बीच बाजारी इन नैनन से

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

एक दिन सपने में खोया हुआ था। सपने में बस यूं ही सुबह के वक्त टहलने निकला तो सोचा कि चलो कुछ वर्जिस हो जायेगी और बाजार का हाल समाचार भी मिल जायेगा। कॉलोनी से कुछ ही दूर आया था कि किराने की दुकान पर मक्खी मार रहे दुकानदार को देखकर चौंक गया। यह वही दुकानदार है, जिसके यहां ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। दुआ-सलाम तो दूर, नजर उठाकर देखता भी नहीं था पट्ïठा! आज दूर से ही चिल्ला उठा राम-राम बाबूजी। मैंने सोचा चलो भाई कम से कम सद्ïबुद्धि तो आयी। पास जाकर मैंने पंसारी से पूछा कहो कैसे हो? पंसारी बोला-ठीक ही हूं बाबूजी, बस आप लोगों की बदौलत जिंदा हूं। मैं गहरे आश्चर्य में पड़ गया कि भाई इसको क्या हो गया है। मैंने फिर उससे पूछा कोई परेशानी तो नहीं है? इस बार शायद दुकानदार की दुखती रग पर हाथ धर दिया था। बेचारा दबी जबान में बोलने लगा- क्या बतायें बाबूजी मंहगाई इतनी बढ़ गयी है कि सारा धंधा ही चौपट होने की कगार पर पहुंच चुका है। देखिये न मेरी हालत कहां एक समय मुझे मक्खी मारने तक की फुर्सत नहीं थी, कहां आज पूरा का पूरा दिन मक्खियां मारते ही बीत रहा है। मैंने उसे ढांढस बंधाया और कहा कि-घबराओ मत बस कुछ दिनों की ही बात है, यह दौर भी गुजर जायेगा। दुकानदार बोला-आपको पता है बाबूजी अरहर की दाल सौ रुपये किलो हो गयी है और अब वह सोने-चांदी की दुकानों पर ही मिलती है। हमारे यहां तो बस नमक और मसाले ही मिला करेंगे। जब दाल ही खरीदने वाले नहीं रहे तो भला मेरी दाल कैसे गलेगी? बेचारा कहते-कहते रुंआसा हो गया। आश्चर्य से पड़ा मैं, थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा कि अपनी कॉलोनी में जिम चलाने वाला जिम वही बाहर बैठा उंघ रहा था। मैने पूछा कहो भाई क्या हाल है? बड़ी बुरी नजर से मेरी तरफ देखते हुये बोला- क्या बताउं और क्यों बताउं कि मेरा क्या हाल है। जाईये-जाईये हमारी चिंता मत करिये। शायद मेरी बात उसको बुरी लगी थी। लगेगी भी क्यों नहीं, एक समय था जब मुहल्ले के सभी नौजवान सुबह-शाम इसी जिम में अपना शरीर फुलाते-पिचकाते थे। मंहगाई ने यहां भी ताला लगाने का इंतजाम कर दिया है। लोग पेट भर खाने से डरते हैं, तो भला जिम जाने की कौन सोचेगा। दुखी था बेचारा इसलिय चिड़-चिड़ा हो गया था। मन ही मन मैं सोच रहा था कि कुछ ही समय की बात है, जब कॉलोनी के हर चौथे घर में बाकायदा जिम खुलने लगे थे। मानों देश का युवा शरीर सौष्ठïव के दम पर ही आगे जाने की जुगत में है। हर चौराहे पर डब्ल्यू डब्ल्यू एफ के महा पहलवानों की तस्वीरों के नीचे जिम का नाम व पता दिखायी देता था। पर मंहगाई ने सबकी हेकड़ी निकाल दी है। इसी उधेड़बुन में आगे बढ़ता जा रहा कि अचानक मास्टर चिरौंजी लाल से टकरा गया। मास्टर जी थोड़े मायूस दिख रहे थे, राम-राम करने के बाद बोले कि कहिये