सुरेश चिपलूणकर! मैं तुम्हारे कपड़े बिना बीस रुपए लिये ही उतार दूंगा।

शनिवार, 13 जून 2009

आदतन एक दिन "राम" शब्द सर्च इंजन में टाइप करके एक ब्लाग पर गया तो मैंने वहां एक टिप्पणी करी और उससे निकल कर एक और पाखंडी का चेहरा सामने आया जो भड़ास मंच पर आप सबकी नजर है। चित्र इसलिये ले लिए हैं ताकि आप सबको वहां जाना न पड़े।लेकिन अगर फिर भी आप जाना चाहें तो लीजिए लिंक प्रस्तुत है-
https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5799893798490696697&postID=5700027950689371873

हिंदी ब्लाग जगत के महाविद्वान सुरेश चिपलूणकर ने मेरे बारे में साइबर जगत में एक उनके निजी अनुभव का सच रखा है जिसे मैं पूरे सम्मान से भड़ास पर स्वीकार रहा हूं। इन तस्वीरों पर नजर डालिये।
ये लिखते हैं कि डा.रूपेश ब्लागर हो गया क्या? अरे ये २०-२० रुपए में खार, चौपाटी पर.... समझ गए न। मेरे बारे में बता रहे हैं कि मैं कहीं भी कपड़े उतारने लगता हूं। ये बात इन्होने सच लिखी मैं कहीं भी किसी के भी कपड़े उतारने लगता हूं लेकिन शर्त ये है कि वो पक्का पाखंडी होना चाहिए। ज्यादा बड़े हरामियों से २० रुपए जैसा शुल्क भी नहीं लेता उन्हें कहीं भी नंगा कर देता हूं चाहे वह किसी भी जगह पर सुअरपन कर रहे हों खार हो चौपाटी हो या उनका मौहल्ला हो या उनका घर , एक बात और जो सुरेश चिपलूणकर को पता नहीं है कि कपड़े उतारने के बाद नंगा करके भी भड़ासियों को संतोष नहीं होता तो उन हरामियों की चमड़ी भी उतार कर देखते हैं कि इन सुअरों की शराफ़त की खाल का खोल कितना मोटा है।
राजसिंह ने जिस तरह सम्मान से इस टिप्पणी को सजा रखा है उससे पता चलता है कि सुरेश चिपलूणकर उसे जो समझा रहा है वो भी उसी जमात का है जिसे कपड़े उतरवा कर प्रदर्शन करने का शौक है तो जैसा कि सुरेश ने तुम्हे बताया न कि मुझे कपडे़ उतारना अच्छा लगता है और जैसे सुरेश के उतारे थे जब वह, गिरीश बिल्लौरे और आशीष महर्षि वगैरह भड़ास से दुम दबा कर भागे थे ; तब ही अगर अपने जैसा बना पाता तो आज उसे ये दिन न देखने पड़ते।
अबे फटहे, शब्द प्रपंची! चिरकुट !! बौद्धिकता का जो तू गोबर हग कर सोचता है कि शराफ़त का खोल ओढ़े बैठा रहेगा और लोग तेरे नंगेपन को देख न पाएंगे तो देख अब मुझ पैदायशी नंगे बंदे के कपड़े उतारने की पसंद........ कैसे तुझे नंगा करके कपड़ों के साथ खाल उतारता हूं। राजसिंह! बेल्हामाई का पानी और प्रतापगढ़ की मिट्टी का लोहा मेरे खून में सफ़ेद रक्तकण बढ़ने नहीं देते। मेरा नाम: डा.रूपेश श्रीवास्तव, मेरा काम: कपड़े उतारना(भड़ास पर उनके जो शराफ़त का मुखौटा लगा कर "राम-रहीम" की आड़ में अपने कुकर्मों की दुर्गंध छिपा रहे हैं) , जिला-प्रतापगढ़, तहसील-पट्टी,पोस्ट-मुजाही बाजार, ग्राम-भुसहर। ध्यान रहे कि भड़ास हमारे लिये वेबपेज नहीं जीवन शैली है हम इसे आफ़लाइन भी जीते हैं। जिसे आजमाना हो तो जरूर बताए और सामने आए ताकि पता चले कि किसमें कितनी नंगई है और कौन मादरजात कपड़े पहन कर पैदा हुआ था।
जय जय भड़ास

9 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

यह टिप्पणी NAME/URL विकल्प का प्रयोग करके प्रकाशित की गई है, इसमें सुरेश चिपलूनकर के ब्लॉगर एकाउंट का प्रयोग नहीं हुआ है. किसी ने मज़े लेने के लिए उनके नाम से गाली-गलौच कर दी, और आप भड़कावे में आ गए.

