किसने कहा लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है?

शनिवार, 9 मई 2009

अक्सर लोग कहते है भारत का लोकतंत्र परिपक्व होता जा रहा है। क्या वर्तमान चुनावों को देखकर लगता है कि लोकतंत्र परिपक्व हुआ है। जहां मतदान का प्रतिशत निरंतर घटता जा रहा है‚ क्या इसे लोकतंत्र का परिपक्व होना कहेंगे? जहां अवसरवादिता सबसे प्रमुख सिद्धान्त है‚ वहां कहा जा सकता है कि लोकतंत्र परिपक्व हुआ है? जहां चुनाव नतीजे आने से पूर्व ही राजनीतिज्ञ जोड़−तोड़ शुरु करने लगे‚ क्यों कहें कि वहां लोकतंत्र परिपक्व हुआ है। जहां जनता राष्ट्र से अधिक भाषा‚ क्षेत्र‚ राज्य‚ जाति‚ सम्प्रदाय को अहमियत दे‚ जहां राष्ट्र पर क्षेत्रीय मुद्दे हावी हो जांयें‚ वहां कैसे लोकतंत्र परिपक्व हो सकता है? राजनीतिक दलों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है‚ क्या यही लोकतंत्र की परिपक्वता की निशानी है? जहां नेता दल−बदल करने के बाद भी जनता की आंखों का तारा बना रहे‚ क्या यही लोकतंत्र की निशानी है? जहां योग्यता के बजाय वंशवाद को प्रश्रय मिले‚ वहां लोकतंत्र की परिपक्वता की बात बेमानी ही लगती है। जहां नेता सत्ता की मलाई खाता रहे तो सब ठीक‚ परंतु जैसे ही विपक्ष में जाये तो साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता को मुद्दा बना ले‚ वहां लोकतंत्र और परिपक्व ना बाबा ना। जहां सिर्फ धर्मविशेष की पैरवी करना सेक्यूलर हो और धर्मविशेष की पैरवी करना साम्प्रदायिकता‚ वहां कैसे लोकतंत्र को परिपक्व माना जा सकता है। जहां मीडिया के लक्ष्य फिक्स हों‚ खबरे पैदा की जाती हों वहां कैसे लोकतंत्र परिपक्व हो सकता है? जहां घटनाओं को अलग−अलग नजरिये से देखा जाता हो‚ वहां लोकतंत्र के परिपक्व होने की बात सोची कैसे जा सकती है? जहां सरकार बनाने में ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा’ का सिद्धान्त अपनाया जाता है‚ क्या आप वहां लोकतंत्र के परिपक्व होने की बात कर सकते हैं? जहां सत्ता पाना मुख्य लक्ष्य हो‚ वहां कैसे लोकतंत्र को परिपक्व बताया जाता है? जहां ‘को नृप हो हमें का हानि’ को मूल मंत्र बना लिया जाये‚ वहां लोकतंत्र कैसे मजबूत हो सकता है? जहां पुलिस और सीबीआई का दुरुपयोग हो‚ वहां कैसे कहा जा सकता है कि यह लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है? जहां धर्म विशेष के लोग एक साथ वोट करें तो धु्रवीकरण और धर्म विशेष के लोग करें तो क्रांति‚ ये कैसी परिपक्वता है? जहां लोग बहसों में तो सरकार को खरी−खोटी सुनाते हैं परंतु वोट देने के नाम पर कन्नी काट जाते हैं‚ वहां क्या लोकतंत्र परिपक्व हो सकता है? जहां राष्ट्रीय दलों का आधार निरंतर सिकुड़ता जाये और क्षेत्रीय क्षत्रप हावी होते जावें‚ क्या वहां लोकतंत्र परिपक्व हो सकता है? जहां विचारधारा से अधिक अहमियत सत्ता को दी जाय‚ कौन मानेगा की वहां लोकतंत्र परिपक्व हुआ है? जहां अपने विरोधी को जेल की सलाखों के पीछे पंहुचाने का इंतजाम किया जाता हो वहां लोकतंत्र नहीं हो सकता। जहां सरकार बचाने के लिये अपराधियों को सहन किया जाता है‚ वहां कभी भी लोकतंत्र मैच्योर नहीं हो सकता है।

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

कठैत भाईसाहब मैं आपकी बातों से सहमत हूं बल्कि मेरा तो मानना है कि भारतीय जन लोकतंत्र के अनुकूल थे ही नहीं इन पर तो जबरन ये व्यवस्था लाद दी गयी है ये अधिकतर अब तक सामंतवादी नजरिये से ही दुनिया देखते हैं। उपाय सुझाइये
जय जय भड़ास

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