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नवभारत टाइम्स, मुंबई में भड़ासियों के लिये ही छपता है; आक्क्ख....थूऊऊऊ है इस समाचार पत्र पर

रविवार, 25 सितंबर 2011


अभी कुछ दिन पहले अक्सर की तरह २३ सितम्बर को समय मिलने पर मुंबई जैसे व्यस्त शहर में भी भड़ासी जन मेरे घर पर जुटे और एक दूसरे का हालचाल लिया । चाय नाश्ते के दौर पर दोपहर के भोजन से पहले एक भाई ने अपनी जेब से छह-सात परत करके घुसेड़ा हुआ एक हिंदी का समाचार पत्र निकाला तो सबने आदतन एक एक पन्ना बाँट लिया । एक पन्ना हमारे हाथ भी आ गया । अदल-बदल कर समाचार पत्र पढ़ने के बाद सबने एक दूसरे की तरफ देखा और स्कैनर की तरफ लपके । जिसने जिसने जो जो खबर स्कैन करी उससे आपको अंदाज हो जाएगा कि कौन कौन लोग वहाँ मौजूद थे :)

                 हिंदी के नाम पर कलंक हैं ये छुतिहर अंग्रेजों के वर्णसंकर पत्रकार

जैनों और उनके हमेशा की तरह अनूप मंडल के लिये शंकास्पद काम जिसका कोई उत्तर नहीं मिलता कि वे रामायण क्यों लिखते हैं या वेदों की बात क्यों करते हैं?


            इसको तो बस पटक-पटक कर रगेदना ही उपाय है और कुछ नहीं

डॉ.प्रकाश कोठारी जैसे महाचूतिया (या कमीना कहना बेहतर रहेगा) लोग बृह्मचर्य की अवधारणा को सिर्फ़ शरीर से वीर्य निकलने तक सीमित करके इतनी बकवास कर लेते हैं और आश्चर्य है कि कोई भी इनको जूते नहीं लगाता । इस ठरकी के अनुसार देखें तो जितने भी हिंदुओं के शास्त्रों में, जैनों के शास्त्रों में बृह्मचर्य का बल बताया गया है यहाँ तक कि महात्मा गाँधी भी इसके अनुसार चूतिया ही हैं । इसके चश्में से देखें तो सिर्फ़ "खसिया" ही बृह्मचारी हो सकते हैं । इस धूर्तशिरोमणि ने मन, वचन और कर्म पर आधारित बृह्मचर्य की अवधारणा को इतना सीमित कर दिया है कि इसको पकड़ कर नंगा कर इसके पिछवाड़े पर खजूर की संटी से सटासट बिना रुके एक हजार संटी मारने का दिल कर रहा है । इस नीच, कमीने, हरामखोर के अनुसार योगशास्त्र गलत है, सारे वो धर्मगृन्थ गलत हैं जिनमें बृह्मचर्य की विराट अवधारणा की महिमा मंडन करा गया है । इतना कस कर धोने के बाद इस वर्णसंकर से पूछा जाए कि अब क्या कहता है यदि फिर भी न माने तो पिछवाड़े से धान कूटने वाला मूसल डाल कर एक माह बात इसके विचार पूछे जाएं । यदि फिर भी इसे बृह्मचर्य बकवास लगता है तो क्रमशः खजूर का छीला हुआ पेड़ और इसके बाद कुतुब मीनार डाली जाए तब शायद इसकी बुद्धि ठिकाने आ जाएगी । यदि इस चिकित्सा शास्त्र के कलंक ने इतना ज्यादा पढ़ लिया है तो इस हलकट को मैं शास्त्रार्थ की चुनौती देता हूँ आकर देख ले कि कितने पानी में है ये ठरकी ।
जय जय भड़ास

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भड़ास की मर्यादा क्या हो???

शनिवार, 23 मई 2009

कई बार मैंने जब चाहा कि भड़ास पर एक सीमारेखा खींच कर उसे मर्यादित कर दूं तो हर बार मेरे हाथ किसी न किसी ने पकड़ लिये। भड़ास के बारे में एक विशेष दर्शन मेरे मन में सदा ही मौजूद रहा है। हमेशा ही मन और शरीर के संबंधों को अपनी टुटही-फुटही सी पूर्वाग्रहों की तराजू लिये अढैया-पसेरी के रोज ही हलके होते बांट से तौल कर जानने की कोशिश करता रहा। चिकित्सा के क्षेत्र में आने पर मस्तिष्क और मन के बीच पिसते शरीर को देख कर होंठो में ही मुस्कुराहट लीप लेता लेकिन इस लिपाई-पुताई का कारण न समझ पाया था कि ऐसा क्यों हो रहा है। सच तो ये था कि पूर्वाग्रहों की धूल मेरे चादर की पिटाई के कारण झड़ रही थी और निर्मलता आती जा रही थी जिसे मैं समझ ही न पा रहा था। गुरू शक्तियों से परिचय हुआ तो समझा कि क्या नाटक है। भड़ास एक मनोचिकित्सा पद्धति के रूप में मैं सहज ही विकसित कर पाया जिससे कि बहुत सारे लोगों ने आरोग्य पाया। निजी होने की सीमा से परे क्या है भला? समाज, देश, दुनिया या फिर परमात्मा?? कुछ नहीं! हमारी निजता से परे कुछ नहीं है। भड़ास के वैश्विक मंच पर आकर यदि कोई निहायत ही घरेलू बातें रखना चाहता है तो क्या उसे रोकना उचित होगा? उसके लिये राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याएं कहां कुछ मायने रखती हैं अगर उसका परिवार दुःख में घिरा है। ये एक आम आदमी है जिसकी दुनिया की शुरूआत उससे ही होती है और उसपर ही खत्म होती है लेकिन अचानक ही ये आम आदमी कभी भगत सिंह बन कर उठ खड़ा होता है और कभी चंद्रशेखर आज़ाद........। यही है भड़ास से सरल हुआ भड़ासी। उसे जी लेने दिया जाए, उसे लड़ लेने दिया जाए और गरिया लेने दिया जाए दामाद से लेकर राष्ट्रपति तक को , इंसान से लेकर भगवान तक को ताकि उसके भीतर की ध्वंसात्मक ऊर्जा का रूप बदल कर रचनात्मक हो जाए और वही गाली देने वाला कुंठित व्यक्ति खुशी के गीत गा सके, बच्चों के साथ किलकारियां मार कर सरल हो कर खेल सके........... यही तो है भड़ास या कुछ और जो शेष रह जाता है वह शब्दों से परे है, अव्याख्य है, अकथ है।
जय जय भड़ास

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भड़ास फ़ैन क्लब/एग्जास्ट फैन क्लब/कूलर क्लब/ए.सी. क्लब में मैं कहां रहूंगी? (अतीत के पन्ने से......)

