Matter for Bhadas

रविवार, 21 जून 2009



TITLE:-  अनोप मण्डल के सत्य की फाइलो के बण्डलो में जो भी जिनवंश फस गया वह तडफ तडफ कर मरता है---  जवाब चौथा
 
जैनवंश के मुह से राम, कृष्ण ईश्वर परमेश्वर का नाम कभी नही सुनने मे आता| जैन वंश के मुह से देश राष्ट्रवाद, जमीन माता, मानव समाज का भला, वनस्पति का भला, पशु पक्षियों का भला ऐसी न्याय की बात नही सुनेंगे| हाँ यह जरूर सुनेंगे व्यापार कैसा है फायदा होना चाहिये व्यापार का अर्थ ही फायदा होना चाहियें, अन्यथा व्यापार करने का क्या फायदा| हाँ इन्वेस्टमेन्ट किया है ब्याज भी छुटना चाहिए, नौकरो का पगार भी छुटना चाहिए, जगह का भाडा भी छुटना चाहिए, मुनाफा भी रहना चाहिये, माल भी सस्ता मिलना चाहिये, ग्राहक अच्छा ऊँचा भाव देने वाले चाहियें| सरकार को टैक्स नही भर सकते? बिल में माल बेच नही सकते है| बिल मे माल बेचकर सरकार की झंजट कोन पालें, ग्राहक को पहले ही बोल देते है बिल नही मिलेगा| बिल चाहिये तो 10% अधिक भाव लगेगा - यानी कि सरकार को भी लुटना व बिल के नाम से ग्राहक को भी लुटना इत्यादि| पूरा दिन धन्धा करके शाम को रू. 5,000/-, रू. 10,000/-, रू. 1,00,000/-, रू. 5,00,000/-, मुनाफा कमायेंगे| वैसे इनका पेट बहुत बडा है दिन के करोडो कमावे तो भी शांती नही होती है| और कहेंगे महँगीवाडा बहुत बढ गया है धंधा करना परवडता ही नही है मजबुरी से धन्धा करते है, आदमी लोग पगार ज्यादा माँग रहे है, आदमी लोग ठीक से काम नही कर रहे है| एक दो ही वर्षो मे बिजनस लाइन बदली कर देंगे| बहाने भी इनके पास कई तरह के है जैसे इस लाईन में माथा फोडी बहुत ज्यादा है इत्यादि इत्यादि| पहले से ही दुकान के बहार बोर्ड बनाकर लिख देते है कि माल उधार नही मिलेगा ( फक्त इतना नही लिखते कि ग्राहक चोर है बाकी व्यवहारिक्ता मे सब कुछ कर दिखाते है)| हाँ इनको नाम प्रचार करने की खुब खुरापाती है पुलिस चौकी बनवायेंगे नाम खुद का लिखवायेंगे जीवनभर पुलिस चौकी को दबाव मे रखकर हर गलत काम करके भी पुलिस की सुरक्षा इनको मिल जाती है| रेल्वे स्टेशन पर जैनवंश के नाम वाले प्याऊ बनवाएँगे वहा पानी नाम की बुँद नही रहेगी- बदले मे सभी रेल्वे केटर्स खुद के नाम पर ऐलोट करवा देते है| मारवाड, जोधपुर, अजमेर, अहमदाबाद, बम्बई की गाडियों मे तो इनका इतना आतंक है कि कुछ कही न जायें 40% से 50% हर मौसम में जैनवंश के रिजर्वेशन कायम रहेंगे| पैसा इनके पास बहुत है मौजमस्ती करने घर से बाहर घुमने के बहाने ग्रूप में हमेशा निकलने का| हाथ गाडी भर जाए इतने डिब्बो में खाना खुब भर भर कर तरह तरह के पकवान बनाकर चार पाँच दिनो कि व्यवस्था करते है| अपने मानव वंश के मुसाफिरों के सामने बैठकर धनवानता का प्रमाण देते हुए सब मिलकर हाथ के उपर हाथ डाले खाना निकालकर खाते है वही हाथ फिर उसी डब्बे या थाली मे डालकर खाते है पुरा खाना झुठा हो जाता है| औरत आदमी का कोई खाने मे परहेज नही रहता कौन किस परिवार से कोई फर्क नही पडता खाने का खुब आनंद लेते है, मानवता जाती की अस्मिता की धुआ निकालते है, दुसरे मुसाफिरो को तो ऐसा व्यवहार देख लज्जा लगना शुरू हो जाती है| उपर से गरीब इन्सानो को झुठा किया हुआ खाना आफर करते है तथा बडी आवाज में बोलते है खाओ खाओ घर का देशी खाना है, घी का बनाया हुआ है शरमाओं मत| मानो मानव जाती के घर में खाना कभी बनता ही न हो| ऐसी हलकी हरकत करते है तथा बेवकुफो की तरह हँसते हँसते खाते जाते है किसीकी कुछ परवाह या खयाल रखना उनके विषय के बहार की बात है| उलटा साधारण मुसाफिरों की तो बेचारो की हेराफेरी शुरू हो जाती है कहेंगे कि "हमारे साथ लेडिज है आप वहा चले जाईये न! हमारे साथ सामान बहुत है आप वहा उस सीट पर चले जाइये न"! इत्यादि इत्यादि| आजकल राजस्थान में तथा कई भी रेल्वे स्टेशनो पर अपनी धनवानता दिखाकर बेंचे बनाकर बडे अक्षरो में मार्बल से ईनके नाम लिखाकर रेल्वे प्लेट फोरम पर रखते है तथा मानव जाती को हिन भावना से देखते है और उन बेँचो पर बैठे हुए मुसाफिरो को खडा कर देते है कि पहला हक उनपर बैठने का जिनवंश का है|