उदहारण के तौर पर मैं यह टिप्पणी डॉ. रुपेश श्रीवास्तव के नाम से दे रहा हूँ.

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ऐसे ही भड़क जाना समझदारी नहीं है, पहले जाँच लेना चाहिए की कमेन्ट जेन्विन ब्लॉगर एकाउंट से किया भी गया है या नहीं.

अजय मोहन ने कहा…

एक और मुखौटाधारी आया अपने कपड़े उतरवाने। ये साले छछंदी चूतिये लोग अपने आप को शराफ़त का ठेकेदार बताकर कुछ भी हगते-मूतते रहते हैं और शब्दों से लीपापोती करते हैं ये है इनका चरित्र। लेकिन मुझे पता नहीं क्यों लग रहा है कि ये बात शायद सुरेश चिपलूणकर ने नहीं लिखी है क्योंकि वो आपको जानता है कि आप भड़ास पर तब से हैं जब अपने पिछले जन्म में भड़ास यशवंत सिंह नाम के ठठेरे से जुड़ा था और एक बार तेज हवा चलने पर ये वहां से भाग गया था। ये शायद हो सकता है कि किसी का वैसा ही तकनीकी सुअरपन हो जैसा कि प्रकाश बादल वाले प्रकरण में हुआ था इस के कंधे पर हो सकता है किसी दूसरे हराम के जने ने बंदूक चलाई हो। राजसिंह टिप्पणी सजाए बैठा है तो उसे तो पेलना जरूरी हो जाता है वरना लोग सोचेंगे कि हमने होली की परंपरा छोड़ दी जिसमें यदि हमारे ऊपर कोई एक छीटा उछाले तो हम सब भड़ासी गू की हंड़िया ले कर खुशी-खुशी दौड़ पड़ते हैं जब तक उसका मन नहीं भर जाता। देखिये आगे क्या होता है प्रकाश बादल ने तो आपको बताया था कि वो सी-बाक्स में उनके नाम से किसी षडयंत्रकारी ने लिखा था ताकि आप सब आपस में भिड़ जाएं। हिंदी ब्लागरों में कमीनों की कमी नहीं है। लेकिन हम हैं कमीने तो इस नीच पन को छिपाएंगे नहीं......
जय जय भड़ास

Badshah Basit ने कहा…

किसी के भी नाम से ऐसा कर पाना तकनीकी हिसाब से कुछ मुश्किल नहीं है,ये पक्का किसी की बदमाशी है। आप बताएं कि सर्च इंजन पर "राम" शब्द ही आदतन क्यों टाइप करके ढूंढते हैं?
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बासित बच्चा!"राम" वो शब्द है जिसका इस देश के इतिहास से लेकर आज तक सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है तो बस यही देखता रहता हूं कि कौन राम नाम की भैंस दुह कर कितना दूध निकाल रहा है किसका क्या पाखंड चल रहा है। मेरे इस काम का किसी परंपरागत धार्मिक मान्यता से कोई लेना देना हरगिज नहीं है।
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

गुरुवर,
एक सच को उजागर किया, कई दिनों से व्यस्तता है, ब्लॉग पर आ नहीं पता पोस्ट तो दूर टिपिया भी नहीं पता मगर नेट पर उपलब्ध रहता हूँ और हरदम कोशिश कि ब्लॉग परिवारको जोडूं मगर आपका अनुभव पोस्ट पर टिपण्णी के बहाने कुछ भी कह जाने वालों कि जमात वस्तुतः ये वो लोग हैं जो बहस के बजाय अपनी डफली बजा कर दुम दबा लेते हैं.
जिनका कोई सामजिक सरोकार नहीं, सुन्दर सुन्दर भाषा मगर ह्रदय के अन्दर गंदगी का वो अम्बार कि मानवता को शर्म आये. हम भले ही २० रूपये में बिकते हैं मगर तो क्या वो २० रूपये भी हमारे काम नहीं आते, ये शराफत के चोगे वाले लोग नहीं बिकते क्योंकि दलाल कभी बिकता नहीं बेचता है और समाज की दलाली करने वाले अपने दूकान को कैसे ध्वस्त होता देख सकता है.
आप ने राम को नेट पर तलाशा, बंद कीजिये दोहरे चरित्र वाले मर्यादा पुरुषोत्तम को तलाशना जिसके नाम से भारतीय सभ्यता आज भी कलंकित है, जिन्दगी भर को साथ निभाने, निर्वहन करने कि ईश्वरीय शपथ लेने वाला वो रणछोड़ क्या कभी मर्यादा पुरुषोत्तम हो सकता है?
हाँ हो सकता है चिपलूनकर शरीखे चिरकुटों के लिए.
हम अपनी भड़ास की मुहीम को जारी रखेंगे और ऐसे तमाम दोहरे चरित्र वाले चिरकुट को बेनकाब करते रहेंगे.
जय जय भड़ास