आपका बेटा कैसा है? मैं तो अवाक्ï रह गया कि भला शादी हुये अभी छ महीने भी नहीं बीते, बेटा कहां से पैदा हो जायेगा। पर मैंने मुस्कुराते हुये जवाब दिया-अरे मास्टर जी कैसी बातें करते हैं आप? सुबह-सुबह भांग-वांग चढ़ा ली है क्या? मास्टर जी संभलते हुये बोले अरे नहीं बेटा ऐसी बात नहीं हैं, मैंने तो बस यूं ही पूछ लिया था। क्या करें अब कोई काम तो रह नहीं गया है, इसलिये दिमाग भी ठीक से काम नहीं कर रहा। मैंने कहा कि क्यों क्या हुआ आप इतने कन्फ्यूज क्यों दिख रहे हैं? मास्टर जी बोले क्या बताउं बेटा, अब तुम ही देखो हर दस कदम पर अंग्रेजी स्कूल खुल गये हैं। दो कमरा बनवाया दो मास्टर रखे और खोल लिया स्कूल! कॉलोनी की दीवारों व सड़कों पर गेरु से पोत डाला कि फलांना अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को दाखिल करवाईये और छूट का लाभ उठाईये। अब भला तुम ही बताओ कि ये स्कूल हैं या सीजनल सेल लगाने वाले दुकानदार। लोगों को भी समझ तो आता नहीं है कि ऐसे स्कूलों में बच्चे अंग्रेजी सीखें या न सीखें आई लव यू कहना जरुर सीख जाते हैं। अंग्रेजी पढ़ाई के नाम पर लोग बच्चों के भविष्य से खेल रहे हैं, इन स्कूलों के बच्चे मोबाइल पर लिखी जाने वाली न जाने कौन सी अंग्रेजी सीख रहे हैं। कभी कभी इनके एसएमएस पढ़कर तुम भी दंग रह जाओगे। मैं सोचने लगा कि भला इन अंग्रेजी स्कूलों से मास्टर जी को क्या तकलीफ ह? जो ये लाल-पीले होते जा रहे हैं। मैंने टोका- मास्टर जी अच्छा ये बताईये कि आपको क्या प्राब्लम है? मास्टर जी बोले- देखो बेटा पहले इस कॉलोनी में मैं अकेला मास्टर हुआ करता था। लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे और ट्ïयूशन के लिये मेरे पास भेजते थे। मैं कम फीस में ही बच्चों को संस्कार व शिक्षा दोनों देता था। सुबह-शाम पूरा का पूरा स्कूल मेरे घर पर लगता था। पर जबसे ये अंग्रेजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं, तबसे मेरा ट्ïयूशन भी कम हो गया है, अब तो इक्के-दुक्के हीं बचे हैं जो मेरे यहां आते हैं, उपर से ये मंहगाई! मेरा तो बुरा हाल है। मास्टर जी की पीड़ा मेरी समझ में आ गयी थी। मैंने भी गली-गली खुल रहे अंग्रेजी स्कूलों को कोसा और आगे बढ़ चला। सामने से शर्मिला आंटी बुझी-बुझी सी चली आ रहीं थी। ये वहीं शर्मिला आंटी हैं, जिन्हें देखकर कॉलानी के बच्चे बुड्ïढे और जवान सभी खुश हो जाते थे। अब आप पूछेंगे कि भला सब कैसे खुश हो जाते थे। तो जान लिजिये, शर्मिला आंटी अपने घर के बाहर वाले कमरे में ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। अब आप समझ गये होंगे कि बुड्ïढ़े और जवान क्यूं खुश हो जाते थे। बच्चों की खुशी का राज यह था कि बच्चों की मम्मियों को पटाने के लिये वे हमेशा अपने पर्स में टॉफी रखती थीं। जैसे ही कोई बच्चा दिखा, फट से उसे टॉफी पकड़ा देती थी। इसी बहाने बच्चे की मां का दिल जीतती थी और उसको