मीडिया की करतूत

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

बिडम्बना है की आज मीडिया का रोल, जो होना चाहिए वो नही है
आज वैलेन्तिएन डे है, ये सभी को पता है , मीडिया पुरी तरह से कवर करती है ,
प्रिंट हो या एलेक्ट्रोनीक सभी भुनाने में लगे रहते है, यूँ कहें की जो दिखता है वो बिकता है का शिधंत लेकर चलता है

3 टिप्पणियाँ:

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

सही है भाईसाहब...

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

मित्र,
हमारे देश का ये चौथा खम्भा ही हमारे देश का दलाल बना हुआ है, लोकतंत्र में लोग का संवाद के बजाय भावना को बेचने का खुला दूकान बना हुआ है.
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

आप लोगों को भाई जे.पी.नारायण याद हैं जिन्होंने ऐसी कुपत्रकारिता की धज्जियां उड़ा दी थीं अरे भाई वही "बेहया" ब्लाग वाले जिनके ब्लाग को आत्महत्या करनी पड़ी थी उन्होंने लिखा था
खबर-खबर खबराते बंदर। कूद पड़े लंका के अंदर
जय जय भड़ास

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