शुक्रवार, 1 मई 2009

भड़ासी बाईयों और भाईयों, जब किसी साम्राज्य का विस्तार हो जाता है तो उसमें फटाव आने लगता है और अलग-अलग विचार धाराएं पैदा होने लगती हैं। ठीक वैसा ही भड़ास के साथ हो रहा है। पहले यहां सब भड़ासी मात्र हुआ करते थे अब इनमें भी श्रेणियां बनने लगी हैं। कुछ सक्रिय, कुछ निष्क्रिय, कुछ अक्रिय लेकिन भड़ासी तो सभी हैं क्योंकि जो कभी एकाध बार गलती से इधर मुंह मार लिये होंगे। अब भड़ास में फ़ैन क्लब बना है यानि कि जो फैन हैं वही भड़ासी हैं बाकी सब जो हैं नाम के भड़ासी हैं लेकिन उनकी सदस्यता अक्रियता या निष्क्रियता के आधार पर समाप्त करी तो गिनती के मुश्किल से पचास ही बचें शायद। मैं एक भविष्यवाणी कर रही हूं कि आने वाले समय में इस क्लब में कई विभाजन हो जाएंगे जैसे कि अभी कुछ लोग फैन हैं उनमें से जो ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "एग्जास्ट फैन" कहा जाएगा, जो इनकी अपेक्षा अधिक सक्रिय होंगे उन्हें "कूलर" और जो कूलरॊं से ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "ए.सी" की श्रेणी में रखा जाएगा।

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अरे बालक!क्या करने का इरादा है?

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

अरे बालक!क्या करने का इरादा है? कुछ old is gold लेकर आने वाले हो क्या? अच्छा है अगर कुछ पुराना माल लेकर आ रहे हो उसमें पुरानी मदिरा की तरह ही गहरा नशा होगा। मुझे याद हैं भड़ास के वो दिन जब हम सब कस कर लिख रहे थे लेकिन अफ़सोस इस बात का रहा कि हम अपनी धुन में ये न समझ पाए कि तकनीकी अधिकारों का दुरुपयोग करके एक कुटिल लालची आदमी हम सबकी भावनाओं को बेंच देगा और हमें बेदखल कर देगा।
हा..हा..हा...
वो ये भूल गया कि हम भड़ासी हैं दिल चुरा लेते हैं,आत्मा तक चुराने का साहस रखते हैं जब उसने भड़ास की हत्या कर दी तो हम सब भड़ासियों की समेकित भड़ास प्रसव पीड़ा से शिशु भड़ास का जन्म हुआ,जोकि अधिक शक्तिशाली होने के साथ अधिक भावुक है। भड़ास और भड़ासियों के अतीत से अगर आप कुछ ला रहे हैं तो भड़ास परिवार में जुड़ने वाले नए लोग जान पाएंगे कि भड़ास मात्र एक चूतियों की भीड़ नहीं है बल्कि एक ऐसा मंच है जो कि सामाजिक और राष्ट्रीय के साथ साथ मानवीय सरोकारों पर विचार करते हुए दिशा व दशा का मनन करता है और अधिक बेहतर जीवन के विकल्प तलाशता है; हम सिर्फ़ समस्याओं की तरफ़ उंगली नहीं उठाते बल्कि हल भी खोजते हैं और न सिर्फ़ खोज कर चुप हो जाते हैं बल्कि उसे लागू भी कराने का जतन करते हैं.....
जय जय भड़ास

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यशवंत सिंह को भड़ास से क्यों हटाना पड़ा???

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

अजीब लगता है न ये बात जान कर कि यशवंत सिंह भड़ास से कब का चलता कर दिये गये हैं। दरअसल भड़ास नामक मंच एक निश्चित सिद्धांत और दर्शन को समर्पित रहा है जो हिंदी की पट्टी पर लिखने वाले ग्रामीण परिवेश से जुड़े शहरों की तरफ आए लोगों के लिये रहा है, जो कि कहीं न कहीं अभी भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं। पंचसितारा रहन-सहन और ऊंची इमारतों के चालीसवे-पचासवें मंजिल पर रह कर भी बारिश में मिट्टी से उठती सोंधी गंध के लिए दीवाने हैं, चमचमाती बत्तियों में असहज महसूस करते हैं लेकिन लालटेन और मिट्टी के तेल की चिमनी में सहज महसूस कर पाते हैं। एलीट क्लास/आभिजात्य वर्ग में शामिल होने के लिये चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं लगा पाने वाले लोग भड़ास के भदेस,ग्रामीण,गंवारू,आंचलिक, मूल भारतीयता के मनोरथ को जिंदा रख पाए हैं। भड़ास ऐसे लोगों का मंच बन पाया जो कि मजदूर वर्ग की भाषा बोल पाने में अधिक सहज महसूस कर पाते न कि मां को गाली भी अंग्रेजी में भी दें, जुबान से कड़वे भड़ासियों ने हमेशा जहां एक ओर शराफ़त का पाखंड करने वाले और सरलता का मुखौटा लगा कर भावनाओं का धंधा करने वालों से नफ़रत पायी है तो वहीं दूसरी ओर उनसे हजार गुना अधिक लोगों का निश्छल प्यार पाया है। एक समय था जब यशवंत सिंह का नाम भड़ास का पर्याय हुआ करता था लेकिन जब इन सज्जन पर खुद ही अंग्रेजी शराब और प्रसिद्धि का नशा चढ़ गया तो इन्होंने भड़ास की प्रसिद्धि को अपने शुद्ध लालच से एक रूप दिया जिसमें सीधे ही भड़ास की लोकप्रियता और भोले भड़ासियों की भावनाओं को विक्रय करा गया है। ईश्वर की दया है कि भड़ास की सुगंध इनकी करतूत से जुड़े होने के कारण इनकी दाल-रोटी के साथ ही दारु मुर्गे का भी खर्च निकलने लगा है। जब इनसे ये कहा गया कि आप जब भड़ास की प्रसिद्धि के टके करा रहे हैं तो मेहरबानी करके देश के कोने-कोने में साइबर कैफ़े में पचास-साठ रुपए प्रति घंटा शुल्क देकर कंटेंट लिखने वाले भड़ासियों को उनकी सक्रियता के आधार पर इस नए उपक्रम में भागीदार बनाया जाए और लाभांश दिया जाए तो इनका सीधा उत्तर रहा कि भड़ासी तो चूतिया हैं वो अपनी भड़ास निकालने के लिये लिखते हैं हमने उन्हें मंच उपलब्ध कराया है ये मेरा निजी मामला है इसमें बेवकूफ़ों की कोई हिस्सेदारी मुझे स्वीकार नहीं है आपको क्या चाहिये वो बता दीजिये, तो भड़ासियों और गैर भड़ासियों आपके सामने है कि हमें क्या चाहिये था उस स्थिति में..... हमें मुखौटाधारी हरगिज बर्दाश्त नहीं हैं तो फिर एक साथी के मुखौटे में एक लालची बनिया जो कि आपकी कोमल भावनाओं की दुकान सजा ले भला कैसे सहन करा जा सकता था। इसलिये भड़ास के अंदाज ने बिना किसी गणित के कि क्या फ़ायदा नुकसान होगा इन्हें भड़ास से चलता कर दिया। एक बात और कि जब तक तकनीकी अधिकार इनके हाथ में थे इन्होंने अकारण ही अपनी दादागिरी के चलते बहुत सारे लोगों को बिना भड़ासियों की जानकारी के हटा दिया था अब वही व्यवहार इनके लिये उचित है। इस पोस्ट से तमाम वे लोग जान जाएं जो कि अभी भी यशवंत सिंह को भड़ास से जुड़ा मानते हैं।

जय जय भड़ास

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क्या हरकीरत हकीर मुनव्वर आपा की मां है???

