दिल्ली से दिल्लगी के बीच में बेचारा दिल !

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

सुना था दिल्ली , दिलवालों की होती है
हर तीसरा सा आदमी, सीप में एक मोती है।
हम भी थे दिलवाले, सो आ गए यहाँ पर
सोचा की क़द्र होगी, जाए जहाँ-जहाँ पर ,
पर हाए रे मेरी किस्मत! यहाँ भी दगा दे गई
मेरे आने से पहले ही दिल्ली ,
दिलवालों से खाली सी हो गई ।
अब तो यहाँ रहते हैं , बस तंग दिल निराले
पता नही कब किसी का, बटुआ ही चुरा लें।
थोडी सी मारा-मारी, थोडी हड़बड़ी सी दिखी,
जेबकतरों से सावधान! पहली सबक थी सीखी
क्या हाल है हमारा, कैसे तुम्हे बताऊँ
करके दिल्लगी! दिल्ली से अब दिल की ही सुनाऊ ।

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

जब से अधिकतर दुष्ट दिल्ली में इकट्ठा हो गये हैं हमारी राजधानी बीमार हो गयी है इसे चिकित्सा की जरूरत है मेरे भाई...
दिल वालों की दिल्ली गुजरे जमाने की बात हुआ करती थी
जय जय भड़ास

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