सब कुछ लिखना लेकिन मणिपुर के बारे में मत लिखना

बुधवार, 16 जून 2010

हिंदू-मुसलमान, पंडित-मौलाना,साहित्य-संगीत,बुद्धिवाद-फुद्दिवाद,शिया-सुन्नी,घंटा-नुन्नी,अनूप-जैन,देवता-राक्षस,फासीवादी-खांसीवादी,तर्क कुतर्क-बेड़ागर्क,बापू आसाराम-बिहार सासाराम,क्रिकेट धोनी-महिला योनि,पुरुष लिंग-शाहरुख किंग,राजनेता-सबकी लेता,कविता कहानी-मरी हुई नानी,ब्लागर मीटिंग-ठगी चीटिंग, गांधी नेहरू-परवल कुंदरू, सोनिया राहुल-बिजली पानी गुल,फिल्म-इल्म,उर्दू हिंदी-मेकअप बिंदी,खबर मीडिया-अधनंगी लौंडिया,छपास भड़ास-टट्टी संडास....................... आदि अनंत-सतवंत बेअंत तक सब कुछ लिख लेना लेकिन मणिपुर के बारे में मत लिखना क्योंकि तुम्हें क्या लेना देना मणिपुर से अगर वो कानपुर के पास होता तो शायद सोचते भी लेकिन भले वहां के लोग दो मतों की चक्की में पिस रहे हैं मरे जा रहे हैं प्रधानमंत्री घुटने टेक देता है बातचीत के लिये आमंत्रित कर लेता है ये उदाहरण बताने के लिये कि यही सही तरीका है बात मनवाने का। हिंदी के ब्लागरों के पास लिखने के लिये इतना कुछ है कि इस तरह के चिरकुट मुद्दे पर भला वो क्यों लिखेंगे। जब आपस में समस्याओं पर चर्चा करने के लिये परंपरागत मीडिया की मोहताजी खत्म हो चुकी है तब भी हमारे हमवतनों की सुध लेने की हमारे पास फुर्सत कहां है? अब भी न चेते तो लोकतंत्र के नाम पर जो चल रहा है वो तुम्हारे देखते ही देखते देश को खत्म कर देगा और छद्म लोकतंत्र अपने असल रूप में आ जाएगा उसे मुखौटे की भी जरूरत न पड़ेगी और देश फिर छोटे राज्यों में टूट जाएगा। दिल्ली के पास समय नहीं है सीमा पर मौजूद राज्यों की समस्याओं पर गौर करने का उसे तो उत्तर प्रदेश,बिहार, मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,तमिलनाडु,आंध्र प्रदेश,कर्नाटक,केरल और गुजरात में ही भारत दिखता है। इन शासन में बैठे जोंक स्वभाव लोगों को तो मतलब ही नहीं है कि काश्मीर,मिजोरम,मेघालय,अरुणाचल प्रदेश,मणिपुर,त्रिपुरा भी हमारे ही देश के हिस्से हैं। यदि हम अपने हमवतनों के दर्द को महसूस नहीं करते तो फिर हमें अधिकार नहीं है कि हम कह सकें कि ये देश हमारा है।
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

indli ने कहा…

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

गुरूजी ये तो साले अपने निजी दुराग्रहों से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते तो मणिपुर के लोगों की तकलीफ़ कैसे समझेंगे? आपने नया शब्द प्रयोग करा है मजा आया नारीवादी लोगों के लिये "फुद्दिवादी"... पंजाबी और हिंदी का वर्णसंकर शब्द है लेकिन है दमदार।
जय जय भड़ास

मनोज द्विवेदी ने कहा…

GURUJI...APKE ASHIRVAD SE METRO UJALA KE JUN ISSUE ME HAMNE EK STORY MANIPUR PAR KI HAI...APNE HI DESH ME BEGANE..SHIRSHAK SE YAH STORY CHHAPI HAI..APNE BILKUL SAHI MUDDA UTHAYA HAI..
ANT ME APKA IJAD KIYA GAYA SHABD "FUDDIVADI" KAFI ROCHAK AUR APNE ME KAI ARTH SAMETE HAI..

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