भड़ासी चोर नहीं डाकू हैं,कभी दिल लूट लेते हैं कभी कविताएं....

रविवार, 5 अप्रैल 2009

मैं हूं डा.रूपेश श्रीवास्तव, इन डाकुओं का असरदार सरदार

अभी मैं बहन हरकीरत हकीर के ब्लाग पर गया तो वहां मुखौटाधारी शराफ़त अलियों की भीड़ टिप्प्णियां देने के लिए कतार में खड़ी थी तो मैंने जो टिप्पणी वहां लिखना चाही वह भड़ास के मंच पर प्रस्तुत है जिसे शिकायत हो यहां आकर करे। उनके निजी ब्लाग पर हम सिर्फ़ चोरियां डकैतियां करने जाएंगे, ये एक साझा मंच है जिसे जो कहना है यहां आकर कहे अपने ब्लाग पर वो हमें लाख कोसें हमारी सेहत में एक ग्राम कमी न आएगी। लीजिये पेश है ढीठता से भरी एक टिप्पणी जिसे आप टिप्पणा भी कह सकते हैं ---
हे भगवान! इतना गहरा अपराध इस संगीन जुर्म के लिये तो फांसी पर कई बार चढ़ाना उतारना चाहिये तब जाकर समझ आएगा कि इतनी बड़ी बौद्धिक संपदा की चोरी से कितने सारे लोगों को तकलीफ हुई है।
बस एक ही बात कि फांसी से कम कुछ नहीं... दूसरी बात कि इस गंभीर अपराध के लिये गूगल अंकल से भी शिकायत करिये कि आपके मुफ़्त दिये स्पेस पर बनाए ब्लाग पर चॊरी का माल रखा जा रहा है ब्लाग रिमूव हो जाएगा तो बौद्धिकता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी प्रखर हो जाएगी। अरे किसी ने एक बार भी परिस्थिति के बारे में जानने की कोशिश भी करी कि क्यों कोई पसंद आने पर चोरी करके कोई चीज दुनिया के सामने लाता है अगर ये चोरी है तो मुनव्वर सुल्ताना ने कहीं लिखा है कि ये रचना उनकी लिखी हुई है,उन्होंने तो तमाम पसंद के रचनाकारों की रचनाएं मात्र अपने खाते से पोस्ट करी हैं अगर आपकी रचना है तो आपको इस बात से प्रसन्न होना चाहिये कि आपके हिंदी के पाठकों के साथ जो दो-चार उर्दू के पाठक है वो भी उसे पढ़ पा रहे हैं और रस ले रहे हैं आप इतनी कड़ी प्रतिक्रिया करने के बजाए यदि पत्रव्यवहार कर उन्हें कुछ समय देती तो बात भी थी आपको लगता है कि हर औरत इंटरनेट को रोजाना व्यवहार में ला पाती है, दो-चार दिन में एक बार कभी साइबर कैफ़े में जाकर प्रयोग कर लिया तो इसके लिये उसको जान से मार दीजिये ताकि दोबारा कभी आप जैसे महान बौद्धिक लोगों की रचना न चुरा सके। धन्य हैं सारे निंदाकारी बौद्धिकजन..... मुखौटाधारी बहुरूपियों की जमात के अलावा क्या एकत्र हुआ है यहां। मैडम जी ये तो बड़ा छोटा अपराध है मेरे अपराध के मुकाबले में इन्होंने तो मात्र आपकी रचना का अनुवाद पोस्ट करके अपनी चोरी दुनिया के सामने एक वैश्विक मंच पर रखी है छिपायी नहीं और न ही किसी किताब में छपवा कर मेहनताना झटक लिया, मैंने तो सीधे-सीधे भड़ास नाम के एक ब्लाग पर ही डाका मारा है क्या ये आप सभी जागरूक ब्लागरों ने नहीं देखा? ये डाका तो इतना बड़ा रहा कि मूल ब्लागर को अपने ब्लाग का नाम ही बदलना पड़ा लेकिन शराफ़त का मुखौटा लगाए स्वनाम धन्य लोग इस विषय पर चूं तक नहीं करेंगे। जो मुखौटाधारी टिप्पणीकार आपको सलाहें दे रहे हैं उनके कहे अनुसार जरा आप कापीराइट का मुकदमा करके देखिये साथ ही गूगल से पत्रव्यवहार करके भी देख लीजिये आप स्वयं समझ जाएंगी कि आपके हितैषी मात्र टिप्पणी देने का समय निकाल कर बड़े बनते हैं। निंदा,भर्त्स्ना और न जाने क्या क्या कर दिया जरा जितनी संवेदना रचनाओ में है उससे सहस्त्रांश जीवन में लाकर देखिये तो समझ जाएंगी कि क्या अक्षम्य कर दिया मुनव्वर सुल्ताना ने अन्जाने में। आपके अधिकांश टिप्पणीकार वे लोग हैं जो कि लैंगिक विकलांग मनीषा नारायण के अस्तित्त्व पर सवाल खड़े कर चुके हैं। जीवन वेबपेज से बाहर घटित होता है यहां तो उसकी परछाईं का अंश मात्र है और परछाईयों से आप इंसान की असलियत नहीं समझ सकतीं हैं। आप इसे मेरी ढिठाई समझें या स्पष्टवादिता लेकिन जो कहना है सबके सामने कहा है चोरी छिपे नहीं..... जिसे मुझे प्रताड़ित करना हो भड़ास पर आकर करले।