रविवार, 12 अप्रैल 2009

मैं कुछ दिन से अपनी परीक्षाओं में व्यस्त रही लेकिन भड़ास चूंकि जीवन का हिस्सा है तो फिर भला इससे ज्यादा वक्त अलग कैसे रहा जा सकता है। देखा तो हरकीरत हकीर के पक्ष में तमाम मुखौटा लगा कर शराफ़त का ढोंग करने वाले धूर्त लार टपका-टपका कर सहला रहे हैं सब अपनी अपनी राय दे रहे हैं लेकिन किसी ने उस औरत से ये नहीं पूछा कि हरकीरत बाई जी तुम क्या तुम मुनव्वर सुल्ताना की मां हो या फिर कुछ ऐसे रिश्ते में आती हो कि तुम्हें उनके अब्बा हुजूर ने अधिकार दे दिया कि तुम उनका नाम सुल्ताना से बदल कर "उलटाना" कर दो??? इस औरत का मुनव्वर आपा ने इस बात की तरफ़ अपने अंदाज़ में ध्यान भी दिलाया लेकिन इसे कहां परवाह है ये तो उनसे पता नहीं कौन सा रिश्ता जोड़े बैठी है जो इस बारे में अपना हक समझती है कि नाम ही बदल देगी। अभी भी अगर जरा सी शर्म बाकी है तो माफ़ी मांग कर गलती सुधार ले भड़ासी तो बड़े भोले हैं लेकिन महाऔघड़ी हैं ये याद रखना। पीछा नहीं छूटेगा शब्दप्रपंच करने से......
जय जय भड़ास

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हरकीरत मैडम जी भड़ास का डा.रूपेश श्रीवास्तव भी एक काल्पनिक पात्र है मुखौटों का मेला लगा हुआ है

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मैं डा.रूपेश श्रीवास्तव हरकीरत मैडम(???? पता नहीं कि मैडम हैं या एडम या फिर कोई हिजड़ा मनीषा दीदी जैसा) को बता रहा हूं कि मुनव्वर सुल्ताना क्या और क्या कोई लैंगिक विकलांग मनीषा या ऐसी पच्चीसों ...... ये सब मैं ही तो हूं; इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है ये सभी काल्पनिक हैं दरअसल सच तो ये है कि डा.रूपेश श्रीवास्तव भी एक काल्पनिक पात्र है जिस पर पच्चीसों लोग खुद अपने आपको होने की घोषणा लिख कर दुनिया के सामने कर चुके हैं। चूंकि ये एक ऐसा नाम और एकाउंट है जिसे अधिकांश भड़ासी इस्तेमाल करते हैं यहां तक कि मैं भी..... मेरा तो कोई नाम नहीं है मैं आप लोगों की तरह नहीं हूं बेनाम हूं अनाम हूं गुमनाम हूं लेकिन शायद हूं जरूर इसलिये लिखता हूं चेहरा नहीं है अस्तित्व नहीं है व्यक्तित्व नहीं है तो मुखौटा लगाने का आधार भी नहीं है।
हरकीरत हक़ीर को एक छोटा सा टिप्पणा नज़र करके आया हूं आप सब भी देखिये, मुखौटों का मेला लगा हुआ है ..............
आदरणीय हरकीरत जी कहने में जो हिचकिचाहट आपने उपजा दी है सो न ही कहूं तो शायद सहज हो सकूंगा वो इसलिये कि खुद एक छद्मवेशधारी जो मुझे ये कह रहा है कि मैं मुनव्वर सुल्ताना के बुर्के में छिप कर कुछ कर रहा हूं और आप उस जड़बुद्धि से सहमति जता रही हैं तो मुझे उस गलीज़ के साथ आपकी भी बुद्धि पर तरस आने लगा है कि कितना हलका वजन है आपकी सोच का....
मैडम जी डा.रूपेश श्रीवास्तव ने आज तक कोई काम छिप कर नहीं करा वरना आप लोगों की शराफ़त की कतार में सबसे आगे बैठा होता। डा.रूपेश श्रीवास्तव का एक ही रूप है और वो है भड़ास जो कि आप सबके सुन्दर मुखौटों से ज्यादा बदसूरत लग सकता है जिसकी मैंने कभी परवाह नहीं करी। मुनव्वर सुल्ताना कब की बुर्के से बाहर आ चुकी हैं लेकिन आप अपने "महिला"पन नापने का न जाने कौन सा पैमाना लेकर ये नाप रही हैं कि वो सब मेरा लिखा है। गलती से भड़ास पर जाइये तो आपको पता चल जाएगा कि डा.रूपेश श्रीवास्तव एक इंसान नहीं है ये कम से कम पच्चीस लोगों ने लिखा है कि वे हैं डा.रूपेश श्रीवास्तव.... भड़ास के मंच पर महिला पुरुष और हिजड़े सभी लिखते हैं भड़ास इन सबसे कब का मुक्त हो चुका है जो ये नहीं चाहते कि सड़ी-गली परंपराए टूटें या महिलाएं बुर्के से बाहर आएं या इनके घरों में जन्में हिजड़े बच्चे तालियां बजा कर भीख मांगना छोड़ कर आप शरीफ़ों के साथ आएं तो आपको मुबारक हो आपकी बौद्धिकता हमें तो हमारी कुंठाएं,गंवारूपन,भदेसपन और ओछापन ही सही लगा। समीर लाल जी को बताना है कि जब मनीषा नारायण ने अर्धसत्य ब्लाग बना कर मेरे सहयोग से लिखना शुरू करा तो इनकी करुणा का मुखौटा सामने न आया लेकिन जब गुरूदेव ने सारथी पर हिजड़ो पर कलम चलाई हमें निर्देशित करने के लिये तो पहुंच गए सहानुभूति के श्लोक पढ़ने, हिन्दी का कोई भी ब्लागर अगर खांसी या छींक पर भी लिखे तो जनाब की टिप्पणी पहुंच जाती है पर हिजड़ा कैसे लिख सकता है वो भी ब्लागर बनकर.... महाराज मुखौटा कभी व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बनता ये आप भली प्रकार जानते हैं लेकिन क्या करें मजबूरी है कि इस बात पर एक लाइन लिखने से काम नहीं चलेगा तो किचकिचा कर बौद्धिक शब्दप्रपंच कर डाला। बेटा राजेश स्वार्थी भड़ास के बारे में जानने के लिये तुम्हें इंटरनेट पर अभी ब्लागिंग के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है खाली ब्लाग बना लेने से कुछ नहीं होता कंटेंट डालना पड़ता है भले चोरी का ही डालो:)बच्चे भड़ास स्पष्टवादिता में मुंहफ़ट होने की हद से आगे है दुनिया सबसे कुख्यात हिंदी ब्लाग है कभी गलती से किसी सर्च इंजन को इस्तेमाल कर लेना। अरविंद मिश्रा जी आप जिस टीम के सिरमौर हैं उसके सचिव जी से मेरे बारे में और भड़ास के बारे में जान लीजियेगा मैं वही हूं जो आयुषवेद नाम की दुकान ब्लागिंग के क्षेत्र में मुफ़्त में चला रहा हूं,खुद ही समझ जाएंगे कि मेरी सोच क्या है। मैडम जी आप कहती हैं कि हमने इस मोहतरमां को माफ़ किया ...कृपया इनसे कहिये दोबारा मेरे ब्लॉग का रुख न करें ...!! आपको मुझ उजड्ड की ओर से बिनमांगी सलाह है कि आप सिर्फ़ खास पाठकों के लिये ही सेटिंग में जाकर अपने ब्लाग को जमा लें ताकि हम जैसे गंदे लोग न आ सकें।
हरी जोशी जी तो पता नहीं किस दुनिया में रमण करते हैं कि यशवंत सिंह का मुखौटा नोच कर ही भड़ासियों ने उन्हें उनके ब्लाग का नाम ही बदल देने पर मजबूर कर दिया,भड़ास उस ब्लाग का नाम है जिसे हम सब चलाते हैं जिसका URL http://www.bhadas.tk है हम भड़ासियों ने हिंदी ब्लागिंग में यू आर एल बदल कर पहले इसे bharhaas.blogspot.com बनाया फिर उसे पुराने परिचय पर लौटाने के लिये नए स्थान पर डाइवर्ट करा,इस डाके के लिये बड़ी मशक्कत करनी पड़ी लेकिन इतनी बड़ी करतूत किसी ब्लागर ने न देखी न ही किसी ने.... शराफ़त अलियों के सिरमौर यशवंत सिंह बकौल अविनाश वाचस्पति उस पाखंडी का मेल आई डी दे रहे हैं,क्या होगा इससे? अरे भाई उसका पाखंड खुल जाएगा कि उसने क्या करा था भड़ास और भड़ासियों के साथ? क्या कारण है कि उसे अपने ब्लाग का नाम भड़ास से बदल कर भड़ासblog करना पड़ा???मामले को भड़ास पर प्रकाशित करना धमकी नहीं है वो एक कम्युनिटी ब्लाग है जिसके स्वप्न जी भी सदस्य हैं पूछ लीजिये उनसे और मनु बाबू भड़ास के दूसरे माडरेटर रजनीश के.झा से बड़ा गहरा प्रेम जताते नहीं थकते। अगर कभी आपमें से कोई शारीरिक तौर पर अस्वस्थ महसूस करे और लगे कि मैं बुरा आदमी होने के साथ एक अच्छा चिकित्सक हूं तो निःसंकोच संपर्क करें, इस बुरे आदमी में अगर आप अच्छे लोग चाहें तो अच्छाइयां तलाश सकते हैं लेकिन मुखौटे में न आएं।
जय जय भड़ास

