लो क सं घ र्ष !: राष्ट्रिय हितों के सौदागर है ये निक्कर वाले

सोमवार, 22 जून 2009

बीज़ेपी और संघ परिवार के अन्य सदस्यो के सन्दर्भ में कल्पना करें की भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुलवादी देश में देश भक्त होने के लिए सेकुलर होने और विख्नण्ङनकारी राजनीति के त्याग की शर्त कोई जरूरी नही है क्योंकि सावरकर से लेकर गोलवलकर तक ,हिंदुत्व के सभी विचारको को हिटलर ने सदैव प्रेरित किया है । इसलिए , सिर्फ़ तर्क की खातिर , देखते है की संघ परिवार जिन हिन्दुत्ववादी ताकतों का प्रतिनिधित्व करता है, वे हिटलरी नजरिये से राष्ट्रवादी है या नही। सिर्फ़ तीन मुद्दों कश्मीर, कंधार और सीटीबीटी - पर हम विचार करेंगे । इस विचार का निष्कर्ष यह है की सबको, खासतौर से मुसलमानों को, राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट देने वाली ये ताकतें वास्तव में राष्ट्रिय हितों की सौदागर है और भारतीय जनता ने 15 वी लोकसभा के चुनाव में अडवानी एंड कंपनी को शिकस्त देकर ऐतिहासिक कार्य किया है । पहले कश्मीर। यह सर्विदित है, फिर भी संछेप में दोहराने की जरूरत है की जम्मू - कश्मीर का हिंदू महाराजा अंत तक अपनी रियासत की संप्रभुता के लिए कोशिश करता रहा, पाकिस्तानी हमले के बाद महाराजा रातोरात श्रीनगर से भागकर जम्मू पहुँचा और उस दौरान शेख अब्दुल्ला श्रीनगर में जनता के साथ खड़े रहे, शेख अब्दुल्ला की बदौलत कश्मीर का भारत में विलय हुआ और अगर महात्मा गाँधी एवं जवाहरलाल नेहरू न होते टू कश्मीर भारत में न होता । उस दौर में ''एक देश में दो विधान , दो निशान , दो प्रधान नही चलेंगे, नही चलेंगे '' का नारा लगाकर भारतीय जनसंघ ने विखंडन का बीजरोपण कर राष्ट्रिय सर्वानुमति को कमजोर किया। अब देखिये 21 वी शताब्दी में क्या हो रहा है । पकिस्तान चाहता है की कश्मीर घाटी उसे मिल जाए और भारत जम्मू-लद्दाख के इलाके ले ले । सामरिक महत्त्व के अलावा कश्मीर घाटी की अहमियत यह है की वह मुस्लिम बहुल है। अमेरिका में सक्रीय 'कश्मीर ग्रुप' के अमेरिकी नेट कठियारी का फार्मूला भी इसी समाधान से मिलता -जुलता है। आर.एस.एस के फोर्मुले से पकिस्तान के मनसूबे पूरे हो रहे है । जम्मू - कश्मीर के ऐसे विभाजन की मांग टू अभी तक अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस ने भी नही की है । सहज बुद्धि से समझा जा सकता है की भारत के अन्दर बने स्वायत्त मुस्लिम कश्मीर राज्य के पकिस्तान के विलय में ज्यादा वक्त नही लगेगा । निष्कर्ष यह है की भारत की अखंडता के बजाय करीब 60 लाख मुसलमानों से छुटकारा आर.एस.एस के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

कंधार :24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयरलाइन्स की फलीते आईसी 814 के साथ हुआ हादसा एक सबूत है की संघ परिवार के लौह पुरूष वास्तव में मोम के होते है और अपनी सरकार बचाने के लिए उन्हें राष्ट्रिय हितों को ठुकराने में संकोच नही होता। यह भी की वे अपनी बुज़दिली को छुपाने के लिए बेलगाम झूठ-फरेब का सहारा लेते है।

