तमिलनाडु में हिन्दी लोकप्रिय?

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

तमिलनाडु में हिन्दी लोकप्रिय?


डॉ. मधुसूदन
प्रति वर्ष ६ लाख हिन्दी के परीक्षार्थी।
सर्वाधिक लोकप्रिय तृतीय भाषा
हिन्दी प्रचार सभा काफी व्यस्त
जपानी का देवनागरी आधार
जोडनेवाली कडी संस्कृत है,
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तमिल पुस्तकों से हिन्दी विरोधी व्यंग्यचित्र हटाने की माँग।
Remove anti-Hindi agitation cartoon: Says Karunanidhi.
आपने, करुणानिधि द्वारा, तमिलनाडु में, पाठ्य पुस्तकों से हिंदी-विरोधी (Cartoon) व्यंग्यचित्र हटवाने की माँग का, समाचार पढा होगा ही। राजनीतिज्ञ जब ऐसी माँग करते हैं, तो उसके पीछे कुछ कूटनैतिक कारण ही होने चाहिए। कहा जा सकता है, कि, इसका कारण है, तमिलनाडु के युवा छात्र, जो भारी संख्या में आज कल हिन्दी सीख रहें हैं। अर्थात प्रदेशका हिन्दी विरोधी दृष्टिकोण बदल रहा है; हिन्दी विरोध शिथिल पड रहा है।
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तमिलनाडु में, हिन्दी की लोकप्रियता बढी है।
"फोर्ब्स इंडिया.कॉम " पर फरवरी २२ -२०१० को एक आलेख छपा। लेखक थे, एस श्रीनिवासन,
वे कहते हैं; "हिन्दी विरोधी आंदोलनों ने (१९६५ में) राजनीतिज्ञों को पद प्राप्ति करवाने में सफलता दिलवाई थी, पर अब तमिलनाडु प्रदेश, हिन्दी सीखने का आनन्द लेने के लिए उत्सुक प्रतीत होता है।"
जन मत के पवन की दिशा भाँपकर करुणानिधि और दूसरे नेताओं ने भी ऐसा निर्णय लिया हो; यह संभावना नकारी नहीं जा सकती, राजनीतिज्ञ जो ठहरे। और आज की सांख्यिकी सच्चाई, (Statistical Data) इसी की पुष्टि ही करती है।
"सारे प्रदेश में, युवा पीढी द्वारा , पढी जाने वाली भाषाओं में, सर्वाधिक लोकप्रिय तृतीय भाषा के रूप में हिन्दी उभर रही है। हर कोई जो पहले हिन्दी का विरोध करता था, आज उस के गुणगान गाता है, और अपनी संतानों को हिन्दी सीखने भेजता है।" कहते हैं, सी. एन. वी. अन्नामलाई, चेन्नै स्थित "दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा" के कार्यवाह। हिन्दी के प्रबलातिप्रबल विरोध की स्थिति से ऐसा परिवर्तन स्वागतार्ह ही कहा जाएगा।
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हिन्दी प्रचार सभा काफी व्यस्त
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा काफी व्यस्त है। प्रति वर्ष (६००,०००) अर्थात ६ लाख छात्र, राज्य में, परीक्षाएं देते हैं, इतना ही नहीं उन की संख्या में प्रतिवर्ष , +२० % के अनुपात में वृद्धि हो रही है। १९६५ में जब हिन्दी विरोधी आंदोलन चरम पर था, २०,००० से भी संख्या में अल्प, परीक्षार्थी हुआ करते थे। "हिन्दी विरोधी आंदोलन ने ही हिंदी के प्रति लोगों की उत्सुकता बढायी। उन्हें जाग्रत किया, और हमारे पास लाया।" कहते हैं अन्नामलाई।"
६००,०००/२०,००० =३० इसका अर्थ हुआ कि आज १९६५ की अपेक्षा ३० गुना युवा छात्र तमिलनाडु में हिन्दी सीख रहें हैं। यह समाचार काफी उत्साह जनक ही मानता हूँ।
