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बबम बम बबम (बुरा न मानो होली की बोली है )

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

नतिन डवानी चले अकड़ के
भाज़ापा की कमर पकड़ के
कमल हुआ बदनाम तुम्हारी ???
कायावती की बात खोखली
उसकी पोटली जैसे ओखली
उसी में कूटो धान तुम्हारी???
जमता, रमता बगल के सुर में
लाल घुस गया उसी के उर में
वही करो घास विश्राम तुम्हारी???
कमर की नथनी गटर में गिर गई
अपा के पा को दुलत्ती मिल गई
नाचो नाचो ले ले तान तुम्हारी???
अंगरेस की उस में है डंडा
पब्लिक के सिर फोड़ा अंडा
खुद की कट गयी बाण तुम्हारी???
आहुल बाहुल सहर के भौरे
घूम रहे क्यों बौरे बौरे
समझ में आ गयी चाल तुम्हारी???
आला आइला दबा के लेइला
खाइला पीइला लगा के सोइला
सब मरघट के मेहमान तुम्हारी???
जय भड़ास जय जय भड़ास

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गाँव से लुप्त होती गँवई होली !!!!!

सोमवार, 16 मार्च 2009

अभी अभी गाँव से आया हूँकहने को होली थी मगर गाँव इसलिए जा सका क्यूँकी भाई की शादी थीबहरहाल बहाना कोई भी हो सालो बाद इस बार होली में अपने गाँव थाअपना गाँव सुनकर ही मानो ह्रदय के सारे तार एक अद्भुत अहसास से प्रफुल्लित हो जाते हैं सो मेरा भी हो रहा है और याद रहा है एक सिनेमा का नाम "मेरा गाँव मेरा देश" ।

होली के दिन जैसे जैसे करीब आते गए याद आता गया वोह बचपन का लड़कपन और उसी एहसास से होली की पूर्वसंध्या पर इन्तजार करने लगा धुरखेल (होलिका दहन) कारात तक दालान पर बैठा रहा की लोग अब आयेंगे की तब आयेंगे और सभी गाते बजाते सा रा रा रा करते बरहम बाबा के शरण में जा कर धुरखेल करेंगे मगर........

होली की सुबह आम दिनों से पहले होती है क्यूँकी मांस की व्यवस्था करनी रहती है, मिथिला में रहने वाले जानते हैं की गिने चुने दिन मांस का सेवन करने वाले मिथिलावाशी के लिए होली भी उसी एक दिन में से आता है जिसके लिए बड़ी जद्दो जहद करनी पड़ती है की कहीं बकरी मिल जाए, मांस छागर का ही होना चाहिए वगैरह वगैरहसो बस सुबह का समय इसी इन्तजाम में

घर का काम काज निबटाते गयी दोपहर मगर कोई ना आया तो वो था गावं का हमारा संयुक्त होली जो सिर्फ़ यादों में सिमट आया हैना ही कोई रंग गुलाल ना ही धूल की बहार, मिट्ठी और कादो (कीचड़) का तो कहीं अता पता नही, हो भी कैसे जब लोग ही नदारद


फाग के गीत के साथ गाँव का फगुआ, क्या गाँव में अब ये मिलता है?


हम भी नहा धोकर हो लिए फ्रेश, चढाया कुरता पायजामा और जेब में लाल हरा अबीर (गुलाल) की तभी ढलते सूरज के साथ कहीं ढोल बाजा की आवाज सुनाई दीजोश और उत्साह के साथ निकला और गया सड़क पर तो देखा की हमारे बगल में रहने वाले मलाह ( मछुआरे) होली को गँवई फगुआ के तरीके से ही मन रहे हैं, आंखों में चमक आयी जोश हुआ दूना और शामिल हो गया मैं भी उसी टोली में

होली तो मना ली मगर सोचता रहा की गाँव का फगुआ रहा की नही, कैसे लौट के आयेगी हमारी होली

आज भी सोच ही रहा हूँ......

शायद आप उत्तर दें


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परंपराओं के खोल..... हैप्पी होली, बुरा न मानो होली है वगैरह....

सोमवार, 9 मार्च 2009


त्योहार आए नहीं कि हम सारे लोग एक दूसरे को दे दनादन उस पर्व की शुभकामनाएं देना शुरू कर देते हैं। अच्छी बात है लेकिन जिन नैतिक मूल्यों के लेकर ये पर्व या त्योहार शुरू हुए थे क्या वे आज भी जिंदा हैं या बस हम सब खोखली हो चुकी परंपराओं को निभाये चले जा रहे हैं? कल होली और ईद मिलादुन्नबी है आजकल के माहौल में बस परंपराओं के खोल रह गये हैं अंदरूनी नैतिक भावनाएं और सौहार्द तो गुम हो गया है सारा सौहार्द और प्रेम तो वेलेन्टाइन डे या ऐसे ही अजीब से दिन पर दिखता है मुझे अभी तक आश्चर्य है कि भारत देश के "इंडियन्स" ने अब तक ’हैलोवीन’ मनाना शुरू क्यों नहीं करा है?
मेहरबानी करके होली नशा करके बेहूदा हरकतें करने का बहाना मत तलाशिये और ईद पर
साम्प्रदायिक दंगा हो ऐसा माहौल टालिये चाहे कुछ भी हो अपनी ऊर्जा सकारात्मक बनाए रखिये। खुश रहिये और सबको खुश रखने का प्रयास करिये।
जय जय भड़ास

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