हम्माल

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

हम्माल

उस


सियाले में


अकस्मात


जंगल की हवा में समाहित


वनद्रुमों की मदनीय सुवास से


नहाई शाम में


घर लौटे


धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग


लगढग नग्न


लीतड़ा पहने


युगों से विशाल भार को काँधें लिये


आदिम रहस से भरे अंतस की


पहरेदारी करता


वह हरहठ


युवा हम्माल


जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते


श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित


कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती


गहन सिसियाँद से बेपरवा


सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर


उस के जाँगर पर आसक्त


वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी


उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह


पसीनाई चेहरा


जिस पर झुकती है वह


साँझ की तरह


दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में


और डूब जाता है वह युग्म


प्रेम के गहन पुरातन पाश में।


प्रणव सक्सेना

amitraghat.blogspot.com

2 टिप्पणियाँ:

हरभूषण ने कहा…

सेक्सना जी माफ़ कीजिये सक्सेना जी साहित्यिक रचना की आड़ में पेलम पेल की बात लिख रहे हैं अच्छा है लिखे रहिये
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

पेले रहिये.
जय जय भड़ास

प्रकाशित सभी सामग्री के विषय में किसी भी कार्यवाही हेतु संचालक का सीधा उत्तरदायित्त्व नही है अपितु लेखक उत्तरदायी है। आलेख की विषयवस्तु से संचालक की सहमति/सम्मति अनिवार्य नहीं है। कोई भी अश्लील, अनैतिक, असामाजिक,राष्ट्रविरोधी तथा असंवैधानिक सामग्री यदि प्रकाशित करी जाती है तो वह प्रकाशन के 24 घंटे के भीतर हटा दी जाएगी व लेखक सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी। यदि आगंतुक कोई आपत्तिजनक सामग्री पाते हैं तो तत्काल संचालक को सूचित करें - rajneesh.newmedia@gmail.com अथवा आप हमें ऊपर दिए गये ब्लॉग के पते bharhaas.bhadas@blogger.com पर भी ई-मेल कर सकते हैं।
eXTReMe Tracker

  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

Back to TOP