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मुंबई सिकोड़ दिया है भड़ास ने...... मिल ही लेते हैं

बुधवार, 11 मार्च 2009

जमाना कहता है कि मुंबई शहर में लोग खो कर रह जाते हैं लेकिन भड़ास परिवार के लोगों ने आपसी प्रेम और दिली जुड़ा़व का जो दीपक जलाया है वह दिखता है इस तस्वीर में...... जिसमें कि मुंबई जैसे व्यस्ततम महानगर के दूर दूर स्थित उपनगरों में रहने वाले भड़ासी एक दूसरे से "बस यूं ही" भी मिल लिया करते हैं। जिससे हर दिन होली सा रंगीन,ईद सा खुशनुमा और दीवाली सा प्रकाशवान हो जाता है।इस तस्वीर में आप देखिये बांए से दांए भड़ास परिवार के तीखे और पैने तेवर वाले अग्रज भड़ासी भाई श्री दीनबंधु जिनके साथ ही बीच में बैठे हैं भड़ास परिवार के सबसे कम उम्र किशोरवय लेकिन अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के धनी अपने स्कूल में टीचर्स द्वारा "कम्प्यूटर विजार्ड" कह कर पुकारे जाने वाले बादशाह बासित जिनके साथ में हैं हमारे भड़ासियों में उपस्थित इतिहास का चलता-फिरता एन्साक्लोपीडिया माने जाने वाले महाभड़ासी श्री अजय मोहन जो कि जाति से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी अपने भड़ासाना तेवर के चलते अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द ही नहीं लिखते। ईश्वर से प्रार्थना है कि भड़ास परिवार इसी प्रकार फलता-फूलता रहे और एक दूसरे के सुख-दुःख को बांटता रहे।
आवश्यक है कि यदि सभी भड़ासी संपर्क बनाए रखने के लिये अपने फोन नंबर माडरेटर्स को मेल कर दें तो आवश्यकता के समय एक दूसरे से तत्काल त्वरित संपर्क करा जा सकता है।
जय जय भड़ास

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विजय माल्या महात्मा गांधी का चश्मा लाएंगे पर आज़ाद की पिस्तौल नहीं....

शुक्रवार, 6 मार्च 2009


भड़ासियों खुशखबरी है कि दारू बेच कर अरबों रुपया कमाने वाले व्यवसायी विजय माल्या(किंगफिशर वाले) ने कई करोड़ रुपए खर्च करके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चश्मे आदि की नीलामी बोली लगा कर सामान प्राप्त कर लिया है,खुशी है(पर किस बात की???)। इसे कहते हैं इच्छाशक्ति का होना लेकिन क्या विजय माल्या या किसी अन्य अरबपति ने इस बारे में सोचा है कि हमारे ही देश की धरोहरों को जो गोरे चुरा ले गये ये खरीद क्यों रहे हैं राष्ट्रीय स्तर पर सरकार पर क्यों दबाव नहीं बनाते कि इंग्लैंड सरकार उसे खुद ही ससम्मान वापिस करे?शायद सच तो ये है कि देश के लिये आजादी भी व्यवसायी जनों ने अपने लिये खरीदी थी ताकि बिना बंदूक के वे अपने देश के संसाधनों का दोहन कर सकें जैसा कि हो रहा है। ये कुछ वैसी ही बात है कि गांधी के तत्त्वों को जीवित रखा जाए ताकि लोग अपने शोषण का विरोध चंद्रशेखर आज़ाद की तरह से न कर पाएं वरना बेशर्म विजय माल्या इंग्लैंड से अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की पिस्तौल (जिसे वे प्यार से "बम-तुरू-बुख़ारा" कहा करते थे) लेकर आता। यदि आज़ाद जैसे तत्त्व पुनर्जीवित हो गये तो फिर हम देश की छाती पर गुलामी के प्रतीक बना कर रखे ’इंडिया गेट’ को सहन नहीं करेंगे या फिर कहीं ऐसा न हो कि हम कांग्रेस के उदय पर ही दोबारा सोच कर इतिहास खंगालने लगें। जो कौम अपने शहीदों को भूल जाती है वो धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। यदि हमारी क्रांति के मौलिक तत्त्व निकल कर सामने आने लगे तो कहीं ऐसा न हो कि ऐसी परिस्थितियों में जब सरकार अमीरों के लिए गरीब किसानों की जमीनों पर सेज़ की शय्या सजा रही है ताकि वे इस देश के किसानों की धरती मां से आसानी से बलात्कार कर सकें और वहां सजा दें अपने मशीने कारखाने यानि विकास किसका हुआ ...? हर हाल में पूंजीपति का और विकास का झुनझुना किसे पकड़ाया गया? किसान और दस्तकारों को......।
यदि देश वाकई स्वतंत्र है तो विजय माल्या नहीं बल्कि हमारी सरकार को इन सारी चीजों को वापिस लाने के प्रयास करने चाहिये।
जय जय भड़ास

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राष्ट्रमामा ओसामा.....काश ऐसा हो जाए।

बुधवार, 4 मार्च 2009

एक बार मैंने इतिहास की किताब में बचपन में पढ़ा था कि एक राज्य की रानी कर्णावती ने दिल्ली के राजा हुमांयू को राखी भेजी थी ताकि वो उसकी सैन्य सहायता करके मुसीबत दूर कर सके। रानी कर्णावती भारतीय रानी थी और हुमांयू महाराज एक विदेशी आक्रांता बाबर के बेटे यानि कि बाबर ने जब भारत पर हमला करा था तो कर्णावती महारानी के पापाजी वगैरह तो रहे ही होंगे लेकिन रानी जी ने इस बात को भुला कर कि हुमांयू जी एक आक्रांता परिवार से हैं उन्हें जरूरत पड़ने पर राखी भेज दी, हो सकता हो कि गाना भी गाया हो,"भइया मोरे राखी के बंधन को निभाना...."। आगे की कहानी हर वो बंदा जानता है जिसने आठवीं तक इतिहास पढ़ा है। मैं आज के परिप्रेक्ष्य में एक भड़ासी सुझाव अपने देश की पहली महिला यानि कि हम गरीबों की माताराम श्रीमती प्रतिभा ताई(ताई की जगह आई कहना ज्यादा सुहाता है मराठी में ताई बड़ी बहन को और आई माताजी को कहते हैं) को देना चाहता हूं। संभव है कि इससे जो समस्या किसी भी तरह से समाप्त नहीं हो रही है चमत्कारिक रूप से दूर हो जाए। आप लोग नहीं समझे... अरे भाई आतंकवाद, मेरा मानना है कि अगर प्रतिभा ताई ओसामा बिन लादेन को राखी भेज कर ट्राई मारें तो हो सकता है काम बन जाए वरना जैसा चल रहा है चलता रहेगा। अरे ऐसा तो है नहीं कि राखी भेजने पर नाराज होकर दस बम और फुड़वा देगा या इंडियन क्रिकेट टीम को ठुकवा देगा; लेकिन अगर दशमलव के हजारवें अंक तक भी सफलता की संभावना है कि ये पुराना ऐतिहासिक तरीका काम आ जाएगा तो हर्ज़ ही क्या है। हम सारे भारतीय मिल कर गाना गाएंगे...."ओसामा मेरा मामा है...ओसामा मेरा मामा...." और फिर सारे राजनैतिक दल ओसामा मामा जी को बधाई देने दौड़ पड़ेंगे और उन्हें "राष्ट्रमामा" कह कर भारत के इतिहास में दर्ज कर लिया जाएगा।
जय जय भड़ास

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