सौंदर्य का पाठ पढ़ाकर अपना ग्राहक भी बना लेती थीं। पर आज वे कुछ उदास सी दिख रही थी, खैर मैंने ही कहा नमस्ते आंटी जी कैसी हैं? शर्मिला आंटी बोलीं- सब ठीक है बेटा, बस चल रहा है। मैंने फिर कहा कि आंटी आपका ब्यूटी पार्लर कैसा चल रहा है। आंटी बोलीं चलकर खुद ही देख लो, वैसे भी आजकल वह खाली ही रहता है। मैंने कहा क्यूं? आंटी बोलने लगीं- बड़ा खराब जमाना आ गया है, अब तो हर तीसरे घर में एक ब्यूटी पार्लर खुलने लगा है, ऐसा लगता है कि सौंर्दय की सारी मल्लिकायें यहीं आकर बस गयी हैं। सुनोगे तो आश्चर्य में पड़ जाओगे। पता है? वह काम वाली गंगू बाई भी पार्ट टाईम में ब्यूटी पार्लर चला रही है, वह भी बहुत कम रेट में। उपर से मंदी और मंहगाई ने ऐसा कबाड़ा कर दिया है कि बस पूछो ही मत। लोगों को सबसे सस्ते ब्यूटी पार्लर से काम चलाना पड़ रहा है। ऐसे में गंगूबाई के सिवा हमारा काम तो बंद ही हो गया समझो। शर्मिला आंटी की दु:खभरी दास्तान सुनकर मुझे भी मंहगाई से नफरत सी होने लगी थी, सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेरने वाली और सब माताओं-बहनों को ऐश्वर्या व करीना जैसा सुंदर बना देने का सपना दिखाने वाली शर्मिला आंटी की हालत देखकर मेरा भी मन उदास हो गया। यह सब मैं सपने में देख-सुन रहा था, इसी गुस्से में मैंने जोर से हाथ झटका तो पास में ही रखा पानी का मटका धड़ाम से गिर गया। फिर क्या था, मेरी श्रीमती वहीं पानी मुंह पर मारते हुये बोली 40 रुपये का एक बॉटल पानी आता है और तुमने यूं ही सब बर्बाद कर दिया। उठो और जाकर एक बॉटल पानी ले आओ। और सुनो आज से तुम्हारे पीने के पानी में कटौती होगी। तीन चार दिन तक कम पानी दिया जायेगा ताकि इस गिरे हुये पानी की क्षतिपूर्ति की जा सके। जितना बुरा सपना देख रहा था, उससे बुरी हकीकत देखकर मेरे होश उड़ गये थे। क्या मंहगाई इस कदर हमारी जिंदगी में हावी हो गयी है कि छोटी-छोटी बात पर भी इस मंहगाई का असर होने लगा है। मैं सोचने लगा था कि सपने में दुकानदार, जिम वाला, मास्टर जी और शर्मिला आंटी से ज्यादा परेशान तो मैं ही हूं। बंद आंखों से बाजार की हालत जानने निकला तो आंख खुलते ही अपनी हालत पर ही तरस आने लगी है।
बीच बजारी इन नैनन से सबका दु:ख जो देखा
आख खुली तो भरम ये टूटा, नया सबक था सीखा
नोट - यह व्यंग लेख हिन्दी मासिक पत्रिका वूमेन आन टॉप में प्रकाशित
लेखक - मनोज द्विवेदी

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

बेहतरीन व्यंग है एकदम झक्कास... प्राणलेवा। सच है कि आज समस्याओं का जिक्र बस इसी मार्ग से संभव है।
जय जय भड़ास

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

मनोज भाई मजा आ गया आपके इस व्यंग लेख में। मैंने दो लाइनें देख कर ही जान लिया था कि ये आपका ही लिखा है, बड़ा खास अंदाज है आपका भड़ास निकालने का :)
जय जय भड़ास

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