गौरतलब है की तीन कुख्यात आतंकवादियो की रिहाई के बदले बाजपेई सरकार ने विमान यात्रियों की आजादी कंधार से हासिल की थी । इन ती३न आतंकवादियो को अपने साथ विशेष विमान में बिठाकर विदेश मंत्री जसवंत सिंह कंधार ले गए थे। अडवानी के लौह पुरूष की छवि को बनाये रखने के लिए लगातार कोई न कोई झूठ बोला जाता रहा है। नवीनतम बयान अरुण शोरी का है , जो उन्होंने लोकसभा चुनाव का दौरान दिया । बिजपी के प्रधानमंत्री पड़ के उम्मीदवार (!) की वीरोचित छवि की रक्षा के लिए शोरी ने कहा की कैबिनेट की बैठक में अडवानी ने आतंकवादियो की रिहाई का विरोध किया था। लेकिन ख़ुद अडवानी अभी तक कहते रहे है की जसवंत सिंह को कंधार भेजे जाने के बारे में उन्हें अंत तक जानकारी नही थी। वह इस आशय का बयान भी दे चुके है की आतंकवादियों को रिहा करने के फैसले से भी वह नही जुड़े थे। वह यह भी कह चुके है और सुघिन्द्र कुलकर्णी इन दिनों बार-बार इसे कह रहे है की विमान यात्रियों के बदले आतंकवादियों को रिहा करने का फैसले पर कांग्रेस समेत सभी पार्टियां सहमत थी । तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज़ फर्नाङिस के बयान का दो टूक खंडन कर चुके है । जार्ज़ का कहना है की जिस मीटिंग में फ़ैसला लिया गया, उसमें अडवानी मौजूद थे। कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला का कहना है की अडवानी ने फोनकर कश्मीर की जिलो में बंद आतंकवादियो -मसूद अजहर और मुश्ताक जरगर को रिहा करने की बात कही तो उन्होंने इसका विरोध किया ।

क्रमश :

प्रदीप कुमार
लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार है॥
मोबाइल:09810994447

4 टिप्पणियाँ:

मनोज द्विवेदी ने कहा…

Pradip ji SUPRISDHA PATRAKAR hai. halanki ye nam main pahli bar suna? aur suman ji unse bhi MAHAN hain ye to samjh me aa raha hai. Khair desh ko aap jaise mahanubhavon ki badi jarurat hai. kripya apna prayas jari rakhe. Rahi bat SANGH, BJP, SAWARKAR AUR GOLWALKAR ki to aap jaise mahapurushon ke age inki kya bisat? man prasanna ho ja raha hai ki ap jaise mahan deshbhakt abhi bhi hamare desh me paye jate hain.. DHANYABAD MAHASHAY! DESHBHAKTI CHALU AHE..............

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

जो मुझे पता है वो शायद काफ़ी न हो लेकिन जब १९२५ में इन लोगों ने संघ की स्थापना करी उस वक्त ये देश की स्वतंत्रता के लिये प्रयासरत थे या कुछ अलग कर रहे थे क्योंकि उस दौरान तो काफ़ी उठापटक थी। क्या गोलवलकर और हेडगेवार का राष्ट्रवाद भगतसिंह के राष्ट्रवाद जैसा था या भिन्न??? आप किसे अधिक देशहित में मानते हैं?????
जय जय भड़ास

Suman ने कहा…

sri munendr soni ji'
bhagat singh british samrajyvaad ko nestanaboot kar dena chahte the jabki golvalkar aur hedgavaar ka tathakathit rashtrvaad british samrajyvaad ki madad karne k liye tha desh k hit mein bhagat singh k vichaar aaj bhi samayik hai aur rahenge .bhagat singh shoshan par adharit vyavastha ko samapt kar dena chahte the jabki sangh k log aaj bhi is bahujatiy bahudharmiy dharmnirpeksh desh ko jatiyo aur dharmo mein baat kar desh ko kamjor karne ki disha mein chal rahe hai srimaan ji hamari baat ka nayatha na lijiyega .

suman
loksangharsha

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