जरा एक नजर इसे पढिये फिर जो लिखना है लिखियेगा

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

मुझे अंतर्जाल पर भ्रमण करते एक जोरदार पोस्ट मिली जिसे मैं उठा लाई ताकि भड़ासी अपनी राय दे सकें-----
अगर आपके ब्लॉग पर किसी पोस्ट की वजह से आपके खिलाफ कोई केस हो जाए तो... आपको किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म की मानहानि के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाए... अब ऐसा हो सकता है... ये खतरा अमेरिका, चीन, बर्मा के बाद मध्य एशिया के देशों में फैला और अब भारत में आसन्न खड़ा दिखाई दे रहा है...
यानी अब तक ब्लॉगिंग के सामान्य उसूल भी आपके खिलाफ खड़े हो सकते हैं... क्योंकि उन पर कानून की नजर है...
19 साल के एक ब्लॉगर अजीत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का कथन इसका सबूत है... जिसने शिवसेना के खिलाफ अपने ऑर्कुट प्रोफाइल पर एक कम्यूनिटी खड़ी की... मकसद था महाराष्ट्र कोर्ट की तरफ से एक क्रिमिनल केस में अपने खिलाफ जारी सम्मनों से बचाव... लेकिन उसका तरीका चल नहीं पाया... इस पोस्ट पर शिवसेना के खिलाफ आई प्रतिक्रियाओं से शिवसैनिक इतने तिलमिलाए कि उन्होंने ब्लॉगर अजीत के खिलाफ थाणे पुलिस स्टेशन में एक और केस ठोक दिया...
अजीत को केरल हाईकोर्ट से एंटिसिपेटरी जमानत मिली तो वो सुप्रीम कोर्ट चला गया जहां उसका तर्क था कि कम्यूनिटी में दर्ज हुए सारे कमेंट्स उस कम्यूनिटी तक ही महदूद हैं... उनका मकसद किसी का अपमान करना नहीं था... और ये अभिव्यक्ति की आजादी की तरह समझे जाने चाहिए... एक कंप्यूटर साइंस छात्र अजीत की बात को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना... सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि वो अच्छी तरह जानता है कि कितने लोग इंटरनेट पोर्टल देखते हैं... और अगर कोई इस कंटेंट को पढ़ने के आधार पर कोई केस दर्ज कराता है तो उसे इसका सामना करना पड़ेगा... और ये भी साफ करना होगा कि इस कंटेंट को अपने वैबपेज पर रखने के पीछे उसका तर्क क्या है...
इस मामले को बतौर ब्लॉगर आप कैसे देखते हैं... ये काफी अहमियत रखता है... सुप्रीम कोर्ट के रुख से दो-तीन बातें एकदम साफ हो गई हैं...
एक, अगर आपके ब्लॉग पर जो भी कंटेंट मौजूद है तो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ आप ही जिम्मेदार माने जाएंगे...
दूसरे, अगर आपके वैबपेज, कम्यूनिटी वैबसाइट और ब्लॉग पर किसी ने अपने विचार रखे हैं और आप सिर्फ होस्ट की भूमिका निभा रहे हैं तो काम नहीं चलेगा... जिन्होंने विचार व्यक्त किए हैं, वो उतने नहीं बल्कि आप इसके आपराधिक पक्ष की ज़द में आएंगे...
तीसरी बात, आप अभिव्यक्ति की आजादी का सहारा लेकर अपनी वैबसाइट को क्लीनचिट नहीं दिला सकते... आपको इसके तहत मौजूद कानूनी नुक्तों का ख्याल रखना होगा...
चौथी बात, किसी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी और गलतबयानी, बदनामी और मानहानि के लिए जो कानून प्रिंट और टीवी पर लागू होता है, ब्लॉगर भी उसकी सीमा में आते हैं...
पांचवीं बात, अगर आप ब्लॉग या कम्यूनिटी वैबसाइट या वैबपेज शुरू कर रहे हैं तो एक वकील को भी साथ रखें, वरना आप कब जेल में होंगे कहना मुश्किल है...
इस घटना से कम से कम ये तो साबित हो गया है कि ब्लॉग अखबार और टीवी से कमजोर नहीं है... वो उतना ही बड़ा मीडियम है जितने दूसरे... और कानून का जो कंसर्न दिखाई दे रहा है, उसमें अखबार और टीवी से भी ज्यादा इसकी जिम्मेदारी देखी जा रही है...

:-दुनिया नामक ब्लाग से साभार

जय जय भड़ास

4 टिप्पणियाँ:

अभिषेक आनंद ने कहा…

सच तो यह है कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का एक ससक्त माध्यम बन चूका है. और हर दिन इसका विस्तार होते जाना है. जैसे जैसे भारत में इन्टरनेट के उपयोगकर्ता बढ़ेंगे ( एक अनुमान के अनुसार अभी मात्र 15% भारतीय इन्टरनेट का उपयोग करते है) वैसे वैसे इसकी प्रासंगिकता भी बढ़ती चली जायेगी

Manoj dwivedi ने कहा…

Jankari ke liye sukriya.

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

अभिषेक भाई ने कहा कि अनुमानतः मात्र 15% लोग ही इंटरनेट का प्रयोग करते हैं तो बस इतना कहेंगे कि ये एक बहुत बड़ा आंकड़ा है क्योंकि हम पर राज्य करने वाले तो इस संख्या से कहीं बहुत कम हैं आप विचार करिये कि संसद और जुडीशियरी में कुल मिला कर कितने प्रतिशत लोग हैं। ये बात प्रासंगिक होने के लिये दूर भविष्य की प्रतीक्षा नहीं कर रही है वरना अडवाणी जैसे लोकप्रिय माने जाने वाले नेता को अपनी वेबसाइट बनाने की जरूरत न पड़ती.......
जय जय भड़ास

nitin thakur ने कहा…

जानकारी बहुत कीमती है,धन्यवाद.

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