रल्वे मुसाफिरी में तो जैनवंश का-- जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बहुत माथा फोडी हो गयी|

जब जहा देखो इसी अक्षर कि गुहार लगाते रहते है पता नही इसका अर्थ भी यही लोग जाने| उपर से दुसरे भोले मुसाफिरों को भी यही अक्षर बोलने की प्रेरणा देते है जो कि एक गलत बात है, ईश्वर, परमात्मा, मालिक, खुदा, माताजी, परवरदिगार इत्यादि इत्यादि नाम नही लेते है| आजकल जिनवंश का प्रचार करने के लिये पूरे हिंदुस्तान के रेस्टारेन्ट मे, रेल्वे केटर्स व होटलो में जैन वंश का मैनु खासकर अलग बनवाया गया है जिसमे खासकर जब जिनवंश होटल मे प्रवेश लेते है तब बडी आवाज में वेटर से कनफर्म करवायेंगे- जैन डोसा, जैन पाव, जैन दाबेली, जैन पुरी भाजी, जैन भेलपुरी, जैन चटनी, जैन रोटी, जैन काँदा, जैन धनियाँ, जैन चावल, जैन खाना है या नही- ताकी ग्राहक के हिसाब में बेचारा हर होटल वाला पहले ही तैयार होकर रहता है तथा मेनु की प्रिंटिंग मे ही यह सब चिजे जोड दि गयी है उसमे जिनवंश को आनंद आता है यह इनका असली आतंकवाद है जिसे दुनिया समझ नही पा रही है| यह बात लगती है बहुत बारिक, लेकिन इसका निष्कर्ष बहुत भयंकर है| विलायत के लोगो को ये वंश दिखाना चाहता है कि वे हिंदुस्तान के असली राजा है| उनके लिये हर व्यवस्था हिंदुस्तान मे अलग से बनवाई जाती है|

पूरे हिंदुस्तान के बडे बडे अस्पताल के आजुबाजु मे 70 से 80% केमिस्ट जैन वंश के रहेंगे, आप सर्वे करके तसल्ली कर सकते है- जहाँ पर जैनी नकली दवा बेचते है, तारीख बिती हुई दवा जोकी फेकनी होती है उसे गरीब लोगो को बेचते है तथा साधारण गुणवत्ता वाली (जेनेरिक) दवाई बेचकर ब्रांडेड का भाव लेते है इस तरह गरीबों का खुन यह जिनवंश पिता है तथा उनको बिमारी से व गरीबी से बहार नही आने देते है यह जिनवंश कि अहिंसा है| डाक्टरो को भी जिनवंश ने धन के लोभ में डालकर उनका इमान खत्म कर दिया है| डाक्टर केमिस्ट कि पेड खुद के पास रखते है तथा मरिज को दवाईयाँ उसी पेड पर लिखकर कहते है कि इसी केमिस्ट से दवाई खरिदना अच्छी मिलती है| इस तरह मरिज के साथ धोखा होता रहता है मरिज मरे या जिंदा रहे या दुरूस्त हो डाक्टर कि कोई जिम्मेदारी नही होती तथा न ही डाक्टर को उसकी परवाह रहती है बस उनका ध्यान तो इस बात पर ज्यादा रहता है कि केमिस्ट महिने के अंत मे इनकी दि गयी पेड के आधार पर बिकी दवाईयों पर कमिशन कितना बनता है तथा कब भुगतान आवे| यह सत्य बात है ईसे कोई मजाक नही समझे, यही जैनवंश की खरी अहिंसा है|

