दर्द कुछ एसा भी होता है

शनिवार, 13 जून 2009

ख्वाबों और ख़्यालों का चमन सारा जल गया,
ज़िंदगी का नशा मेरा धुआ बन कर उड़ गया…
जाने कैसे जी रहे है, क्या तलाश रहे है हम,
आँसू पलकों पर मेरी ख़ुशियों से उलझ गया…

सौ सदियों के जैसे लंबी लगती है ये ग़म की रात,
कतरा कतरा मेरी ज़िंदगी का इस से आकर जुड़ गया…
मौत दस्तक दे मुझे तू, अब अपनी पनाह दे दे,
ख़तम कर ये सिलसिला, अब दर्द हद से बढ़ गया…

2 टिप्पणियाँ:

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

अरे इतना गुस्सा न न हौसला रखिये सब ठीक होगा। वैसे कविता अचछी है ।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

सुंदर कविता
जारी रखिये
बधाई
जय जय भड़ास

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