लो क सं घ र्ष !: क्रय कर ली अभिलाषाएं...

शुक्रवार, 12 जून 2009


मधु के ग्राहक बहुत मिले ,
क्रय कर ली अभिलाषाएं।
अब मोल चुका कर रोती
कुचली अतृप्त आशाएं ॥

अव्यक्त कथा कुछ ऐसी,
आँचल में सोई रहती।
हसने की अभिलाषा में,
आंसू में भीगी रहती ॥

मेरे दृगमबू सुमनों पर,
तुहिन कणों से बिखरे है
स्नेहिल सपनो के रंग में,
पोषित होकर संवरे है ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

1 टिप्पणियाँ:

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

डॉ.राही की राह हमें तो जम रही है,सुमन भाई को धन्यवाद।
जय जय भड़ास

प्रकाशित सभी सामग्री के विषय में किसी भी कार्यवाही हेतु संचालक का सीधा उत्तरदायित्त्व नही है अपितु लेखक उत्तरदायी है। आलेख की विषयवस्तु से संचालक की सहमति/सम्मति अनिवार्य नहीं है। कोई भी अश्लील, अनैतिक, असामाजिक,राष्ट्रविरोधी तथा असंवैधानिक सामग्री यदि प्रकाशित करी जाती है तो वह प्रकाशन के 24 घंटे के भीतर हटा दी जाएगी व लेखक सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी। यदि आगंतुक कोई आपत्तिजनक सामग्री पाते हैं तो तत्काल संचालक को सूचित करें - rajneesh.newmedia@gmail.com अथवा आप हमें ऊपर दिए गये ब्लॉग के पते bharhaas.bhadas@blogger.com पर भी ई-मेल कर सकते हैं।
eXTReMe Tracker

  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

Back to TOP