जय जय भड़ास

5 टिप्पणियाँ:

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

आदरणीय डा.रुपेश जी,
आपसे मै सिर्फ एक सवाल पूछना चाहती हूँ अगर आपकी किसी रचना को कोई अपने नाम से प्रकाशित करता तो आप क्या करते...?? मुनव्वर जी क्या जाने मैंने ये रचनाएँ किन हालातों में , कितने दर्द के बीच गुजरते हुए लिखीं हैं ....अगर शब्दों के हेर फेर से ही नज्में लिख हो जाएँ तो आज हर कोई अमृता, परवीन या ग़ालिब हो......हाँ मुझे आपत्ति है क्योकि इन नज्मों में बसे दर्द के साथ मैंने बरसों काटे हैं ...उन्हें भोगा है...ओढा है ...अपने सीने में बरसों दफ़न कर रखा है ...अपने आंसुओं से सींचा है मैंने...तो अब इतनी जल्दी किसी और के साथ कैसे जाने दूँ ...?? पहले वो बरसों की तड़प लाये...वो सिसकियाँ लाये ...हाँ मुझे तकलीफ है क्योकि ये दर्द सिर्फ मेरा है.......जब जिस्म चीर कर कुछ लिखा जाये रुपेश जी तो दर्द तो होता ही है.....!!

मनोज द्विवेदी ने कहा…

Kitani matayein aur bahane aisi bhi hain isi desh me jinhone tamam jindagi sirf dukh bhoga hai aur unke pas bhawnaon ka athah samundar hai. par kya karein bechari padhi-likhi nahi hain..isliye apne bhawon ko SABD nahi de pati..shayad we padhi-likhi hoti to na jane kitani- MAHADEVI, AMRITA ka nam hamare samne aur hota..par afsos akshar se bhet nahi hone ki vajah se duniya aaj bhi unse anjan hai.

दीनबन्धु ने कहा…

भाई ये मात्र भलमनसाहत का दिखावा है ये बस समस्याओं पर किस्सागोई करने वाले लोग हैं जो भोले होने का दिखावा करते हैं। जब मुनव्वर आपा ने बता दिया कि जो हुआ वह अंजाने में हुआ तब भी ये उन्हें छिछोरा और बेशर्म कह कर अपना बड़प्पन जता रही हैं पता चल गया कि कितना दर्द है कितनी संवेदना है नौटंकी है सारी की सारी और टिप्पणीकारों में दम है तो भड़ास की डकैती पर एक भी शब्द लिखते क्यों नहीं लिखा किसी ने? डा.सुभाष भदौरिया जी सही कहते हैं कि जरा सी किसी औरत ने कुछ लिख दिया तो टिप्पणीकारों के गिरोह तुरंत सहलाने पहुंच जाते हैं लार टपकाते हुए साले ठरकी, अगर पाद भी दे तो टिप्पणी करेंगे कि वाह क्या संगीतमय अभिव्यक्ति है और हग भी दे तो कहेंगे कि वाह! वाह! क्या व्यंजन बनाने की विधि बताई है। मुझे वैसे भी ऐसे नौटंकीबाज़ों से सख्त चिढ़ है जो कुछ करते नहीं बस किस्सा कविता रच कर सोचते हैं कि दुनिया सुखी कर दिया इन्होंने सब धरती के बोझ हैं
जय जय भड़ास

ज़ैनब शेख ने कहा…

जब जिस्म चीर कर कुछ लिखा जाये रुपेश जी तो दर्द तो होता ही है.....!!
कितना पाखंड है इसके शब्दों में... जिस्म चीर कर कैसे लिखती हो बीबी जरा भड़ासियों को भी बता दो हम सब तो या कीबोर्ड पर हाथों की उंगलियों से दिमाग से सोच कर लिखते हैं या फिर दिल से बिना सोचे। जिस्म चीरने वाला अंदाज हमें भी तो सिखाओ बाई
जय जय भड़ास

बेनामी ने कहा…

गुरुदेव,
आपका कमेन्ट वहां नहीं है मगर सहलाने वाले सभी कमेन्ट वहां मौजूद हैं, विवाद के साथ चीर फार और दिल आत्मा के नाम पर बेचने वालों की जमात में एक और सही.
हम तो अपने अभियान में लगे रहेंगे.
जय जय भड़ास

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