इसका परिणाम विलम्बित ही होगा। जब आज की पीढी बडी होगी, तब आपको मुम्बई या अहमदाबाद की भाँति कुछ मात्रामें अच्छी हिन्दी सुनाई देगी। दीर्घ दृष्टिसे इस प्रक्रिया की ओर देखने की आवश्यकता है। यह आम का वृक्ष जो आज छोटा है, बडा होकर अच्छे फल दे सकता है।
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तमिल छात्रों से जानकारी
मेरे विश्वविद्यालय में पढने आए तमिल छात्रों से मैं ने जाना कि, तमिलनाडु की, तमिल लिपि के व्यंजन मर्यादित हैं। इन छात्रों ने हिन्दी पढी हुयी है। वे नवीन पीढी के बढते, हिन्दी प्रेम की भी पुष्टि करते हैं। उनकी जानकारी के अनुसार, शासकीय शालाओ में नहीं, पर अन्य शालाओं में हिन्दी पढायी जाती है।
प्रदेश के शासक हिन्दी का विरोध करवाकर ही सत्ता में आये थे। इस लिए शासकीय शालाओ में हिन्दी पढाने के लिए लज्जा (?) एवं संकोच अनुभव करते होंगे। वैसे राजनीतिज्ञों के लिए लज्जा या संकोच का कोई अर्थ नहीं होता; पर मतों को लक्ष्य में रखकर अपनी दिशा परिवर्तित करना उनके लिए कोई कठिन नहीं। और जन-मत का पवन बदलते ही, व्यंग्यचित्र को हटाने की माँग, उनका पैंतरा, तटस्थ हो रहा है, यह प्रमाणित तो करती ही है।
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तमिल लिपि की जानकारी
तमिल लिपि के १२ स्वर, और १८ व्यंजन होते हैं; और ६ विशेष व्यंजन होते हैं।
इसी मर्यादा के कारण संपूर्ण देवनागरी का उच्चारण जिसकी आवश्यकता उन्हें संस्कृत की पढाई के लिए भी होती ही है, कठिन हो जाता है।
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उच्चारण बचपन के १० वर्ष
देवनागरी उच्चारण वर्ष १० की आयु तक ही सीखा जा सकता है। जो संस्कृत और हिन्दी दोनों में समान रूपसे उपयुक्त है, उसीको शुद्ध रीतिसे सीखने में उनका तिगुना लाभ है। एक तो संस्कृत के शब्द उनकी तमिल समृद्ध करते हैं, हिन्दी समृद्ध करते हैं, और संस्कृत की दिशा में पदार्पण होता है। रामायण महाभारत, और देशकी आध्यात्मिक धरोहर के साथ उन्हें जोडता है। देश की संस्कृति जो वैश्विक दृष्टि रखती है, उससे जुडने में कोई संकुचितता या संकीर्णता का अनुभव ना करें। देवनागरी सीखने पर अंग्रेज़ी उच्चार विशेष कठिन नहीं, पर अंग्रेज़ी रोमन लिपि सीखने पर हिन्दी उच्चारण अत्यंत कठिन होते हैं।
ऐसा करने पर, गायत्रि मंत्र भी
"ओम बुर्बुवा स्वाहा टट सविटुर्वरेन्यं बर्गो डेवस्य ढीमही" सुनने के लिए सज्ज रहें।
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जपानी का देवनागरी आधार
जपान ने भी देवनागरी का अनुकरण कर अपने उच्चार सुरक्षित किए थे। आजका जपानी ध्वन्यर्थक उच्चारण शायद अविकृत स्थिति में जीवित ना रहता, यदि जपान में संस्कृत अध्ययन की शिक्षा प्रणाली ना होती।जपान के प्राचीन संशोधको ने देवनागरी की ध्वन्यर्थक रचना के आधार पर उनके अपने उच्चारणों की पुनर्रचना पहले १२०४ के शोध पत्र में की थी जपान ने उसका उपयोग कर, १७ वी शताब्दि में, देवनागरी उच्चारण के आधारपर अपनी मानक लिपि का अनुक्रम सुनिश्चित किया, और उसकी पुनर्रचना की। ---(संशोधक) जेम्स बक
लेखक: देवनागरी के कारण ही जपानी भाषा के उच्चारण टिक पाए हैं। जब आपकी लेखित भाषा चित्रमय हो, तो उसका उच्चारण आप कैसे बचा के रख सकोगे?
