लो क सं घ र्ष !: कितना सूना जीवन-पथ है ...

रविवार, 20 सितंबर 2009



तुम बिन लगता जग ही निरर्थ है।
कितना सूना जीवन-पथ है।
ये सूनी -सूनी राहें, कितनी कंटकमय लगती।
ये काली-काली रातें, काली नागिन सी डंसती॥
विह्वल मन कर रहा अनर्थ है ।
कितना सूना जीवन पथ है।
बात निहार थकी ये आँखें , आशाओं के दीप जलाये।
कितने निष्ठुर निर्मम ,निर्दय, सपनो में भी तुम न आए ॥
विरह व्यथित ह्रदय की कथा अकथ है
कितना सूना जीवन-पथ है॥
जब भी याद तुम्हारी आई नयनो में आंसू भर आए ।
अंतर्मन की व्यथा सदा ही हम अन्तर में रहे ॥
असहाय वेदना रोक रही साँसों का रथ है।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
तुम क्या जानोगे प्रिय ! कैसे पल-पल बरसो सम बीते ।
मधुर मिलन की आशा में, मरके भी रहे हम जीते॥
आंखों में आ बस जाओ यही मनोरथ है ।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
कितना कठोर है यह विछोह विष, प्रियवर हँस कर पीना ।
कैसे जियें बताओ अब मुश्किल है जीना ॥
जैसे सम्भव नही , शब्द के बिना अर्थ है।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
खग कुल का यह कलरव , संध्या की सुमधुर बेला ।
सुरभि-पवन की मंद चल, मौसम अलबेला॥
सब कुछ तुम बिन लग रहा व्यर्थ है।
कितना सूना जीवन -पथ है ॥
रूठोगे न कभी ,कहा था, फिर मुझसे क्यों बिलग हो गए।
दुनिया के इस भीड़ में प्रिय! न जाने तुम कहाँ खो गए॥
मेरे मन के मीत बता दो तुमको कोटि शपथ है।
कितना सूना जीवन पथ है ॥

मोहम्मद जमील शास्त्री

1 टिप्पणियाँ:

kanchan ने कहा…

कितना दर्द है !

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