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मैं ही हूं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

आज एक कमीने ने अपनी हरकत से बताया कि उसकी क्या औकात है। वो क्या हिंदी के भेड़चाल चलने वाले ब्लागरों को बताएगा कि कौन हैं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव, मैं सबके सामने बताती हूं कि मैं हूं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव...... और मैं ही नहीं हर वो मेरे जैसी लड़की जो ब्लागर भले ही न हो पर बेखौफ़ होकर घर से निकल पाती है क्योंकि जानती है कि एक भाई है जिसके बदन में रीढ़ की हड्डी है बहनों की रक्षा कर सकता है उनके सम्मान की रक्षा के लिये जान दे सकता है। घरों में बैठ कर शराफ़त का मुखौटा लगा कर ब्लागिंग के क्षेत्र में अपने आप को शरीफ़ बताने वालों कभी घर से बाहर आकर लड़की को छेड़ते किसी गुंडे का हाथ रोक कर देखो...... सिर्फ़ कंप्यूटर पर पिटपिटाने से कोई डॉ. रूपेश श्रीवास्तव नहीं बन जाता, साम्प्रदायिक दंगे फैलाने वालों के सामने खड़े हो सको इतना गूदा है हड्डियों में??????? आज मैं कहती हूं सारे लोगों के सामने कि मैं ही हूं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव। अरे गलीज़ के कीड़ों! तुम अगर हज़ार जन्म भी ले लो तब भी रूपेश का र भी न पैदा कर पाओगे अपने भीतर....
जय जय भड़ास

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भड़ास को नाम बदल कर भड़ासblog क्यों करना पड़ा?

शुक्रवार, 20 मार्च 2009


आज बनियाराम भड़ास4मीडिया के सबसे बड़े मीडिया माफ़िया बन जाने के खुशी में गाल बजा रहे है और तेललगाऊ तोलूराम किस्म के लोग बधाई देते नहीं थकेंगे। मुखौटाधारियों का कुनबा कितना बड़ा है ये तो आप सब भड़ासी बांयी तरफ़ जो सचित्र लिंक लगा रखी है उस पर जाकर देख सकते हैं। आज मीडिया के माफ़ियाजन जश्न मना रहे हैं कि वो सबसे बड़े हो गये हैं और साथ में मेहनत, लगन, देसीपन, हिंदी वगैरह की भी चाट चटा रहे हैं। मुझे पता है कि इस मोटे हो गये लिजलिजे रीढ़विहीन बनिये ने आजतक इस बात का उत्तर नहीं दिया कि भड़ास को नाम बदल कर भड़ासblog क्यों करना पड़ा और न ही किसी चूतिया ने इससे पूछा और पूछा भी होगा तो इसने कुटिलता से उसका जवाब ही न दिया होगा। वैसे सिद्ध होता जा रहा है कि हिंदी के क्षेत्र में अभी भी तोलू और अकारण ही तलवे चाटने वालों की कमी नहीं है। इस बनिये का मुखौटा नोचने का मुहिम जारी रहेगा और ये भड़ासियों को बेनामी कमेंट्स के जरिये गालियां देता रहेगा। बनिया धनिया की जगह लीद बेचने का काम करता रहेगा और भड़ासी उन लीद के पैकेटों पर पैट्रोल मूतते रहेंगे।
जय जय भड़ास

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मुंबई सिकोड़ दिया है भड़ास ने...... मिल ही लेते हैं

