राज सिंह की जांच के अनुसार सुरेश चिपलूणकर ही बीस रुपए वाला भड़वा है

बुधवार, 17 जून 2009


राज सिंह महाराज, मेरी पिछली टिप्पणी आपने पता नहीं किस पूर्वाग्रह से नहीं छापी लेकिन दूसरी टिप्पणी के उत्तर में आपने लिखा कि भड़ास पर माडरेशन करके आपकी पोस्ट नहीं छापी ऐसा मुझे डा.रूपेश ने बताया है, जरा प्रमाण भेज दीजिये कि आपने भड़ास को कोई पोस्ट भेजी थी अवश्य बिना किसी संपादन के प्रकाशित करवा दूंगा। यदि संभव हो तो रिपोटा-रपाटी करें ताकि इसी बहाने अमरीका जाने का मौका तो मिले भले ही गोरे हथकड़ी लगा कर लतियाते हुए ले जाएं। विमर्श से हट कर खुद को जो साबित करने का पाखंड कर रहे हैं अगर सचमुच साहस है तो ड्रामा बंद करके सामने आइये क्योंकि भड़ास वह लोकतांत्रिक मंच है जहां माडरेटर पर मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए माफ़िया डान दाउद इब्राहिम से पैसे प्राप्त होने के आरोप लगाकर लिखी पोस्ट को भी प्रकाशित करने की ईमानदारी रखता है। बिलबिला कर इसको उसको गरिया कर अपनी चमड़ी बचा रहे हैं बस ज्यादा कुछ नहीं। रही बात नंगई की तो इस प्रकरण से क्या हम तो मां के पेट से ही नंगे पैदा हुए थे और आप जैसे शरीफ़ न बन पाए इसलिये अब तक पाखंड के सुंदर कपड़े आचरण पर न चढ़ा पाए। भड़ास पर टिप्पणी करने वाले यदि समीक्षक हों तो स्वागत रहता है, आलोचक हो तो स्वागत रहता है, निंदक है तो भी स्वागत रहा है। भड़ास के दर्शन को आत्मसात करने के लिये अभी आपमें बहुत सरलता आना शेष है। प्रतीक्षा रहेगी। तुम्हारी जानकारी के लिये तुम्हारी करतूत का फोटो डाल रहे हैं जो हमारे किसी तकनीकी शुभेच्छु जानकार ने टिप्पणी के रूप में भेजी है, दीदे फाड़ कर देख लो।

ब्लॉगर अजय मोहन ने कहा… मेरी टिप्पणी प्रकाशित कर देने से तुम्हारा शराफ़त अली वाला मुखौटा उतरने लगता क्योंकि हरकीरत के बारे में बुरा नहीं सुन सकते और डा.रूपेश को बुरा लिख सकते हो सुरेश चिपलूनकर का नकाब लगा कर वाकई पक्के पाखंडी हो। तुम्हारे जैसे ठरकी लोगों का असली डरावना चेहरा जनता के सामने लाने के लिये भड़ास बिलकुल सही कार्य कर रहा है। एक पैर केले के छिलके पर और दूसरा...... और शब्दप्रपंच करके अभी तक बस चंद बाइयों से वाहवाही ही हासिल हुई है। जब बीमार पड़ो तो मेरी बात याद करना शायद कुछ ईमानदार हो सको। June 16, 2009 11:13 PM
ब्लॉगर RAJ SINH ने कहा… . अजय मोहन जी आपके आरोप गलत भले हों गंभीर हैं . यानी सुरेश चिपलूनकर बन मैं ही उनके नाम से टिप्पणी दे आया ?मैं आपको या किसी को भी हक दे रहा हूँ और सहयोग की गारंटी भी . वह सब कुछ वैसे ही है अब तक . पता लगाते हैं की कहाँ से आया . किसने भेजा . उसका मुखौटा भी सामने आये . क्या चिपलूनकर जी ने कहा की उन्होंने नहीं भेजा है?मेरी जाँच में तो उन्हीके यहाँ से आया है .आप लोग निश्चय ही कोई कुत्सित उद्देस न ले , शाब्दिक दुराग्रह और घमंड छोड़ . छुद्र से छुद्र शब्दावली में अपना कुतर्क न रख गंभीरता से पता लगायें तो मैं कृतार्थ हूँगा बताइए कैसे साबित हो आपका ही तरीका और नियम लागू हो .ब्लॉग्गिंग जगत में तमाम ऐसे लोग हैं जो सक्चम हैं .उन्हें बुलाईये या आई पी प्रोविडर . क्या मानेंगे . लेकिन आप लोग धूर्तता की हद तक कुटिलता रखते हैं . वह तो बिना पढ़े जाने हुआन हुआन मचा रहे हो तभी से समझ गया . आमंत्रण देने के बाद भी मेरी इस बाबत पोस्ट ' भड़ास ' पर नहीं छापी , मोदेरेसन से रोक दी . आपका कुत्सित उद्देस उजागर है .मैं उन कायरों में नहीं जो नकाब लगा दूसरे का कंधे पर बन्दूक रख करून , इस तरह की ओछी और कायराना हरकत हमारे जैसे लोग नहीं करते . पाखंडी भी कायर होते हैं . मुझे कभी होने की जरूरत नहीं पडी .और भारत की नहीं जानता , यहाँ अमेरिकी कानून से यः अपराध करने वाला जेल से नहीं बच सकता .मेरा यः स्टार नहीं की आप जैसे खिसियाये हारों की तरह कायराना श्राप पढें . लोगों पर .आप केले के छिलके बिछाएं बिना बीमार पड़े परेड करवा दूंगा . मेरी इमानदारी को माप पाने की छमता पैदा करो पहले . आपकी बेईमानियाँ बिखरी पडी है . इसी प्रकरण से सिर्फ आप नंगे निकालोगे जिकी शर्म ही नहीं तुम्हें .तो ठीक है लो चैलेन्ज उठाओ बीडा सच्चाई जानने का . तब तक सब यथास्थान ही है . आल ड बेस्ट !!
प्यारे सिंह(जो भारत से जाकर गोरों को अपना सर्कस दिखा रहे हो और बातें भारत की करते हो, मेरी नजर में तुम सर्कस के शेर जैसे सिंह हो) तुम्हारी शुभकामनाएं जता कर एक बार फिर तुम वही पाखंड कर रहे हो जिसकी हम सब बत्ती बना रहे हैं। क्षुद्र हम, तुच्छ हम, बुरे हम, नीच हम, ओछे हम, कायर हम और तुम????? पाखंडी! सच्चाई की बात करते हो वो भी चैलेन्ज देकर, हमारी बेईमानियों की फ़ेहरिस्त बना कर भेज तो दो जरा जो तुम जैसे टोडियों के पिट्ठुओं को दिख रही हैं तुम वाकई भारत की समझ रखते ही नहीं हो बस ढोंग रचाए बैठे हो तुम्हारी तो भाषा भी गोरे टोडियों जैसी हो चली है। सियार और लोमड़ तो तुम हो हम तो कुत्ते हैं हुंआ-हुंआ नहीं करते भौंकते हैं और काट भी लेते हैं , टोडी पिट्ठू! याद है न तुम्हे बचपन जब गांव में सियार या लोमड़ आ जाता था तो कुत्ते उसका का हाल बनाते थे.......
इस पाखंडी को ललकारती डा. श्रीवास्तव की पिछली पोस्ट पढ़ें
जय जय भड़ास

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