भारत का लोकतंत्र पाशविक और आदिम सोच पर आ गया है कानूनी तौर पर शायद........

शनिवार, 9 मई 2009

तलवार भांजते वरूण गांधी अब लोगों की जबरन नसबंदी कराने का अपने पिता का कार्यक्रम आगे बढ़ाएंगे लेकिन इनके विचारों की नसबंदी कौन करेगा???????
एक बात बिलकुल साफ़ है कोई माने या न माने लेकिन हमारी सोच आज भी आदिम है और हम ताकत के जोर पर ही आगे आने की पाशविक सोच से आजाद नहीं हुए हैं। हमारे लोकतंत्र के अधिकांश नेताओं को मैंने कई तस्वीरों में हाथ में तलवार लेकर फोटो खिंचवाते देखा है। बड़ी साफ़ सी बात है कि ये किसी नाटक-नोटंकी का सीन तो रहता नहीं है तो फिर तलवार हाथ में लेकर ये किस विचार को दर्शाते हैं? क्या सोच का आधार है? क्या वे भय उत्पंन करना चाहते हैं उनमें जो उनसे सहमत नहीं है। यदि एक आम आदमी सार्वजनिक स्थान पर हाथ में चाकू लेकर चूं-चां भी कर दे तो हमारी "सत्तादलित पुलिस" उस पर कानून की कौन-कौन सी दफ़ाएं कितनी दफ़ा लगाएगी कोई अंदाज तक नहीं लगा सकता। इसी तलवार लहरा कर अपने विचारों को मूर्त करने के क्रम में वरूण गांधी शामिल हो गये हैं अगर कानून के पालनहारों में दम है तो इन स्वयंभू नेताओं के खिलाफ़ कोई कार्यवाही करके दिखाएं। साफ़ जाहिर है कि यदि आप में आगे आकर तलवार भांजने की दम है तो आप नेता हैं अन्यथा आप नागरिक भी बमुश्किल हैं इस देश में.......
जय जय भड़ास

2 टिप्पणियाँ:

Babli ने कहा…

मैं आपकी बात से पुरी तरह सहमत हूँ कि हाथ में तलवार लेने का कोई मतलब ही नहीं है! वरुण गाँधी आख़िर क्या दिखाना चाहते हैं? सच में मुझे भी यही लगता है कि हमारा देश दूसरे देशों के मुकाबले बहुत पीछे है!आप लिखते रहिये और हम पड़ते रहेंगे!

qasim ने कहा…

ये तलवार और उसके पीछे की सोच सिर्फ़ इस दुधमुंहे नेता के हाथ में ही नहीं बल्कि तमाम भारतीय नेताओं के हाथ में दिख चुकी है। इनके लिये कोई कानून नहीं है

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