गाँधीजी की अहिंसा..... तीन वीर सपुत भगत सिँह, राजगुरू, सुखदेव---- पंडित मदन मोहन मालविया सहित अनेक काँग्रेसी नेताओ ने फाँसी की सजा के विरूध्द आवाज उठाई किन्तु गाँधीजी चुप्पी साधे रहे| राष्ट्रिय संग्रहालय मे रखे दस्तावेजो मे तत्कालिन वायसराय लार्ड इर्विन और गाँधीजी भेट का विवरण उप्लब्ध है जिसमे लार्ड इर्विन ने साफ शब्दो मे लिखा है कि गाँधीजी ने भगत सिँह, सुखदेव, और राजगुरू की फाँसी की सजा समाप्त करने का कोई प्रयास नही किया या नही पैरवी की| उनकी फाँसी से मात्र 3 दिन पुर्व 20 मार्च 1931 को गाँधीजी गृह सचिव हर्बट इमरसन से मिले थे| इस भेट के बारे मे हर्बट इमरसनने अपनी डायरी मे लिखा है "मिस्टर गाँधी की इस मामले (भगत सिँह और साथियों की फाँसी की सजा) मे अधिक दिलचस्पी नही मालुम हुई| मैने उनसे कहा था कि यदि फाँसी के फलस्वरूप अव्यवस्था न हुई तो बडी बात होगी| इस पर उन्होने अपनी स्विकृति दे दी और कहाँ जो कुछ भी हो सकेगा मै करूँगा यदि गाँधीजी भगत सिँह व उनके साथियों की सजाए मौत को रद्द करने कि माँग गाँधी-इर्विन समझौते मे शामिल करने पर अड जाते तो फाँसी टल सकती थी पर गाँधीजी की नेतागिरी के खतरा बनचुके क्रांतिकारियों को जिंदा रखने मे गाँधीजी को कोई दिलचस्पी नही थी| 

 

गाँधीजी के जीवन से जुडे दो लज्जाजनक प्रकरण तथा उनकी अहिंसा| 

continue this matter with attachment page number wise i.e  scanned pg.1, scanned pg.7 then continue with 3 to 6.

अमीत जैन--  अनोप मण्डल तीन जवाब भडास पर लिख चुका है, यह चौथा जवाब है| अब आप सब बात समझ चुके है उसकें लिये खुब खुब धन्यवाद| आपकी अहिंसा भी आप समझ चुके है| तथा मानव वंश से हटकर काम करने वाला राक्षस भी आप अच्छी तरह समझ चुके है|

अमीत जैन थोडी धिरज रखिये, अनोप मण्डल विश्व की हर समस्या का जवाब (उसमे जिनवंश भी सम्मिलित है) एक एक करके देता रहेगा और आप अपनी तडफ को तसल्ली देकर शांत रखिएगा--  धन्यवाद

हम आपकी व्यवसाय शिक्षा के बारे मे भी जानना चाहेंगे| क्या आप संपुर्ण जैनवंश का प्रतिनिधित्व कर रहे है या भुले भटके?