बुधवार, 11 मार्च 2009

जमाना कहता है कि मुंबई शहर में लोग खो कर रह जाते हैं लेकिन भड़ास परिवार के लोगों ने आपसी प्रेम और दिली जुड़ा़व का जो दीपक जलाया है वह दिखता है इस तस्वीर में...... जिसमें कि मुंबई जैसे व्यस्ततम महानगर के दूर दूर स्थित उपनगरों में रहने वाले भड़ासी एक दूसरे से "बस यूं ही" भी मिल लिया करते हैं। जिससे हर दिन होली सा रंगीन,ईद सा खुशनुमा और दीवाली सा प्रकाशवान हो जाता है।इस तस्वीर में आप देखिये बांए से दांए भड़ास परिवार के तीखे और पैने तेवर वाले अग्रज भड़ासी भाई श्री दीनबंधु जिनके साथ ही बीच में बैठे हैं भड़ास परिवार के सबसे कम उम्र किशोरवय लेकिन अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के धनी अपने स्कूल में टीचर्स द्वारा "कम्प्यूटर विजार्ड" कह कर पुकारे जाने वाले बादशाह बासित जिनके साथ में हैं हमारे भड़ासियों में उपस्थित इतिहास का चलता-फिरता एन्साक्लोपीडिया माने जाने वाले महाभड़ासी श्री अजय मोहन जो कि जाति से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी अपने भड़ासाना तेवर के चलते अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द ही नहीं लिखते। ईश्वर से प्रार्थना है कि भड़ास परिवार इसी प्रकार फलता-फूलता रहे और एक दूसरे के सुख-दुःख को बांटता रहे।
आवश्यक है कि यदि सभी भड़ासी संपर्क बनाए रखने के लिये अपने फोन नंबर माडरेटर्स को मेल कर दें तो आवश्यकता के समय एक दूसरे से तत्काल त्वरित संपर्क करा जा सकता है।
जय जय भड़ास

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एक बार फिर एक मक्कारी भरी प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है हिंदुस्तान के बवासीर के दर्द पर....

सोमवार, 9 मार्च 2009

भड़ासियों पाखंड-शिरोमणि धूर्त मुखौटाधारी संजय सेन ने जो कि खुद ये स्वीकारता है कि वह हिंदुस्तान का (बवासीर का)दर्द है उसने अभी तक पांच सौ रुपया इकट्ठा कर लिया है जिसका कि उपयोग वह अपने मुखौटे की रिपेयरिंग में इस्तेमाल कर रहा है। पिछली बार की तरह एक बार फिर एक मक्कारी भरी प्रतियोगिता का आयोजन करके हिंदी के ब्लागरों को बेवकूफ़ बनाने का जतन कर रहा है। आपको याद होगा कि ये कुटिल इससे पहले भी ऐसी ही एक प्रतियोगिता करके लोगों को भरपूर मूर्ख बना चुका है। यकीन है कि इस बार भी लोग इसके झांसे में आएंगे क्योंकि ग़ालिब ने हमारे देश में जब ये शेर कहा था कि कमी नहीं है ग़ालिब बेवकूफ़ों की इस जहां में, एक ढूंढो हजार मिलते हैं, तब देश की जनसंख्या काफ़ी कम थी आज तो एक ढूंढो तो सौ करोड़ मिल जाते हैं। ये भेड़ों की तरह से झुंड बना कर हिंदुस्तान के बवासीर के दर्द में शामिल हो कर बता रहे हैं कि वे भी हिंदुस्तान का दर्द हैं दवा या दुआ नहीं। भड़ास से ऐसे लोग अगर गलती से जुड़ गये हों तो अपने आप ही अलग हो जाएं क्योंकि भड़ास पर मुखौटाधारियों की नहीं बल्कि सच्चे और एक चेहरे वाले भड़ासियों जमात है। यह हिंदू-मुस्लिम, बाम्भन-बनिया, स्त्री-पुरुष की बकवास की बौद्धिक जुगाली करने वाले खसिया बैलों की नहीं बल्कि नंदी की तरह के मरकहे सांडों का अभ्यारण्य है।
ये पाखंडी खुद अपने चिट्ठे पर यौन-कुंठा से भरी अर्धनग्न स्त्रियों की तस्वीरों को लगाने का बहाना तलाशता रहता है जैसा कि अभी हाल ही में इसने वर्किंग वूमन से जुड़ी एक पोस्ट में अर्धनग्न और अत्यंत अश्लील सा चित्र लगाया था और विदेशी सर्वे का हवाला देकर नौकरी करने वाली भारतीय मां-बहनों को लज्जित कर रहा था कि वे सेक्सी कपड़े पहनने को प्रधानता देती हैं ताकि कार्यालय में अपने काम बनवा सकें और धूर्त लिखता है कि
प्राप्त प्रबिष्टियों मे से यदि कोई प्रबिष्टि हमें ऐसी प्राप्त होती है जो सामाजिक हित से ना जुडकर अश्लीलता या समाज को गलत रास्ता दिखाती है तो उसे अंकुरित चिट्ठा-2009 के लिए स्वीकार नही किया जायेगा,इसकी जानकारी आप को दे दी जायेगी। ऐसा नीच और कुत्सित सोच वाला हैवान भी अपने साथ कई लोगों को जोड़ कर ये सिद्ध कर रहा है कि इससे जुड़े लोग कितने पौरुष वाले हैं जो इस बात के विरुद्ध चूं तक नहीं करते बस बौद्धिक जुगाली करते रहते हैं। धिक्कार है ऐसे लोगों पर......
जय जय भड़ास

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"भड़ास" को 'भड़ास blog' क्यों बनाना पड़ा यशवंत सिंह को....????

बुधवार, 4 मार्च 2009

कल मुझे पता चला कि लोगों को भड़ास के दो फाड़ होने की जानकारी ही नहीं है , हिंदी ब्लाग जगत के पाठक व स्वयं ब्लागर्स भी बस अपनी अपनी पेले रहने में ही लगे रहते हैं और रही बात टिप्पणीकारों की तो डा.सुभाष भदौरिया के शब्दों में इन टिप्पणीकारों गिरोह हैं जो अधिकतर जगहों पर एक-दो लाइन लिख कर खुद को अति सक्रिय बताते-जताते रहते हैं ताकि अपना अस्तित्त्व बनाए रख सकें। दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लाग होने का दावा करने वाले ब्लाग "भड़ास" से जब यशवंत सिंह की कुटिलताओं को न स्वीकारने के कारण जब डा.रूपेश श्रीवास्तव ने विरोध जताया तो तकनीकी तानाशाही से उन्हें व उनसे सहमत सारे लोगों को हटा दिया गया। कोई चर्चा नहीं करी गयी और न ही किसी ने कुछ चूं-चां करी। डा.रुपेश श्रीवास्तव के बारे में तमाम लोग जानते हैं चाहे वो कभी खुल कर लिख न सकें जैसे कि अनिल रघुराज(हिंदुस्तानी की डायरी नामक ब्लाग वाले), बोधिसत्व(विनय पत्रिका ब्लाग वाले),अभय तिवारी(निर्मल आनंद ब्लाग वाले)........। एक दिन अचानक "भड़ास" का नाम 'भड़ास blog' रखना पड़ा और blog शब्द लगा कर जताना पड़ा कि इसे ब्लाग ही समझो, ऐसा क्यों हुआ? सीधी बात है डा.रूपेश श्रीवास्तव ने "भड़ास" के मूल दर्शन के आधार पर स्वतंत्र ब्लाग बना लिया जिसका यू.आर.एल. कदाचित भिन्न था लेकिन नाम भड़ास ही था लेकिन आगे चल कर ये समस्या भी हल हो गयी अब तो यू.आर.एल. भी वही और अत्यंत छोटा मिल गया ... bhadas.tk ; अब यशवंत सिंह और डा.रूपेश श्रीवास्तव में जो नजदीकियां थी वो मात्र यशवंत सिंह के मुखौटॆ के कारण थीं बनियागिरी का असली चेहरा सामने आते ही विरोध शुरू हो गया और भड़ास को 'भड़ास blog' बनाना पड़ा क्योंकि भड़ास का मालिक तो कोई और ही था और वो हैं हमारे डा.रूपेश श्रीवास्तव। मुझे यकीन है कि अधिकांश भड़ासियों को ये बात पता ही नहीं है।
जय जय भड़ास

