आलोक तोमर की कलम.......

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ उसी आलोक तोमर की जो कभी जनसत्ता में प्रभाष जोशी का करीबी हुआ करता था, वही अलोक तोमर जिसे बाकायदा प्रभाष जोशी ने लात मार कर बाहर निकला, वही अलोक तोमर जिसने पत्रकारिता को हथियार बना अपने स्वार्थ सिद्धि में पत्रकारिता का बेजा इस्तेमाल करता था परिणाम तिहार की हवा।

आजकल वापस अपने कलम से मानो देश का कलम सिपाही या फ़िर बाजारवाद में अपने धंदे के लिए दलाली और दलाली न दे तो कलम से उसकी बजा दी। मीडिया की ये ही पहचान ने आम लोगों में मीडिया की विश्वसनीयता कम की और इसके लिए प्रभाष जोशी गुर्गों की जमात ने इसमें सबसे अग्रणी भूमिका निभाई।

जरा एक नजर इस तस्वीर पर देखिये.........

अलोक तोमर की खबर के साथ युवराज की फोटो

जी हाँ आज कल अलोक तोमर ने सच बोलने का ठेका ले रखा है, और अपने वेब साईट पर इस सच को जो की सच से ज्यादा उस लेखक की खीझ लगती है जिसका कलम कुंद हो चुका है और जो अपने कलम को बेचने के लिए मारा मारा फ़िर रहा हो मगर खरीदार नही मिलता है।

कभी आलोक तोमर को रजत शर्मा सबसे बार फ्राड और दलाल लगता है तो कभी टी वी के टी आर पी ठगी का धंधा लेकिन इन सबमें जो एक बात निकल कर आती है की आख़िर अलोक तोमर को इनपर खीझ क्यूँ आती है। इस धंदे के पुराने शातिर खिलाड़ी तो आप ही रहे हो महाराज। लिब्राहन आयोग पर मनमोहन को निशाना बनाना और फोटो युवराज सिंह की बातें हित की मगर किसकी।

पत्रकारिता के वो लोग जो अलोक तोमर से मीलों आगे निकल गए जबकि वो छोटे छोटे दलाल थे जब तोमर जी इनमे ख़ास स्थान रखते थे तो खीझ प्रभु चावला पर भी उतरेगी ही लेकिन इन सबसे जो सिर्फ़ एक बात सामने आती है वो ये की प्रभाष जोशी के जितने भी गुर्गे रहे सभी के सभी प्रभाष जी की तरह महत्वाकांक्षी और महत्वाकांक्षा पुरा ना हुआ तो वापस अपने पुराने धंधे पर.....

जय हो

जय जय भड़ास

4 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

अग्नि बेटा! कस कर लो इन जैसों की.... थोड़ी सी से तो इन्हें गुदगुदी महसूस होती होगी ये आखिर बड़े खिलाड़ी जो ठहरे :)
जय जय भड़ास

बेनामी ने कहा…

इस घटिया आदमी के बारे में चर्चा करके आप बेवजह ब्लॉगर्स का समय जाया कर रहे हैं। जो आदमी जीते-जी प्रभाष जोशी को दोस्तों की महफिल में जली-भुनी सुनाकर अपनी एहसानफरामोशी का उदाहरण दिया करता था, वही आदमी उनके मरने के बाद ऐसे जता रहा है कि वही प्रभाष जी की पत्रकारिता का वारिश है। खैर, शराब और शबाब के शौकीन इस ढोंगी पत्रकार के किस्से दिल्ली, भोपाल, ग्वालियर और भिंड के पत्रकार भलीभांति जानते हैं। यह आदमी इतनी तेजी से रंग बदलता है कि गिरगिट भी शरमा जाए। यह वो सपोला है जो बड़ा होकर पालने वाले को ही काटता है। इससे सावधान रहें। जय भड़ास.. जय भड़ास

बेनामी ने कहा…

इस घटिया आदमी के बारे में चर्चा करके आप बेवजह ब्लॉगर्स का समय जाया कर रहे हैं। जो आदमी जीते-जी प्रभाष जोशी को दोस्तों की महफिल में जली-भुनी सुनाकर अपनी एहसानफरामोशी का उदाहरण दिया करता था, वही आदमी उनके मरने के बाद ऐसे जता रहा है कि वही प्रभाष जी की पत्रकारिता का वारिश है। खैर, शराब और शबाब के शौकीन इस ढोंगी पत्रकार के किस्से दिल्ली, भोपाल, ग्वालियर और भिंड के पत्रकार भलीभांति जानते हैं। यह आदमी इतनी तेजी से रंग बदलता है कि गिरगिट भी शरमा जाए। यह वो सपोला है जो बड़ा होकर पालने वाले को ही काटता है। इससे सावधान रहें। जय भड़ास.. जय भड़ास

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

भाई बहुत करारा लिखा है आनंद आ गया....कुरकुरे... चिप्स... आलोक तोमर...
जय जय भड़ास

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