एक और ठुकने वाले कवि ............. (अतीत के पन्ने से.....)

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

मित्रों,

हमारे भडास का कमाल हमारे दोस्तों का धमाल, भडासी बुजुर्गों का आशीर्वाद कि ससुरे हम भी तुकबंदी करने लगे हैं।

भैये लोग ई हमारा पहिला तुकबंदी है सो जड़ा पढ़ते चलिए। बहुत हो गया कलुआ-कलुआ ससुर के नाती ने बहुत टाइम खोटा किया सो वापस अपुन लोगों कि दुनिया में आ जाओ। जरा एक नजर इधर भी........


हमारी आदरणीय सलाहकार मनीषा दीदी को समर्पित......


मेरी भी कलम के दिल में लाखों
कविताएं और गज़लें भरी हैं
तुकबंदी के कुत्ते भौंक रहे हैं
तभी तो बाहर निकलने से डरी हैं
लटका, पटका, झटका, खटका की
तुकबंदियां तुम्हें खुश कर रही हैं
भावनाएं अपनी ही चमड़ी को
उधेड़ उसमें भुस भर रही हैं
कांपते हाथों से गिरी दवात की
बिखरी स्याही, समेटे लाखों गज़लें
बगुले तुक के तुक्कों से आगे हैं
हंस सहमें से झांकते फिरते बगलें हैं


जय जय भडास
जय जय भडास

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बच्चे ये पुरानी शराब का ढक्कन खोल दिया है तुमने मुझे याद है जब इस दारू को चुआया गया था तो क्या मनोस्थिति और परिस्थिति थी...
जय जय भड़ास

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