गुफ़रान सिद्दकी हों या रणधीर सिंह सुमन दोनो एक ही थैली के हैं

बुधवार, 23 जून 2010

गुफ़रान सिद्दकी कमर कस कर पिछले संदेशों में ऐसे कूदे थे कि बस अब ये अपनी विचारधारा को सामने लाकर भड़ास पर गंगा बहा देंगे और मेरे द्वारा करे जा रहे सारे पापों से इस मंच को निर्मल कर देंगे। रणधीर सिंह सुमन ने लिखा था कि हगना मूतना दिन में जरूरत के अनुसार चलता रहता है तो लगने लगा है कि अब पूरा दिन और सारी रात इसी काम में बिता रहे हैं वरना मुझे "आभासी नायक" लिखने से पहले खुद को असली खलनायक स्वीकार लेते। पैतरा तो अपनाया था खुद को पहले से ही पराजित बताने का लेकिन फ़ुसफ़ुसा अंदाज बता गया कि कितना वजन है इनके स्वीकारोक्ति में। गुफ़रान जी ने तो अब भाई बना लेना ही बेहतर समझा है लेकिन साथ में ये भी लिख दिया है कि इसे तेलगिरी न समझना तो भइया इतना जान लीजिये कि तेल इत्र फुलेल से मेरे ऊपर कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं है मैं तो डा.रूपेश श्रीवास्तव की शैली में जीने की कोशिश कर रहा हूं। मेरा आपसे तो आप से किसी किस्म का फ़िलहाल कोई वाद न था लेकिन आप रणधीर सिंह सुमन की विचारधारा और छद्मनेतृत्व के समर्थन में प्रतीत हुए और एक बात जान लीजिये कि हमारे देश के मौजूदा हालात में आप किसी भी धर्म की कट्टरता को लेकर लोकतंत्र की हत्या ही करते हैं और कुछ नहीं। जो हिन्दू वेदों को सिर पर उठाए फिरते हैं या जो बौद्ध धम्मपिटक लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं या जो जैन दुनिया भर की अहिंसा और सात्विक आचरण का गाना गाते हैं या जो मुसलमान कुरान और हदीस की बात करते हैं इन सबको बस एक ही बात कहता हूं कि देश में जो वर्तमान परिस्थितियां हैं चाहे वह माओवादी विचार के कारण हो,अशिक्षा,बेरोजगारी अथवा भ्रष्टाचार उसे सुलझाने का हल बताओ न कि ये कहो कि तिलक लगाओ,मंदिर में घंटा बजाओ,व्रत-उपवास रखो,नमाजें अदा करो..... वगैरह वगैरह। ईश्वर,खुदा,भगवान आदि जो कोई परमशक्ति है वह यदि आपके तरीके से प्रसन्न होती है तो उसे प्रसन्न करके अपना ही परलोक सुधार कर जन्नत में मजे मत मारने की व्यवस्था करो बल्कि अपने आसपास भी खुशहाली लाने की दुआ करो और देखो कि दुआ कुबूल होती है या बस हाथ में ............. ही आता है। ये ............. ही है जो अब तक आपके हाथ आया है वरना जो आया है उसे राष्ट्र के सापेक्ष तौल कर देखो समझ में आ जाएगा। महाभड़ासी जी कौन हैं यदि ये डा.रूपेश श्रीवास्तव जी के लिये संबोधन है तो मेरा सौभाग्य है।
गुफ़रान जी के लिये एक प्रेम भरा संदेश अन्य स्रोत से उठा कर लाया हूं कृपया पढ़ें अवश्य और अपने विचार दें कन्नी न काटें।
रणधीर सिंह सुमन जी के लिये भी एक संदेश है यदि हगने मूतने से फ़ुर्सत मिल जाए तो अवश्य पढें लेकिन कन्नी काट कर मुंह चुराना चाहें तो भी मान्य है क्योंकि उन्होंने लिखा है कि वे अपनी दिनचर्या में काफ़ी व्यस्त रहते हैं और व्यस्तता क्या है ये दुनिया ने देख लिया,छद्मनेतृत्व की कसरत.....
जय जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भड़ भड़ भड़ास
संजय जी आप जो लिख रहे हैं काफ़ी हद तक मेरे निजी विचार हैं आपसे सहमति जताने में पैसे खर्च तो हो नहीं रहे तो सहमति जता देता हूं जब नुकसान होगा तो भाग खड़ा होउंगा फिर आप मुझे रगेद लेना लेकिन उसके लिये आपको मेरे पीछे बहुत दूर तक दौड़ना होगा क्योंकि हम तो बहुत तेज भागते हैं एक नंबर के भगोड़े हैं। देखने वाले सोचेंगे कि आप मेरे पदचिन्हों पर चल(भाग)रहे हैं:)मैं भी रास्ते में मिलने वालों को बोलता चलूंगा कि देखो पीछे पीछे मेरे फ़ालोवर्स आ रहे हैं:)इस तरह हम भी नेता बन जाएंगे
जय जय भड़ास

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

संजय जी धांसू एकदम झक्कास....
कसकर पेला है लेकिन आपकी बातों का टु दि प्वाइंट उत्तर दिया ही नहीं जा रहा है। आपकी पिछली पोस्ट का अंदाज तो बिलकुल गुरूदेव डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी जैसा लगा जिसमें एक एक लाइन उठा कर जवाब दिया गया है।
जय जय भड़ास

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