रणधीर सिंह सुमन के लोकसंघर्ष को न्यायाधीश पक्षपाती,अन्यायी और मूर्ख जान पड़ते हैं

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

जब ढकोसलेबाज लोग खुद को पुरोधा के रूप में प्रस्तुत करने के लिये पैंतरे अपनाना शुरू करते हैं तो उनकी प्राथमिकता रहती है कि जिन लोगों को अपना वोट बैंक मानते हैं सबसे पहले उन्हें इस बात का एहसास दिलाएं कि वे लोग इस देश और परिस्थितियों में अत्यंत असुरक्षित हैं। जब वे अपनी हर चालाकी से निशाना बनाए लोगों को ये एहसास करा देते हैं कि वे असुरक्षित हैं तब इनका अगला पैतरा सामने आता है ये जताना कि हम तुम्हारी और तुम्हारे अधिकारों की रक्षा करेंगे, हम तुम्हारे नेता हैं और कोई तुम्हारा नेतृत्व कर ही नहीं सकता। देश में जो बीमार राजनीति दिख रही है वह यही छद्मनेतृत्व है और कुछ नहीं। खुद देखिये कि जो जिनका नेता होने का दावा कर रहा है उन्हीं का खून चूस रहा है चाहे ये ठाकरे किस्म के लोग हों या मायावती किस्म के।
पहले तो लोकसंघर्ष नामक इंद्रजाल के द्वारा लोगों को लुभाया कि हम तुम्हारी ही तो लड़ाई लड़ रहे हैं। मुसलमानों को निशाना बनाकर पैतरेबाजी करना इनका खेल है। इस खेल में तमाम कुटिल शामिल हैं जिन्हें शोषण करने वालों की कतार में सबसे आगे बैठना है ये वो लोग हैं जिनके मुँह में गरीबों का खून लग चुका है। जनता पगलाई बौखलाई सी हिंदू-मुसलमान, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के समीकरणो में उलझ कर कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी....... में अपना नेता तलाशते हुए दशकों से रक्तदान करे जा रही है लोकतंत्र के नाम पर।
अयोध्या मामले पर जिन तीन जजों की पीठ ने निर्णय दिया तो रणधीर सिंह सुमन जैसे लोगों को लगा कि यही मौका है मुसलमानों को जताने का कि उनके साथ अन्याय हो गया है, बाबर तो इतिहास है और राम माइथोलॉजी का पात्र तो फिर आस्था के आधार पर निर्णय कैसे दिया जा सकता है। इन लोकतंत्र के नाम पर धब्बों को लगता है कि न्याय प्रणाली हृदयहीन,यान्त्रिक सी प्रक्रिया होती है। ये चिल्लाते फिर रहे हैं कि लखनऊ बेंच ने निर्णय दिया है न्याय नहीं करा यानि कि जो न्यायाधीश बैठे थे वे अन्यायी और मूर्ख हैं और उन्होंने मात्र दिखावा करा है सैकड़ों पन्ने काले करके। क्या भरोसा कल ये सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के बारे में भी यही राय कायम करके देश के मुसलमानों को भड़का कर सड़कों पर उतार कर खून-खराबा करवा दें कि तुम लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ है तुम खुद ही फैसला कर लो हम तुम्हारे साथ हैं। शब्दप्रपंच में माहिर ये लफ़्फ़ाज़ लोग जो कर रहे हैं वो पूरे देश के लिये खतरनाक है। मैं इन लोगों को न्यायाधीश मान कर इस वैश्विक मंच पर आने को कहता हूँ कि आओ और बताओं कि तुम्हारा फैसला क्या है और कितने लोग उससे सहमत हैं???????
लेकिन ये मुँहचोरों के जमात है इनमें साहस नहीं है कि ये इस तरफ सामने आएं ये तो बस उन्हें बरगलाते रहेंगे जो भोले हैं और इनकी कुटिलता को समझते नहीं। भड़ास से जो गुफ़रान सिद्दकी और रणधीर सिंह सुमन मुँह काला करके भागे तो आज तक इनका साहस न हुआ कि इधर आ सकें और न होगा।
धिक्कार है तुम पर
जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

3 टिप्पणियाँ:

Suman ने कहा…

nice.....................................

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

चलो अच्छा हुआ पधारे तो नाइस के बहाने ही सही.... लेकिन रणधीर सिंह जी हो पक्के ढीठ जिधर आपका पैजामा फाड़ा जाता है अपने हृदय रोग का पैबन्द लेकर nice की गोंद से चिपकाने जरूर चले आते हो। लेकिन एक बात तो इस कटारनवरे ने बता ही दिया कि तुम्हारी जमात की औकात क्या है
जय जय भड़ास

मनोज द्विवेदी ने कहा…

NICE....BAHUT KHATARNAK MEDICINE HAI..PURI MANSPESHIYON KO DHILA KAR DETI HAI AUR ADAMI KI RIDH KI HADDI JHUK JATI HAI..VAKIL SAHAB AB IS DAVA KA SEVAN BAND KAREN.

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