डा0 रूपेश श्रीवास्तव! जब गांड में नहीं है गूदा तो क्यों ब्लाग पर कूदा????( अतीत के पन्ने से......)

रविवार, 10 मई 2009

अरे यह क्या आप तो द्रवित हो गए जरा सी बात पर एक आम हिंदू की तरह.....

प्रभु! आपसे किसने कहा कि मैं हिंदू हूं और वो भी "आम"???? या खुद ही प्रमाणपत्र बनाते रहते हैं?

आपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन नहीं किया या सिर्फ आँखें बंदकर घंटा ही बजाते रहे......

धर्म ग्रंथों का अध्ययन आपकी तरह नहीं करा और रही बात घंटा बजाने की तो क्या कभी आपका घंटा बजाया है?

अफीम की मदहोशी से बाहर निकलकर कुछ तथ्यों पर विचार कर लिया जाए

चलिये हम अफीमची ही सही आप ही हमें होश में लाने के लिये जरा हमारे पिछवाड़े डंडा डाल कर हिलाइये ताकि तथ्यों पर विचार कर सकें आप के साथ।

यह बताईये आप हर साल रावण को फूंकने क्यूँ जाते हैं ?

आपने मुझे रावण फूंकते कब देख लिया? ये बात आपको कहीं खुद रावण ने तो नहीं सूचित करी?

तैमूर लंग.... चंगेज खान ..... अहमद शाह अब्दाली ..... महमूद गजनवी ..... बाबर .... वगैरह लोग क्या पर्यटन पर निकले थे या तीर्थ यात्रा पर ?

आर्य लोग क्या पर्यटन के लिये आये थे यहां जिन्होंने द्रविड़ सभ्यता को रौंद कर रख दिया था?

मीडिया अगर पीछे न पड़े तो कौन रसूखवाला पकड़ में आता है ?

अभी तक आपने निजी तौर पर या "अपने मीडिया" की ताकत से कितने रसूख वालों को पकड़वा दिया है?

आप आदर्शवाद बघार रहे हैं क्योंकि आप शुकून से हैं.....

दाल बघारना अच्छा लगता है आदर्शवाद की दाल मेरे शहर मुंबई में तो पाई नहीं जाती। जब वो दिग्भ्रमित लड़के वी।टी.स्टेशन पर पोजीशन लेकर गोलियां चला रहे थे तब मै प्लेटफार्म नंबर १३ पर बने चालकों के केबिन में उस समय मौजूद चालक हरविंदर सिंह,शिवाजी कुम्भार आदि के साथ बैठा था आप कहां थे आप जानते होंगे। मैं सुकून से हूं ये क्या अब आप निर्धारित करेंगे। मेरे मुल्क में ही नहीं सारे विश्व में आतंकवाद समस्या बन गया है उसके मूल कारण तलाशने कर दूर करने की बजाए सारे मुसलमानों और मुस्लिम राष्ट्रों को दुनिया के नक्शे से मिटा देना आपको हल लगता है तो जो पाकिस्तान में हो रहा है शायद उसमें आप जैसी सोच के लोग सक्रिय होंगे और इस बात पर गर्व महसूस करते होंगे। बर्बरता के पक्षधर होने में आपको सुकून है तो जरा स्पष्ट शब्दों में मोहनदास करमचंद गांधी को चूतिया कहिये न...। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर को गांडू कहने की हिम्मत दिखाइये।

भाई साहब सामजिक और देश के मसले सदैव पारंपरिक मूल्यों से तय नहीं होते.....

कैसे तय होते हैं क्या आप तय करेंगे? आप ने अब तक क्या उखाड़ा है सिवाय बातों के कभी कुछ रचनात्मक करा है या आपको लगता है कि बस शब्द-प्रपंच करके घर गये बत्ती बुझा कर .........। जरा अपनी उपलब्धियों की सूची भी इसी ब्लाग पर प्रकाशित करिये ताकि हमें आपसे प्रेरणा मिले और हम जैसे गांडुओं का भी खून खौलने लगे वरना हम तो बस ऐसे ही आदर्शवाद की बकरचुद्दई करते जीवन बिता देंगे। संभव है कि आप से कुछ सीख कर हम भी किसी की पिछाड़ी(हमारी भड़ासी भाषा में उसे गांड कहते हैं) में बरगद का पेड़ घुसा सकें।

सामने वाला गुलाब नोचकर उसकी डंडी हमारे पिछ्वाड़े में घुसा दे तो ? क्या करेंगे हम ??? और बड़ा गुलाब लेने भागेंगे ???

अहिंसा वगैरह जैसी बकचोदी अब समयबाह्य हो गयी है अब आप जैसे लोग समाज और देश की दशा और दिशा का निर्धारण करेंगे।

आप मीडिया से जुड़े हैं शायद किसी समाचार पत्र या किसी न्यूज चैनल से तो बस एक सवाल का उत्तर दे दीजिये कि क्या जस्टिस आनंद सिंह का नाम सुना है या तब आप पत्रकारिता के गर्भ में थे और किसी अर्जुन ने आपकी मीडिया मां को ये कथा नही सुनाई थी??????



1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बालक अग्नि,एकबार फिर से भड़ास पर भाषा का विवाद खड़ा हो जाएगा शायद क्योंकि इस पोस्ट के बारें में कई लोगों को सही बात ही पता नहीं होगी जो नए हिंदी ब्लागिंग में आए हैं। भड़ास गाली या अभद्र भाषा का पक्षधर कदापि नहीं है ये बात मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं लेकिन जब आक्रोश क्रोध में बदल जाए और आप कुछ न कर पाएं तो एक असमर्थ आदमी जो कि भदेस परिवेश से है और सभ्यता का झूठा दिखावा नहीं करता वह अवश्य गालियां ही देगा,दबे-कुचले और कुंठित गंवार लोग गाली देने के अलावा और कर ही क्या सकते हैं इसलिये इस पोस्ट में जो भाषा है उस पर न जाकर उसके भाव पर जाए तो बेहतर है.....
जय जय भड़ास

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