The Japanese syllabary of today would probably not exist in its present arrangement had it not been for Sanskrit studies in Japan.
Scholars of ancient Japan extracted from the Devanagari those sounds which corresponded to sounds in Japanese and arranged the Japanese syllabary in the devanagari order.
First appearing in a document dated 1204, this arrangement has been fixed since the 17th century.---James Buck
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तमिल शिक्षा
और यदि केवल तमिल की ही प्राथमिक शिक्षा हुयी तो १०-१२ वर्ष की आयु के पश्चात उन्हें हिन्दी के उच्चारण सहजता से नहीं आते। तमिल भाषा में "---" के उच्चारण में स्पष्टता नहीं है। खाना खाया, और गाना गाया, दोनों आपको समान सुनाई दे सकता है। यदि आपको--"काना काया" सुनाई दे तो कोई अचरज नहीं। फिर उसका अर्थ आप संदर्भ से ही लगा सकते हैं। आरंभम्को--> आरम्बं, अधिक को -->अदिकं या अदिगं (-->, , और ध-->), अभयम को अबयम (--->), उपाध्याय को उबाद्दियायर् (-->, ध्य -->द्दिया ), अर्थ को अर्त्तम् या अर्त्तम्, (-->त्त ) आकाश को आगायम् (-->, -->) --ऐसे उच्चारण बदल जाते हैं। इन्हें तद्भव तो कहा जा सकता है, जो तमिल में ४० प्रतिशत (विद्वानों के अनुसार) हैं। १० % शब्द तत्सम भी हैं। विशिष्ट भाषा का प्रयोग हो, तो संस्कृत शब्दों का प्रमाण ५०% कहा जाता है।
अभी आप सोच भी सकते हैं, कि करूणानिधि, दयानिधि, राममूर्ति, कृष्णमूर्ति, सुब्रह्मण्यम इत्यादि नाम, और चिदम्बरं, कन्याकुमारी, उदकमण्डलम (ऊटकामण्ड), इत्यादि कहांसे आए? --पूरी सूचि दूं तो पन्ना भरजाए।
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समस्या का हल अभी भी है, और पहले भी था।
संस्कृत भारत की (साम्प्रदायिक नहीं) पर आध्यात्मिक भाषा होने के कारण, उसका लाभ जनता को सहज समझ में आता है। जोडनेवाली कडी संस्कृत है, जो कडी हिन्दी को केरल, कर्नाटक, और तमिलनाडु से भी जोडती है। वहाँ की वेदपाठी शालाएं भी यही काम कर ही रही है।
इन प्रदेशों की सारी प्रादेशिक जनता प्रादेशिक भाषा ही बोलती है। यहाँ के इस्लाम पंथी भी (अपवादों को छोडकर) प्रादेशिक भाषा ही बोलते हैं। इसी लिए संस्कृत को ही निष्कासित कर के हिन्दी को यहाँ प्रसारित करना महाकठिन है। इसी का अनुभव हम आज तक करते आए हैं।
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भाषावार प्रदेश रचना
भाषावार प्रदेश रचना का उद्देश्य कुछ भी रहा हो, पर उसी का दुरुपयोग हुआ और भारत में विघटनकारी ऊर्जाएं प्रोत्साहित हुयी, विभिन्न प्रदेशों का और भाषा-बोलियों का अनुचित मात्रा तक आग्रह भी उसी का परिणाम माना जाएगा। नेतृत्व के प्रति आदर रखकर ही, ऐसा कहा जा रहा है। पर गलतियों की ओर दुर्लक्ष्य़ कर कर देश की एकता को दृढ करने वाले अंगो की ही उपेक्षा करना, राष्ट्र की आत्महत्त्या को प्रोत्साहित करने बराबर ही है।
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आभार प्रदर्शन:
पी. एच. डी. की छात्राएं: गौरी, और अनुराधा गोपाल कृष्ण, और भूतपूर्व छात्र पार्थसारथी सभीके सहकार से इस आलेख को सम्पन्न किया गया है। गौरी और अनुराधा दोनों "भरत नाट्यम " की अच्छी जानकार हैं, दीपावली के कार्यक्रमों में भारतीय संस्कृति का दीप भी यही युवतियाँ जलाती है। सभी का ऋण आभार सहित व्यक्त करता हूँ।

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