दीनबन्धु ने कहा…

अरे असुरेश चिप्पू! तू राजसिंह के ब्लाग पर जो हग कर आया है और उस छुतहे ने सुअर के गू को वहां सजा रखा है ये बात दोनो के चरित्र को उजागर करती है। मैं जानता हूं कि जो लोग बीस-बीस रुपए में चौपाटी पर कपड़े उतारते हैं उन्हें तुम्हारे जैसे राक्षस ही ऐसी स्थिति तक लाते हैं। डा.रूपेश के बारे में जो तूने कहा है उससे पता चलता है कि तेरे मुंह के छेद से लेकर पीछे के छेद तक कैसी गरम मसाले क फैक्टरी खुल गयी है,अंगार लग गया है। हम लोग बकरचुद्दई में यकीन नहीं रखते भड़ास हमारी जीवन शैली है अगर सचमुच भड़ास देखना है तो देख जैसे तूने लिखा है कि ये आदमी कहीं भी कपड़े उतार देता है वैसे मैं भी कहीं भी कपड़े उतार देता हूं तेरी जमात के लोगों के..... तुम्हें नंगा करके खाल खींचना ही भड़ास का मिशन है। सच तो ये है कि यशवंत सिंह,संजय सेन सागर,राजसिंह या फिर तुझ जैसा कोई रंगा सियार एक सोच हैं जिनके खिलाफ़ हमारी लड़ाई है। हम तुम्हारे पीछे डंडे से लेकर एफ़िल टावर तक डाले रहेंगे जब तक तुम सही न हो जाओ
जय जय भड़ास

RAJ SINH ने कहा…

प्रिय रूपेश भैया ,
जानिके सुखद आनंद भ की तुहूँ अपने बेल्हयि क अह्य .हमरौ पूरा पता भाय जानि ल्या .गाँव , मरुआन . पोस्ट , दान्दुपुर (मुफ्रिद ) . तहसील , रानीगंज ( पहिले पत्तिन रही ) . जिला , प्रतापगढ़ .
न्यूयार्क फेव्योर्क , तोहरी की नाईं मुम्बयुव , कयियौऊँ जगह घूम के रही थ /रहे मुला हमहूँ असली पानी बेल्है क पीये हई .त तोहरी की नाईं थोड बहुत खूनवा वैसने होई .लेकिन भाय अब खून लड़विय म विस्वास नाहीं रक्खित .जनम क सिद्धांत जवन चल थ अपने सब के ( हम ऊहू क नायि मानित ) , तू लाला खून गरम , हम ठाकुर खून ठंढा . सरये बेल्हा वाले हमारी तोहरी दुइनव की वल्दियत प शंका करिहयीं भाय :) . काहे भगल गंवावत अहा .
एकठी टिप्पणी लिखे अही तोहरे बदेय अपने इहाँ . जयिसे अऊर सब छाप देह्या अपने इहाँ ,उहू क छाप द्या
अपने परिवार म . पढी ल्य . पढ़ाई द्या . फिर जवन समझा , समझाई द्या , समझई द्या. जब भाय तोहरे इहाँ बिना समझेयि पूरी बात , लोह्कारा जाथ , त फिर का आयी ?
जय राम जी की !
(जैरमीऊ क मतलब समझाई देह्या नाहीं त केउ कम्यूनल सम्युनल कहि के न दौडाई लेयि )

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

जाति पाति धर्म कूल मूल से ऊपर उठिए राज बाबु, आपकी अंग्रेजियत हमारे भारतीयता पर चोट कर रही है, हमारी मानवता के शर्मिन्दा ना करिए.
इसी मुखौटे के हटाने के लिए तो भड़ास है एक मुहीम है.
जय जय भड़ास

RAJ SINH ने कहा…

rajneesh jee ek bar fir meree tippanee padh jayiye . agar uska vahee arth nikal aap mujhe brand karna chah rahe hon jo aap kar rahe hain to bat aur hai varana vaheen saaf saaf likha hai ki ' ham uhoo ka naheen manit ' matalab ki jis mittee ka garv kar rahe hain rupesh unakee soch ( belha ke bahutans kee, yahee jaativadee soch abhee bhee hai , usake oopar vyang hai )

main yah naheen manata ki aap sab me bhasha ka itana gyan naheen hai ki itanee seedhee bat samajh saken . kyaa manoon ki jaanboojhkar , sandarbh rahit karke aap ko kuch sabit karna hai to kar ke chodenge .
in halat me koyee saarthak sanvaad naheen ho sakata aur fir yahee bat hai to main prayas bhee naheen karoonga .
meree aapko aur roopesh ko sadikchayen !

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