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लीद बेंचता बनिया, कहता उसको धनिया : हिंदी हो गयी चिथड़े-चिंदी

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

हिंदी बोलने और जीने में शर्म का एहसास है ये जताते हुए बनिया के पंखे

भड़ासियों को याद है कि भड़ास हिंदी का ब्लाग है जो देसज और ग्रामीण सोच के साथ चलने के लिये कटिबद्ध रहा है। हममें से अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों से आए हैं भले ही कुछ समय पहले या कुछ पीढ़ियों पहले लेकिन अब तक हमारे ऊपर महानगरीय सभ्यता(?) का प्रभाव पड़ा नहीं है हम अभी भी पड़ोसी के दुःख में रो लेते हैं, ठोकर खा कर गिरे बूढ़े दादाजी को उठाने के चक्कर में हमारी बस या लोकल ट्रेन आज भी छूट जाती है जिसका हमें अफ़सोस तो होता है लेकिन मन में शान्ति होती है किसी जरूरतमंद की मदद कर पाने की; हम भड़ासियों का यही जज़्बा हमें आज भी हमारी मिट्टी से जोड़े है।
लेकिन जब हम संवेदनाएं बेचना शुरू करते हैं तो फिर ये नहीं देखते कि क्या आदर्श हैं या क्या सिद्धांत हैं, थूक कर चाटना सही है या नहीं.....? हम तो बस बेंचते हैं हर वो बात जो बिक रही है, चाहे राष्ट्रप्रेम हो या सेक्स या फिर अंग्रेजियत का वो जामा जो हमें हमारे गंवई और "देसी" होने का एहसास दिलाता है वही हो रहा है आज दुनिया के सबसे बड़े हिंदी के ब्लाग होने का झूठा, खोखला और पोकल दावा करने वाली पंखों वाली भड़ास पर। वहां पौने दो सौ पंखे हैं , तानाशाही है जो तोलूगिरी करेगा वही टिकेगा वरना सदस्यता समाप्त...., दुनिया का सबसे बड़ा है लेकिन फिर भी "blog" शब्द को चिपका कर अपने वर्णसंकर होने का एलान कर रहा है कि अबसे ये सिर्फ़ हिंदी की बात नहीं करेगा न ही देवनागरी की अब यहां अंग्रेजी भी पेली जाएगी। इसी का प्रमाण है ये पोस्ट जो कि बता रही है कि अब वहां गंवार हिंदी बोलने वालों और हिंदी में विचारों की अभिव्यक्ति करने वालों को अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ायी जाएगी ताकि लेखकों की वैचरिक "जीन्स" में हेराफ़ेरी करके उनके स्वाभिमान में लिजलिजापन लाया जा सके। आपको एहसास कराया जाएगा कि जो अंग्रेजी जानता है वही चलता है वही श्रेष्ठ है बाकी सब तो पिछड़े और जाहिल हैं।
जय जय भड़ास

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संजय सेन(व्योम श्रीवास्तव) फ़र्जीपन पर जोरदार जूता

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009


केंचुए जैसे रीढ़विहीन निर्लज्ज संजय सेन जो कि व्योम श्रीवास्तव बना हुआ है उसने हिंदुस्तान के सिरदर्द नामक अपने ब्लाग पर एक पोस्ट डाली और तुरंत चिट्ठाजगत ने इसकी लंगोटी उतार दी

चिरकुट ने लिखा है कि वर्किंग वूमन की चाबी खराब होती है .....अब समझ में आया कि इसकी वर्किंग वूमन चाबियों से चलती हैं जो कि चाबी इस भड़वे के पास हैं। ढक्कन की पैदाइश लिखता है कि लंदन में हुए सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर पोस्ट लिखी थी वो भी दैनिक भास्कर से मार कर....। इसकी हड्डियां वाकई कैल्शियम फास्फेट की न होकर चूतियम सल्फ़ेट की बनी हैं। ये नहीं बताया कि इसकी जो वर्किंग वूमन हैं वो काम तो हिंदुस्तान में करती हैं लेकिन हैं विदेशी गोरी चमड़ी वाली... ज्यादा दलाली मिल जाती होगी न... कमीना भड़वा कहीं का....।
नीच ने ये नहीं लिखा कि इस फ़र्जी आई.डी.की सदस्यता इसने हिंदुस्तान के सिरदर्द से क्यों खत्म करी है???? खुद साले ने ब्लाग को लाल बत्ती एरिया बना रखा है और मंदिर जाने के उपदेश दे रहा है दल्ला भड़वा.....


भड़ासी भाई अम्बरीश अग्निहोत्री ने कसकर रगेदा भड़वे को कि बेटा जलेबी और गू में अंतर तो दुनिया को दिख रहा है

सारे भड़ासी देख सकते हैं कि ये भड़वा खुद ही पोस्ट लिख रहा है और खुद ही कमेंट लिख रहा है। अबे औरतों की दलाली और ब्लागिंग में अंतर होता है तू कब समझेगा?? सुधर जा और अपना मूल काम करता रह वरना भड़ासी तुझे लंगोटी के लायक भी न रखेंगे।
जय जय भड़ास

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कुछ समय तो दीजिये

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

शब्दों के साथ ज्यादा खेलना नही आता । अपनी बात सरल व सहज शब्दों में कहना जानता हूँ । शायद सिविल सेवा की तैयारी का असर है । नया नया भडासी बना हूँ .....आप लोगों से मुकाबला कैसे कर सकता हूँ । आप तो गहरे पानी से मोती निकाल लेते है । अभी मै किनारे पर ही हूँ ...... कुछ समय तो दीजिये । मुझे किसी का मजाक बनाना नही आता । प्लीज़ मेरा भी मजाक नही बनाए । मेरी एक अलग सोच व भाषा है ।
सोचता हूँ .....भड़ास को अपने नजर से देखने की कोशिश .................