खुलासा किजिए|

जय नकलंक देव, जय अनोप मण्डल, जय भडास|

अनोप मण्डल के सत्य की फाइलो के बण्डलो में जो भी जिनवंश फस गया वह तडफ तडफ कर मरता है---  जवाब चौथा


 

4 टिप्पणियाँ:

arvind ने कहा…

अबे यार तुमने पका दिया , सारे लोग तुम लोगो से जो सवाल पुछ रहे है उस का तो तुमने जवाब ही नहीं दिया
आप इस बात का स्पष्टीकरण अवश्य करें कि आपने जिन शब्दों के आपत्तिजनक अर्थ बताए हैं उनका आधार कौन सा शब्दकोश है और किसने लिखा व कहां से प्रकाशित हुआ है। यदि आपके अनुसार जैन फेरबदल करवाने में माहिर हैं और शब्दकोशों के शब्दों में हेराफेरी कर देते हैं तो इस बारे में ठोस प्रमाण भड़ास के मंच पर लाइये

anop ने कहा…

बालक अभी पके नहीं हो तुम एकदम कच्चे हो इसलिये ऐसी बात कर रहे हो। तुम शब्दकोशों के प्रमाण की बात करते हो अभी तो भड़ास पर ये शुरूआत की शुरूआत है इतने प्रमाण डेढ़ सौ सालों की लड़ाई में जुटा लिये हैं कि तुम उन्हें देखते- समझते बुढ़ा जाओगे। धीरज रखो बच्चे!हम खूब जानते हैं कि हमने जो लड़ाई शुरू करी है अगर बिना सबूत,साक्ष्य प्रमाण के करी तो हमें भी कानून का डंडा घुसा दिया जाएगा तो जो बिना सबूत के अगर हम लिखेंगे तो सबसे पहले तो मानहानि का दावा बनता है हम पर ठोक देना चाहिए। और जो बस कोरी बकवास करी तो चार दिन बाद खुद ही अपनी हंसी करा कर इज्जत की भद्द करा लेंगे, है न सत्य? जो बात करी जाएगी उसका हवाला देकर लिखा जाएगा आपका दोष नहीं है इनके षडयंत्र की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आप जैसे मासूम लोगों का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है। प्रतीक्षा करिये जरा सी.....
जय जय भड़ास
जय नकलंक

ARVI'nd ने कहा…

तुम्हारी बातो से लगता है की एक दम ही बेशरम आदमी हो जो किसी धर्म को ,या परसिद्ध आदमी को गाली दे कर अपना नाम करना चाहते हो , जैसे मायावती अपना वोट बैंक बचाने के लिए रास्त्र पिता को बुरा भला कह रही है , उसी तरह तुम भी बिना सर पैर की बात कर के जैन धर्म की बुराई कर रहे हो जबकि तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है , मैंने जानना चाह तो मै बच्चा हो गया , जिसे समझने मे बुढापा आ जायेगा / तुम लोग ढोगी हो जो सब लोगो का बेव्खुफ़ बना रहे हो / जो बोले वो तुम्हारे लिए दुश्मन है , raksah है ,महावीर सेमलानी को तुम अमित का हिमायती बताते हो , तुम भी तो बताओ की तुम लोगो का क्या काम धंधा है , क्या करते हो , क्यों तुम्हारे phiswade मे किसी दुसरे का काम देख कर आग लगती है , तुम ने कोण सा देश आजाद कराया है , किसी हत्यारे की तथाखाथित किताब को दिखा कर क्या साबित करना चाहते हो ?

ARVI'nd ने कहा…

जरा इन बातो के भी जवाब दो

ये ॐकारजी क्या है ,
कहा से आया ,
कब आया ,
कोई प्रमाण ,
कोई तस्वीर ,
कोई कोई धरम ,
इन की कोई स्त्री भी थी या इन्होने केचुए की तरह नर और मादा दोनों थे ,
कब हुए ,
आप इन से कब कहा मिले ,
कोई और भी वहा था क्या ,
सारे लोगो को इन्होने जनम दिया --- तो इन का प्रसव किस ने कराया ,
उस दाई का नाम बताओ ,
अगर कोई उस प्रसव की तस्वीर हो तो उस को भी सबूत के तौर पर लावो यदि ॐकारजी सिर्फ़ बाप थे और तुम उन के बीज से पैदा हो तो तुम्हारी माँ कोन थी ,
उस का नाम पता ,
उस की शादी कुब हुई थी ,
हुई भी थी की नही ,
या बिना शादी की औलाद हो , ?????????????????????
सब बताओ ,
ॐकारजी

अब मुझे बच्चा मत कहना

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