथ भाईचारा ही तो हमारी मजबूती है. त्यौहार तो एक बहाना है, हमें एक होने का एहसास करता है.
चलिए इसी त्यौहार के बहाने हमारी भाईचारा और एकता को मजबूत करें.
जय जय भड़ास

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