पहले निरुपमा पाठक अब नीतू सोलंकी. मीडिया के लिए ये नाम सामाजिक मुद्दा उठाने के बजाय बाजार में इनकी मौत को बेचने के लिए है.

शुक्रवार, 4 मार्च 2011


निरुपमा पाठक और नीतू सोलंकी ये दो नाम, कभी निरुपमा पाठक मीडिया के लिए सनसनी था आज नीतू सोलंकी मगर इन दो नामों में क्या समानता हो सकती है. आखिर वो कौन स मुद्दा है जो इन दो नामों को एक साथ जोड़ता है. कहीं न कहीं एक पतली सी लकीर जो इस दो मौत में रिश्ता बना जाति है वो है हमारे देश की मीडिया, बे सिर पैर की वाहियात बातों का पिटारा अपने सर पर लादे माइक हाथ में थामे हमारे देश का चौथा खम्भा.

पहले निरुपमा मौत का कारण स्वछन्द जीवन, या स्वतंत्र विचार या फिर पाश्चात्य सभ्यता का चरण वंदन. नीतू के मौत का कारण भी वहीँ जा कर अटकता है जिसका कारण निरुपमा की मौत का रहा.

भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विरोधी और पाश्चात्य सभ्यता के पैरोकार और जो भारतीयता के घुर विरोधी हैं ने इस मुद्दों को अपनाया क्यूंकि उन लोगों को ना ही सभ्यता और ना ही संस्कार यहाँ तक की भारत और भारत दर्शन से भी कोई लेना देना नहीं है.

एक में प्रियभान्शु दो दुसरे में राजू ये दो वो नाम हैं जो हमारे समाज के अपराधी हैं मगर हमारे मीडिया के लिए ये सरताज क्यूंकि मीडिया की माने तो हमारी सभ्यता और संस्कृति को हमें छोड़ना होगा. पहले प्रियभान्शु को बचाने की कोशसिह की राजनीति और अब नीतू के लाश को बेचने की जल्दी में आम आदमी को ताक़ पर रखना जिसकी नियत.

निरुपमा पाठक मौत में पुलिस ने माना की प्रियभान्शु के कारण नीरू आत्म हत्या को विवश हुई. नीतू के मामले में लिव इन रिलेशन का हवाला मगर मामला वहीँ के वहीँ कारण क्या.

नीरू के मामले में दिल्ली का धंधेबाज पत्रकार ही नहीं बल्कि एम एम एस बना कर कमी करने वाला जे एन यू का वो तबका भी प्रियभान्शु को बचाने के लिए एकजुट था और नीतू के लिए मीडिया नेतु के घरवालों का विचार बेचने के लिए एक दिखा रहा है तो मामला यहाँ भी भारतीय संस्कार का ही आ जाता है.

एक तरफ स्वतंन्त्र उन्मुक्तता बिकता है तो दूसरी तरफ माँ बाप के बहाने संस्कार. हमारी दो मूंही मीडिया जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नेताओं के साथ गलबहालिया करती है और बाजार में विचारों को बेच देती है एक बार फिर से बेचने के लिए कड़ी है और बिकाऊ वही पुराना......

हमारा भारत....
हमारी भारतीयता....
हमारा संस्कार.....
हमारी संस्कृति......

हम किसके साथ चलें ?

भारतीय हो के या भारतीयता छोड़ के दोगला बन के ?

उत्त्तर ढूंढ रहा हूँ.

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

कोई उत्तर नहीं मिलने वाला रजनीश भाई क्योंकि मीडिया से लेकर पुलिस तक पर हम सब उंगली उठा लेते हैं जनता को क्यों भूल जाते हैं जो वैचारिक तौर पर षंढ बनी बस अखबार बांच कर बकैती करती है फिर जाति-धर्म के आधार पर वोट दे आती है। जब तक आम आवाम नहीं जागेगी यही चूतियापा चलता रहेगा।
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