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नाम और विचार बदलते ये लोग.....

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

क्या कोई भड़ासी इन दोनो शख्सियतों के बारे में जानता है या कोई सम्पर्क है ई-मेल के अतिरिक्त जिससे इनसे बात करा जा सके??



मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं कि कुछ लोग जो भड़ास में शामिल तो हुए हैं लेकिन अभी तक न तो उन्होंने कोई पोस्ट लिखी है न ही कोई टिप्पणी लिखी है यानि कि ये लोग लेखन-सक्रिय भड़ासी नहीं है। बहुत संभव है कि ये मात्र पाठक वर्ग से हों जो कि भड़ास पढ़ कर सदस्यता लेकर अपना नैतिक समर्थन भड़ास को देना चाहते हों। मुझे जो बात विचित्र लगी कि कुछ लोग जो कि मेरी नजर में आए हैं वो मुखौटाधारी संजय सेन के ब्लाग के भी सदस्य हैं और भड़ास के भी तो क्या ऐसे लोग ही होते हैं जो दो सर्वथा भिन्न विचारों से भी सहमति रखते हैं? दूसरी बात इन लोगों में मुझे जो अजीब लगी वो ये हैं कि ये लोग नाम भी बदल लेते हैं जैसे कि दो लोग तो मेरी नजर में हैं पहला है - व्योम तूफ़ान से तेज़ जो कि अब हो गया है व्योम श्रीवास्तव और दूसरी हैं कशिश(LLB) जो कि अब कशिश गोस्वामी हो गई हैं। कई कारण हो सकते हैं बहुत संभव है कि ये मात्र फ़र्जी आई.डी. हों। मैं निजी तौर पर माडरेटर्स से निवेदन करता हूं कि हमें भड़ास पर भड़ासी चाहिये भीड़ नहीं इसलिये यदि ये लोग अपने पते व संपर्क को स्पष्ट नहीं करते हैं तो आप लोग भी इन पर नजर रखें अन्यथा ऐसे लोग भड़ास में रह कर ही उसे बदनाम करने के लिये कुछ भी लिख सकते हैं। यदि मेरी बातों का इन्हें बुरा लगा हो तो मेहरबानी करके शंका का निवारण कर दें व अन्यथा न लें। अग्रिम क्षमा प्रार्थना सहित
जय जय भड़ास

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हमारी भड़ास4मीडिया वेबसाइट तैयार है जो हम भड़ासियों की तकनीकी योग्यता का कमाल है

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009


चलिये भड़ासी साथियों हमने पाखंडियों और मुखौटाधारी हिंदी के ब्लागरों के मुखौटे नोच कर उन्हें सबके सामने असली रूप में लाने की मुहिम छेड़ी थी उसमें एक और चरण नया आ गया है। यशवंत सिंह नामके एक अति चिरकुट लोभी वणिक ने अपनी अक्ल(जितनी है उतनी ही सही) लगा कर "आयुषवेद" नाम से एक ब्लाग बनाया है और हमें तकनीकी टक्कर देने के लिये बेवकूफ़ अपने रोटी के साधन हरामी किस्म के लालाओं और मीडिया माफ़िया जनों की तोलू वेबसाइट भड़ास4मीडिया के काम छोड़ कर डा.रूपेश श्रीवास्तव पर हमला कर रहा है। इस मूरख को ये नहीं पता कि अगर तेल लगाने का काम इसने बंद कर दिया तो वाकई दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाएगा। इस हत्बुद्धि ने आयुषवेद ब्लाग का यू.आर.एल. में एक और a लगा कर सोचा कि बहुत बड़ा तकनीकी किला जीत लिया है गधे ने रेंक कर अक्ल चलाई भी तो कितनी aaayushved तक बस......, इससे ज्यादा तो है ही नहीं दारू ने अक्ल खा ली है लेकिन इस कमीने की हरकतों की वजह से अकारण इसका परिवार परेशान होता है इस बात का अफ़सोस है।
लीजिए आप सब देखिये इन चित्रों में कि कैसे भड़ासियो को इसने पहले बेनामी कमेंट करके डराया कि अब ये डा.रूपेश पर हमला करेगा, कैसे इस गटर के कीड़े ने डा.रूपेश के बड़े भाईसाहब जैसे सज्जन व्यक्ति के बारे में कमीनेपन की बातें लिखा है जबकि उनका इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। ये हलकट सोचता है कि परिवार पर हमला करेगा तो डा.रूपेश और भाई रजनीश इसके द्वारा भड़ास की हत्या के पाप से इसे मुक्त कर देंगे। इसने भड़ास की हत्या का अक्षम्य अपराध करा है भड़ास को मार कर उसकी लाश पर भड़ासियों की संवेदनाओं की दुकान सजायी है। ये धूर्त और मक्कार शायद भाई मनीषराज के चुप रहने को उनकी कमजोरी समझ रहा है जिस दिन उन्होंने इसकी फ़ाड़ना शुरू करा तो दिल्ली क्या पूरे भारत में कोई मोची न सिल पाएगा।
दुर्बुद्धि! हमारी भड़ास4मीडिया वेबसाइट तैयार है जो हम भड़ासियों की तकनीकी योग्यता का कमाल है लेकिन हम इसे तब तक तेरी फाड़ने के लिये प्रयोग नही करेंगे जब तक तू अपने गटर में सुअर की तरह गू खाता रहता है जैसे ही तूने ज्यादा इधर-उधर हगा तो बेटा डंडा तैयार है तेरे पिछवाडे डालने के लिये ये ध्यान रखना। अरे धूर्त, मक्कार, संवेदनाओं के विक्रेता बनिए ! हम भड़ासी हैं बेटा ये बात तू भूल गया है तेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गये है लेकिन हम तो भड़ास जीते हैं। हम तेरी तरह बेनामी नहीं है हमारा नाम है और हम उसे खुल कर बताते हैं तेरी तरह से हमारी फटती नहीं है सियार।
जय जय भड़ास

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मैं यशवंत दादा को जानता हूं भले ही वे कुटिल और मक्कार हैं लेकिन...........

