सच कहूँ ... घोर कलयुग आ गया है

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

वो गंगा । अब नही दिखती । जिसकी आवाज में मधुरता थी । चेहरा देखने के लिए आईने की जरुरत नही थी । जो हमारी प्यास भी बुझाती थी । आज गंदे नाले में बदल गई । उसका कोई दोष नही । वो तो अपने हालत पर रो रही है । उस दिन को याद कर रही है, जब भगीरथ ने धरती पर अवतरित किया । याचना कर रही है ...अब भी छोड़ दो । उसकी आवाज सुनने वाला कोई नही । सच कहूँ ... घोर कलयुग आ गया है ।

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मार्कण्डेय भाई ये मात्र राजनैतिक और कथित धर्मपरायण लोगों की इच्छा शक्ति में कमी के साथ ही पर्यावरणवादियों की लुच्चई का परिणाम है वरना साले हिंदू के लड़के और मुस्लिम की लड़की की शादी के मुद्दे पर हजारों की संख्या में सड़क पर उतर आते हैं ये ऊर्जा इन समस्याओं पर क्यों नहीं देखने में आती? खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं
जय जय भड़ास

mark rai ने कहा…

rupesh jee mai aapaki baat se puri tarah sahmat hoon ...aaj aise hi muddon par bhid jutai ja sakti hai jisame kuchh masala ho ..dharati ki chinta koi nahi karta usame koi masala nahi milega n... jis paani sar se upar hoga us din din ka logo ko intjaar hai ...

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