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

अग्नि बेटा! जहां तक निजी तौर पर मैं यशवंत दादा को जानता हूं भले ही वे कुटिल और मक्कार हैं लेकिन चरित्र के मामले में अच्छे से लगते हैं लेकिन क्या सत्य है वो तो ईश्वर ही जाने और वह लड़की जिसने इन पर आरोप लगाया था। मैं इस प्रकरण में इनके पक्ष में इसलिये हूं क्योंकि उस लड़की को तो न देखा है न ही जानता हूं बहुत संभव है कि उस लड़की ने झूठा आरोप लगाया हो पर यह भी संभव है कि गलती हुई हो इंसान ही तो हैं,ये गलती तो हमारे देवताओं तक से हुई है जैसे कि मैंने एक जगह पढ़ा था कि जगत निर्माता ब्रह्मा अपनी ही पुत्री के पीछे कामासक्त होकर भागे थे। बेनामी कमेंट्स के द्वारा हमें लगातार गालियां दी जा रही हैं और कहा जा रहा है कि भड़ास ने आखिरी तीर चला दिया हैपता नहीं क्यों वे बेनामी कमेंट्स दे रहे हैं जबकि मैंने तो उनकी पंखों वाली भड़ास पर "मंथन"शीर्षक की पोस्ट में अपने नाम से कमेंट करा था जो कि उन्होंने अस्वीकार कर दिया क्योंकि आप जानते हैं कि पोस्ट में तो तकनीकी तौर पर एडिटिंग करी जा सकती है लेकिन टिप्पणी में हरगिज नहीं उसे बस या तो माडरेटर प्रकाशित करे या अस्वीकार करे सो उनमें इतना साहस नहीं था कि प्रकाशित करते तो हटा दी होगी। जबकि खुद अपनी टिप्पणी प्रकाशित कर रखी है जिसमें लिखा है कि अब वो उस पोस्ट में दी हुई सलाह पर विचार करेंगे। बेनामी कमेंट्स हम भड़ास पर अस्वीकार कर देते हैं चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में क्योंकि भड़ास पर लीचड़ और मुंहचोर लोगों का हम स्वागत नहीं करते। इसलिये निवेदन हैं कि यदि आप टिप्पणी करने वाले अपनी पहचान के साथ नहीं लिख सकते तो बस पोस्ट को पढ़ ही लें प्रतिक्रिया न भेजें। कल भाई संजय सेन का सागर से मुझे बड़ा हड़बड़ाया हुआ स्वर लिये फोन आया कि भाईसाहब ये यशवंत जी ने क्या कर दिया...??? मैंने पूछा कि क्या हो गया???? मन में आशंकाएं आने लगीं....... लेकिन संजय सेन जी ने तत्काल बताया कि मोहल्ला पर एक पोस्ट आयी है कि यशवंत जी ने ब्लात्कार करा है, मैंने उन्हें बताया कि भाई ये घटना तो पिछले वर्ष के मई की शायद २५ तारीख की है आपको आज कैसे दिख रही है वो पलट कर बोले हो सकता है कि क्या दोबारा बलात्कार कर डाला...,इस बात पर मैंने उन्हें जोर देकर कहा कि आप उस पोस्ट की तारीख देखिये वह पुरानी पोस्ट होगी मैं मोहल्ला पर जाता नहीं क्योंकि मैं खुद जब भड़ास के उस मंच पर था तो उसे "कमाठीपुरा" कह चुका हूं तो अब उस मोहल्ले में दस्तक नहीं दूंगा आप कन्फ़र्म करिये तब मुझे कहें थोड़ी देर में उनका उत्साह और सनसनी शान्त हो गयी और बुझे से स्वर में बोले कि हां ये पुरानी पोस्ट है। मैंने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि भाई मैं मात्र सैद्धांतिक तौर पर उनका विरोधी हूं हमारे बीच कोई दुश्मनी नहीं है कि मैं इस तरह के सस्ते दुष्प्रचार में सहभागी बन जाऊं। मेहरबानी करके इस सैद्धांतिक विरोध को निजी लड़ाई का रूप देने की परिस्थितियों व तत्त्वों से बचिये वरना भड़ासियों और बेनामी कमेंट करके हमें गालियां देने वालों में क्या अंतर होगा। किंतु एक बात से इंकार नहीं कर सकता कि जिस तरह उन्होंने उस मंच से हम भड़ासियों की सदस्यता एक के बाद एक समाप्त करी थीं उसके चलते भड़ासियों में स्थायी आक्रोश है जिस पर मैं बस उन्हें गुस्सा थूक देने के लिये कह रहा हूं भले ही यह थूकना यशवंत दादा के मुंह पर ही हो...बाद में हम ही अपने रुमाल से उनका मुंह पोंछ लेंगे उनमें सुधार आने पर...............................
जय जय भड़ास

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नाट्यमंच के सिक्के के दो पहलू .......

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

हिंदीभाषियों के प्रति नफ़रत का जहर फैलाता नाटक

साम्प्रदायिकता के जहर को मिटाकर प्रेम के संदेश देता इकबाल भाई की प्रस्तुति
भड़ासी भाई-बहनों और बुजुर्ग साथियों, आज एक पीड़ा भड़ास के पन्ने पर निकालने जा रही हूं। जहां एक ओर जनाब इक़बाल नियाज़ी जैसे नाटककार नाटक की कला को देश में जाति धर्म और भाषा की दरार को पाटने के लिये प्रयोग कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर इसी कला का प्रयोग कुछ लोग क्षेत्रवाद और नफ़रत को बढ़ावा देने के लिये कर रहे हैं। भाई इक़बाल जी द्वारा लिखित-निर्देशित व लगभग पचास बार मंचन करे गये नाटक "ये किसका लहू बहा...." के बारे में तो आपने पिछली पोस्ट्स में जाना अब देखिये नाटक "भइया हातपांय पसरी" का चित्र जो कि मुंबई में हिंदीभाषियों के प्रति मराठीभाषियों के मन में कैसे नफ़रत के जहर को फैला रहा है, इस नाटक में दर्शाया गया है कि हिंदीभाषी (भइया लोग) कैसे मुंबई आते हैं और यहां जम कर रह जाते हैं और सम्पत्ति खरीदते हैं घर मकान दुकान बना लेते हैं वगैरह....। एक तरफ संविधान भारतीय नागरिकों को भारत गणराज्य की सीमा मे किसी भी जगह आने जाने में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता किंतु ऐसे माध्यम एक सामाजिक प्रतिबंध जरूर पैदा कर देते हैं। मैं दिल से ईश्वर से कामना करती हूं कि ऐसे नाटककारों पर से देवी सरस्वती की दया समाप्त हो जाए।
जय जय भड़ास

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मुखौटेवाला बनिया भड़ासियों से पीछा छुड़ाने कि लिए साम्प्रदायिकता का जहर फैलवा रहा है

भड़ासियों आप इतने भोले हैं कि बनिये की चालाकी को समझ नहीं पाये जबकि मैं ऐसे कमीनों की एक-एक नस समझता हूं। ऐसे ही लोग थे मुझे आपराधिक जीवन में ढकेल कर अपने काम साधने वाले क्योंकि इनमें खुद में न तो हिम्मत होती है और न ही ताकत तो ये किसी दूसरे से अपने काम करवा लेने में माहिर होते हैं। भड़ासी होने का मुखौटा लगाए बनिये ने भी सक्सेस मंत्रा नामक ब्लागर का इस्तेमाल करा ताकि भड़ासी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने में उलझे रहें और वो धनिया की जगह घोड़े की लीद बेचता रहे। बड़ा शातिर है ये बनिया जिसने भड़ास तक को बेच लिया है और ये सक्सेस मंत्रा या तो उसके ही पिट्ठू हैं या उसके द्वारा भावना में फंस कर इस्तेमाल हो रहे हैं।
जय जय भड़ास

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  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

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